राजा भगीरथ की कड़ी तपस्या के बाद मां गंगा धरती पर आई। लेकिन एक ऐसी जगह भी है जहां मां गंगा खुद भगवान शिव की परिक्रमा करती हैं।
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यह धाम उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले में स्थित पवित्र गंगोत्री है। विश्व प्रसिद्ध गंगोत्री धाम में सूर्य कुंड और गौरी कुंड अपना अलग ही महत्व रखते हैं।
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कहा जाता है कि आज भी भागीरथी की धारा इन्हीं कुंडों से होकर आगे बढ़ती है। पुराणों में भी इन दो कुंडों का उल्लेख किया गया है। इतना ही नहीं इनकी खूबसूरती निहारने के लिए दुनिया भर से सैलानी हर साल यहां पहुंचते हैं।
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बता दें कि हर साल अक्षय तृतीया के मौके पर गंगोत्री धाम के कपाट विधिविधान के साथ आम लोगों के दर्शनार्थ खोले जाते हैं।
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कहा जाता है कि गंगोत्री में एक शिला पर बैठकर राजा भगीरथ ने साढ़े पांच हजार साल तक तपस्या की थी। राजा भगीरथ ने जिस शिला पर बैठकर तपस्या की थी, उसे भगीरथ शिला कहते हैं। ये शिला आज भी यहां मौजूद है।
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गंगोत्री धाम
- फोटो : AmarUjala
मान्यता है कि जब गंगा स्वर्ग से धरती पर उतरी तब गंगोत्री मंदिर से कुछ दूरी पर ही राजा भगीरथ ने सूर्यदेव को जल चढ़ाया था। यहां गंगा (भागीरथी) एक धारा के रूप में पूरब दिशा की ओर कुंड में गिरती है।
गंगोत्री मंदिर से 500 मीटर की दूरी पर गौरी कुंड स्थित है। ये कुंड गंगा के बीच में विद्यमान है। कहा जाता है कि गौरी कुंड में भगवान शंकर ने मां गंगा को अपनी जटाओं में धारण किया था। आज भी यहां पर पत्थर का एक शिवलिंग है। इसी शिवलिंग की गंगा परिक्रमा करती हैं। इस शिवलिंग के दर्शन शीतकाल में तब होते हैं, जब भागीरथी का जलस्तर कम रहता है।
(अमर उजाला इन तथ्यों की तस्दीक नहीं करता है। यह केवल मान्यताओं के आधार पर प्रस्तुत किए गए हैं।)