फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

गर्मियों में जंगल को झुलसाने वाली 'घास' अब करेगी घरों को रोशन

Sun, 25 Sep 2016 06:53 PM IST
सुधीर राठौर/ अमर उजाला, बेड़ीनाग (पिथौरागढ़)
विज्ञापन
1 of 8
pine
उत्तराखंड के जंगलों को गर्मियों में झुलसा देने वाला पिरुल (चीड़ के पेड़ की सूखी पत्तियां) अब यहां विद्युत उत्पादन और रोजगार का प्रमुख जरिया बनने जा रहा है।
विज्ञापन

2 of 8
pirul
प्रदेश सरकार से 10 किलोवाट तक के विद्युत संयंत्रों को ग्रिड से जोड़ने की मंजूरी मिलने के बाद यहां स्वंयसेवी संस्था ‘अवनी’ ने त्रिपुरादेवी और सिमलता गांव में 10-10 किलोवाट क्षमता के दो पाइन नीडल गैसीफायर प्लांट लगा दिए हैं। इनको विद्युत ग्रिड से जोड़ने के ट्रायल की सफलता के बाद अब दिसंबर के पहले हफ्ते से दोनों प्लांटों से यूपीसीएल को लगातार बिजली बेची जाएगी।
 
विज्ञापन

3 of 8
pirul
उत्पादित बिजली की बिक्री के लिए उत्तराखंड पावर कारपोरेशन से अनुबंध कर लिया गया है। पिरूल से उत्पादित बिजली के व्यावसायिक उपयोग का यह देश में पहला मामला है। इनका विस्तार होने से जंगलों में आग की समस्या पर काफी हद तक काबू पाया जा सकता है। इसके अलावा विद्युत उत्पादन और स्वरोजगार की भी अच्छी संभावनाएं होंगी।
 

4 of 8
pirul
अवनी के निदेशक रजनीश जैन ने बताया कि संस्था ने वर्ष 2005 में पिरूल से बिजली बनाने का पहला प्रोटोटाइप लगाया था। संस्था अपने परिसर में इससे उत्पादित बिजली का उपयोग करने के साथ इस पर शोध करती रही है। 2013 में चचड़ेत गांव में 120 किलोवाट का प्लांट तैयार किया गया, लेकिन ज्यादा मात्रा में पिरूल इकट्ठा करने, अधिक दूर से ढुलान पर खर्च अधिक आने और स्टाक में आग के खतरे जैसे व्यावहारिक कारणों से वहां उत्पादन शुरू नहीं हो पाया।
 
विज्ञापन

5 of 8
pirul
तब 120 किलोवाट से कम के विद्युत संयंत्रों को ग्रिड से जोड़ने की नीति नहीं थी। श्री जैन ने बताया कि सरकार के पास व्यावहारिक पक्ष रखने के बाद 10 किलोवाट तक के विद्युत संयंत्रों को ग्रिड से जोड़ने की मंजूरी मिली। इसके बाद त्रिपुरादेवी और सिमलता गांव में 10-10 किलोवाट क्षमता के दो पाइन नीडल गैसीफायर प्लांट लगा दिए हैं। अगले चरण में इनके अधिक विस्तार की योजना है।
 
विज्ञापन

6 of 8
pirul
10 किलोवाट का पाइन नीडल गैसीफायर प्लांट की लागत लगभग 11 लाख रुपये आई है। अवनी के प्रवक्ता राजेंद्र जोशी ने बताया कि इस प्लांट में एक या दो लोग काम करेंगे, इससे उत्पादित बिजली को अपने परिसर में उपयोग करने के बाद अवशेष को यूपीसीएल के ग्रिड में सप्लाई की जाएगी।
 
विज्ञापन

7 of 8
pirul
यूपीसीएल 5 रुपये प्रति यूनिट की दर से संस्था को प्रोत्साहन भुगतान करेगी। उन्होंने बताया कि प्लांट में एक घंटे में 15 से 16 किलोग्राम पिरूल की खपत होती है, इसे ग्रामीण नजदीक के जंगलों से फांचा (ढेरी) बना कर लाते हैं। उन्हें 2 रुपये प्रति किलो की दर से भुगतान करते हैं। एक बार में एक ग्रामीण औसतन 35 से 40 किलो तक पिरूल लाते हैं।
 
विज्ञापन

8 of 8
pirul
पिरूल से विद्युत उत्पादन के लिए बायोमास के रूप में प्रयोग से बहुआयामी फायदे हैं। विद्युत उत्पादन के अलावा जंगल की सतह से पिरूल एकत्रीकरण से आग का खतरा नहीं रहेगा, इससे वन औषधि और जल स्रोतों को भी सुरक्षा मिलेगी। पिरूल एकत्रीकरण से ग्रामीणों को रोजगार मिलेगा। विद्युत उत्पादन के बाद पिरूल के अपशिष्ट का प्रयोग कोयला बनाने में होगा। खाना बनाने में इसके प्रयोग से पेड़ों के कटान में कमी आएगी।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें