सबको लुभाने वाली देहरादून की वादियां हमारे पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को भी बहुत पसंद थीं। आजादी से पहले और बाद में वे अपने पूरे परिवार के साथ यहां वक्त बिताना पसंद करते थे। नेहरू का देहरादून के प्रति यह प्रेम और लगाव जीवन भर बना रहा। विडंबना यह है कि उनके जीवन के अंतिम चार दिन भी देहरादून में ही बीते थे। उनके जीवन से जुड़े कुछ ऐसे ही पलों की कहानी 92 वर्षीय अनुभवी पत्रकार और लेखक राज कंवर ने अमर उजाला के साथ साझा की।
उन्होंने बताया कि नेहरू जी पहली बार वर्ष 1906 में मसूरी आए थे। तब उनकी उम्र मात्र16 साल थी। मसूरी की वादियां उन्हें इतनी पसंद आईं कि उसके बाद वे गर्मियों के दौरान आराम और विश्राम के लिए अक्सर मसूरी जाते थे। अमूमन उनके साथ उनके पिता, माता, पत्नी, बेटी, बहनें और भतीजी होते थे। तब वे मसूरी के सेवाय होटल में ठहरना पसंद करते थे।
उस वक्त देश के नक्शे पर देहरादून भले ही उस समय एक छोटा बिंदु मात्र था लेकिन वह राष्ट्रीय स्तर के नेताओं को आकर्षित करता था। नेहरू ने यहां कई राजनीतिक दौरे भी किए। कभी स्वेच्छा से तो कभी अनिच्छा से, क्योंकि कई बार उन्हें तत्कालीन ब्रिटिश सरकार के ‘अतिथि’के रूप में यहां लाया गया था। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान जब भी उन्हें गिरफ्तार किया जाता तो वे देहरादून जेल को तरजीह देते थे जिस पर ब्रिटिश सरकार उन्हें यहां की जेल में ही रखती थी। वे तीन बार देहरादून जेल लाए गए। जून 1934 में यहां जेल में ही उन्होंने अपनी बहुप्रशंसित आत्मकथा लिखनी शुरू की थी। उस वक्त एकांत कारावास में उनके साथी यहां के पंछी हुआ करते थे। उन्होंने अपनी आत्मकथा में इसका जिक्र भी किया कि वे जेल की कोठरी से पहाड़ों को नहीं देख सकते थे मगर महसूस करते थे।