भारत में कई ऐसी जगह हैं जो अपनी अनोखी परंपराओं के कारण विश्वविख्यात हैं। ऐसी ही एक परम्परा रक्षाबंधन के दिन निभाई जाती है। जहां एक अनोखा युद्घ खेला जाता है। जिसमें लोग एक दूसरे की जान के प्सासे हो जाते हैं।
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devidhura mela
उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल में मां वाराही धाम में श्रावणी पूर्णिमा (रक्षाबंधन के दिन) को यहां के स्थानीय लोग चार दलों में विभाजित होकर पत्थरों से युद्घ करते हैं।
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bagwal war
- फोटो : AmarUjala
इन चार दलों को खाम कहा जाता है, जिनमें क्रमशः चम्याल खाम, बालिक खाम, लमगडिया खाम, और गडहवाल होते हैं। ये चार दल दो समूहों में बंट जाते हैं और इसके बाद युद्ध होता है जिसमें पत्थरों को अस्त्र के रूप में उपयोग किया जाता है।
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- फोटो : AmarUjala
इस पत्थरमार युद्ध को स्थानीय भाषा में ‘बग्वाल’ कहा जाता है। यह बग्वाल कुमाऊं की संस्कृति का अभिन्न अंग है। श्रावण मास में पूरे पखवाड़े तक देवीधुरा में मेला लगता है। हालांकि प्रशासन ने अब इस परंपरा में बदलाव करते हुए फूलों से बग्वाल खेलने के निर्देश दिए है। करीब पांच कुंतल नाशपाती व दो कुंतल फूलों से बग्वाल खेली जाएगी। कुछ साल पहले तक यहां पत्थरों से बग्वाल खेली जाती थी और इसमें कई लोग सिर फूटने से घायल हो जाते थे।
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- फोटो : AmarUjala
जहां सबके लिये यह दिन रक्षाबंधन का दिन होता है वहीं देवीधुरा के लिये यह दिन पत्थर-युद्ध अर्थात 'बग्वाल का दिवस' होता है। इस पाषाण युद्ध है जिसको देखने देश के कोने-कोने से दर्शनार्थी आते हैं। इस पाषाण युद्ध में चार खानों के दो दल एक दूसरे के ऊपर पत्थर बरसाते हैं।
इस युद्घ में कई लोग घायल भी होते हैं। बग्वाल खेलने वाले अपने साथ बांस के बने फर्रे पत्थरों को रोकने के लिए रखते हैं। मान्यता है की बग्वाल खेलने वाला व्यक्ति यदि पूर्णरूप से शुद्ध व पवित्रता रखता है तो उसे पत्थरों की चोट नहीं लगती है।