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स्वतंत्रता दिवसः फांसी का नाम सुनकर बढ़ गया था इस जांबाज का वजन, 24 साल की उम्र में चुनी शहादत

Wed, 15 Aug 2018 09:53 AM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून
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shaheed veer keshari chand
इस वीर ने 24 साल की उम्र में भारत मां की आजादी के लिए फांसी के फंदे को चुन लिया था। इस वीर सपूत का नाम शहीद वीर केशरी चंद था।
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shaheed veer keshari chand
3 मई 1945 को वीर केशरी चंद ने हंसते हुए फांसी के फंदे को चूम लिया। उस समय उनकी उम्र मात्र 24 वर्ष थी। बताते हैं कि 3 माह जेल में रहने पर उनका वजन ढाई किलो बढ़ गया था। वीर शहीद केशरी चंद की याद में देहरादून के चकराता में रामताल गार्डन में हर वर्श 3 मई को मेले का आयोजन किया जाता है।
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veer shaheed kesari
केशरी का जन्म 1 नवंबर 1920 को उत्तराखंड के देहरादून जिले के जनजातिय क्षेत्र जौनसार बावर के ग्राम क्यावा में पंडित शिव दत्त के घर हुए। उस दौरान क्षेत्र में पढ़े-लिखे लोग उंगली पर गिने जाते थे। उनमें से एक केशरी के पिता शिव दत्त भी थे। वह पेशे से अध्यापक थे। केशरी के पिता चाहते थे कि वह पढ़ लिखकर एक बहुत बड़ा अधिकारी बन उनका नाम रोशन करें। लेकिन उसकी किस्मत में कुछ और ही लिखा था।

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सुभाष चंद्र बोस की जयंती
केशरी के अंदर फौज में जाकर देश के लिए कुछ कर गुजरने की तमन्ना थी। लाख समझाने के बावजूद भी केशरी नहीं माने। 10 अप्रैल 1941 को वह रॉयल इंडियन आर्मी सर्विस कोर में सूबेदार के पद पर भर्ती हो गए। इसी साल केशरी ने वॉयसरॉय कमीशन ऑफिसर का कोर्स पूरा किया।
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सुभाष चंद्र बोस की जयंती
दूसरे विश्व युद्ध में उन्हें मलाया भेजा गया। इस दौरान 15 फरवरी 1942 को जापानी सेना ने उन्हें बंदी बना लिया। इसके बाद वो सुभाष चंद्र बोस के संपर्क में आए और उनसे प्रभावित होकर भारत की आजादी का सपना साकार करने के मकसद से आजाद हिंद फौज में शामिल हो गए। 
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Veer Shaheed Kesri chand
उनकी बहादुरी को देखते हुए उन्हें इंफाल में एक पुल उड़ाने का जिम्मा सौंपा गया। इस पुल से ब्रिटिश सेना का सामान आता था, लेकिन ब्रिटिश सेना ने उन्हें पकड़ लिया। उन्हें गिरफ्तार कर दिल्ली लाया गया। ये खबर उनके गांव क्यावा में आग की तरह फैल गई। केशरी पर ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ जंग छेड़ने की धाराओं में मुकदमा चला। केशरी ने पूरी बहादुरी के साथ केस का सामना किया। कोर्ट परिसर में भी वह भारत के आजादी के नारों को बुलंद करते रहे।
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ramtal garden
3 फरवरी 1945 को केशरी को फांसी देने का एलान ब्रिटिश जज ने किया। फांसी की तारीख 3 मई 1945 मुकर्रर की गई। सजा के बाद जज ने केशरी से कहा कि हम तुम्हारी सजा कम कर सकते हैं, लेकिन उसके बदले तुम्हें आजाद हिंद फौज की सिक्रेट जानकारी हमें देनी होगी। लेकिन केशरी ने उनकी बात नहीं मानी। आखिरकर 3 मई की तारीख आ गई। फांसी का वक्त सुबह 6 बजे रख गया। इससे पहले 5 बजे एक घंटे के लिए केशरी को परिवारजनों से मुलाकात का वक्त दिया गया। जैसे ही केशरी के पिताजी और परिजन उनसे मिलने पहुंचे वह रोने लगे। 
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d - फोटो : demo pic
उन्हें रोता देख केशरी ने हंसते हुए कहा आप लोग क्यों रोते हैं। आपको तो खुश होना चाहिए कि अपका बेटा देश को आजादी दिलाने के लिए काम आ रहा है। रोइए मत, मुझे हंस कर विदा कीजिए। मेरी शहादत में आसुओं का कोई काम नहीं है। अंतिम वक्त में जब उनसे पूछा गया कि उनकी आखिर ख्वाहिश क्या है तो उन्होंने कहा मैं भारत माता को गुलामी की बेड़ियों से आजाद देखना चाहता हूं। और मेरे मृत शरीर पर कोई भी विदेशी कपड़ा न रखा जाए। मेरे शरीर को खादी में लपेटा जाए।
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