15 अगस्त 1947 से लेकर आज तक भारत अपनी आजादी के 70 साल का सफर आजाद भारत तय कर चुका है। आजादी के जश्न के मौके पर आपको ऐसे ही वीर की गाथा सुनाते हैं, जिसने 24 साल की उम्र में भारत मां की आजादी के लिए फांसी के फंदे को चुन लिया। भारत के इस वीर सपूत का नाम शहीद वीर केशरी चंद था।
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shaheed veer keshari chand
3 मई 1945 को वीर केशरी चंद ने हंसते हुए फांसी के फंदे को चूम लिया। उस समय उनकी उम्र मात्र 24 वर्ष छह महीने थी। बताते हैं कि 3 माह जेल में रहने पर उनका वजन ढाई किलो बढ़ गया था। आज वीर शहीद केशरी चंद की याद में देहरादून के चकराता में रामताल गार्डन में हर वर्श 3 मई को मेले का आयोजन किया जाता है।
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केशरी का जन्म 1 नवंबर 1920 को उत्तराखंड के देहरादून जिले के जनजातिय क्षेत्र जौनसार बावर के ग्राम क्यावा में पंडित षिव दत्त के घर हुए। उस दौरान क्षेत्र में पढ़े-लिखे लोग उंगली पर गिने जाते थे। उनमें से एक केशरी के पिता शिव दत्त भी थे। वह पेशे से अध्यापक थे। केशरी के पिता चाहते थे कि वह पढ़ लिखकर एक बहुत बड़ा अधिकारी बन उनका नाम रोशन करे। लेकिन उसकी किस्मत में कुछ और ही लिखा था।
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केशरी के अंदर फौज में जाकर देश के लिए कुछ कर गुजरने की तमन्ना थी। लाख समझाने के बावजूद भी केशरी नहीं माने। और 10 अप्रैल 1941 को वह रॉयल इंडियन आर्मी सर्विस कोर में सूबेदार के पद पर भर्ती हो गए। इसी साल केषरी ने वॉयसरॉय कमीशन ऑफिसर का कोर्स पूरा किया।
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दूसरे विश्व युद्ध में उन्हें मलाया भेजा गया। इस दौरान 15 फरवरी 1942 को जापानी सेना ने उन्हें बंदी बना लिया। इसके बाद वी सुभाश चंद बोस के संपर्क में आए और उनसे अतिप्रभावित होकर भारत की आजादी का सपना साकार करने के मकसद से आजाद हिंद फौज में शामिल हो गए। (हर साल धूमधाम से लगता है मेला)
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उनकी बहादूरी को देखते हुए उन्हें इंफाल में एक पुल उड़ाने का जिम्मा सौंपा गया। इस पुल से ब्रिटिश सेना का सामान आता था, लेकिन ब्रिटिश सेना ने उन्हें पकड़ लिया। उन्हें गिरीफ्तार कर दिल्ली लाया गया। ये खबर उनके गांव क्यावा में आग की तरह फैल गई। दिल्ली के लाल किले पर केशरी के खिलाफ ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ जंग छेड़ने की धाराओं में मुकदमा चला। केशरी ने पूरी बहादूरी के साथ केस का सामना किया। कोर्ट परिसर में भी वह भारत के आजादी के नारों को बुलंद करते रहे। (हर साल धूमधाम से लगता है मेला)
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3 फरवरी 1945 को केषरी को फांसी देने का ऐलान ब्रिटिश जज ने किया। फांसी की तारीख 3 मई 1945 मुकर्रर की गई। सजा के बाद जज ने केशरी से कहा कि हम तुम्हारी सजा कम कर सकते हैं, लेकिन उसके बदले तुम्हें आजाद हिंद फौज की सिक्रेट जानकारी हमें देने होगी। लेकिन केशरी ने उनकी बात नहीं मानी।
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आखिरकर 3 मई की तारीख आ गई। फांसी का वक्त सुबह 6 बजे रख गया। इससे पहले 5 बजे एक घंटे के लिए केशरी को परिवारजनों से मुलाकात का वक्त दिया गया। जैसे ही केशरी के पिताजी और परिजन उनसे मिलने पहुंचे वह रोने लगे।(हर साल धूमधाम से लगता है मेला)
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उन्हें रोता देख केशरी ने हंसते हुए कहा आप लोग क्यों रोते हैं। आपको तो खुश होना चाहिए कि अपका बेटा देश को आजादी दिलाने के लिए काम आ रहा है। रोइए मत, मुझे हंस कर विदा कीजिए। मेरी शहादत में आसुओं का कोई काम नहीं है। (हर साल धूमधाम से लगता है मेला)
अंतिम वक्त में जब उनसे पूछा गया कि उनकी आखिर ख्वाहिश क्या है तो उन्होंने कहा मैं भारत माता को गुलामी की बेड़ियों से आजाद देखना चाहता हूं। और मेरे मृत शरीर पर कोई भी विदेशी कपड़ा न रखा जाए। मेरे शीरीर को खादी में लपेटा जाए। (हर साल धूमधाम से लगता है मेला)