चीन को मालामाल करने वाला 'वरदान' अब भारत पर भी धन वर्षा करेगा। इस वरदार से चीन सालाना 12 हजार करोड़ कमाता है।
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भारत को मिला चीन को मालामाल करने वाला ये 'वरदान'
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उत्तराखंड वन पंचायत सलाहकार परिषद के अध्यक्ष कुंवर सिंह नेगी का कहना है कि चीन अमेस से सालाना 12 हजार करोड़ का कारोबार करता है। उनका कहना है कि सदियों से स्थानीय लोग इसके गुण समझते हैं।
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मंगोल शासक चंगेज खां अपने फौज की सेहत दुरुस्त रखने के लिए सिपाहियों को अमेस का जूस पिलाता था। बोटेनिकल सर्वे आउ इंडिया के क्षेत्रीय कार्यालय के संयुक्त निदेशक डॉ. एसके श्रीवास्तव ने बताया कि उच्च हिमालयी क्षेत्र में पाए जाने वाले फल अमेस को लेह बेरी भी कहते हैं। विज्ञानियों ने इसकी उपयोगिता की पुष्टि कर दी है।
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इको सिस्टम सर्विसेस को कारोबार से जोड़ने की विश्व स्तरीय खोज में उच्च हिमालयी शुष्क शीत क्षेत्रों में पैदा होने वाला फल अमेस वरदान साबित होने जा रहा है।
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अमेस (हिपोपी रेनाइडिस) उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और लेह (जम्मू-कश्मीर) में बहुतायत में मिलता है। उत्तराखंड सरकार वन पंचायतों के माध्यम से अमेस के विकास के संबंध में कार्ययोजना तैयार कर रही है।
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इसके विकास के लिए डीआरडीओ के डिफेंस इंस्टीट्यूट आफ हाई एल्टीट्यूड आफ रिसर्च सेंटर ने निजी कंपनियों के साथ एमओयू साइन किया है। बोटेनिकल सर्वे आफ इंडिया के वैज्ञानिकों ने अमोस की उपयोगिता की पुष्टि कर दी है।
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विज्ञानियों का कहना है कि अमेस के फल में विटामिन ए, सी, ई के साथ फोलिक एसिड आदि तत्व होते हैं। सांस रोग समेत कई बीमारियों की दवाएं इससे बनती हैं।
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साथ ही अमेस की झाडियों का घरों की चहारदीवारी के रूप में भी इस्तेमाल होता है। यह इको सिस्टम को संरक्षित करने के घटक के रूप में भी काम करता है। अमेस की झाडियां मिट्टी को बांधे रखती हैं।
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ये बारिश में मिट्टी के कटान को रोकती हैं। वन विभाग अमेस की झाड़ियों को मध्य हिमालयी क्षेत्र में लगाने की कार्ययोजना तैयार कर रहा है ताकि इसके फलों के उपयोग के साथ मिट्टी का कटान रोका जा सके।
प्रमुख वन संरक्षक (वन पंचायत) राजेंद्र कुमार का कहना है कि वन पंचायतों के माध्यम से इस संरक्षित किया जा रहा है। क्षेत्रीय लोग सदियों से इसका इस्तेमाल कर रहे हैं। वे इसकी खूबियां जानते हैं। यह बदरीनाथ तथा अन्य उच्च हिमालयी क्षेत्रों में होता है। इसकी नर्सरियों को प्रोत्साहित किया जा रहा है ताकि यह रोजगार से जुड़ सके। (स्टोरी: रजा शास्त्री)