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सिक्किम, तिब्बत, अरुणाचल को लेकर खुली चीन के झूठे दावों की पोल, ये है सच

Mon, 10 Jul 2017 08:44 AM IST
गौरव मिश्रा/ अमर उजाला, देहरादून
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china - फोटो : Getty Images
सिक्किम, तिब्बत और अरुणाचल प्रदेश को लेकर चीन जो दावे कर रहा है, वे खोखले हैं। देहरादून के चार बड़े और पुराने बौद्ध मठों के पास मौजूद सैकड़ों साल पुरानी पांडुलिपियां से चीन के झूठे दावों की पोल खुली है।
 
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भूटान के बारे में 10 बातें - फोटो : Reuters
देहरादून के इन मठों में सभी तिब्बती-लद्दाखी बौद्ध संप्रदायों की धाराओं के संत रहे हैं। सबसे पुरानी बसावटों में से एक इन मठों के पास 1200 से 1300 साल पुरानी कई मूल पांडुलिपियां हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक ये पांडुलिपियां साबित करती हैं कि भारत के तिब्बत, भूटान, सिक्किम के साथ सैकड़ों वर्षों से सांस्कृतिक, धार्मिक, राजनीतिक संबंध रहे हैं।
 
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tibbetans
सांगसेन लाइब्रेरी रिसर्च सेंटर, देहरादून के निदेशक डॉ. ताशी सैंफल कहते हैं कि भोटिया भाषा की जड़ों में संस्कृत, पाली, रंजना व नेवारी लिपि है। तिब्बत के बौद्ध धम्म सम्राट सौंगसेन गैंपो ने भी शीर्ष तिब्बती विद्वानों व राजनयिकों को भारत में लिपि का ज्ञान लेने के लिए ही भेजा था।

 

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चीन की दो-टूक, सिक्किम सीमा से सेना हटाने पर ही होगी भारत से बातचीत - फोटो : AP
शाक्य सेंटर, देहरादून के निदेशक सोनम छोग्याल कहती हैं कि बौद्ध मठों के पास मौजूद पाडुलिपियां साबित करती हैं कि भारत के तिब्बत व दूसरे हिमालयी राज्यों के साथ सामरिक, धार्मिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक संबंध थे जबकि चीन से उनकी दूरी रही है।

 
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सांकेतिक चित्र - फोटो : getty images
मालूम हो कि चीन बार-बार तिब्बत पर अपना हक जताता रहा है। बीते 19 दिनों से चीन की सेना द्वारा भारत-भूटान-चीन के ट्राइ-जंक्शन क्षेत्र में दोकलम इलाके के पास सड़क निर्माण को लेकर गतिरोध कायम है। चूंकि भूटान के चीन से कूटनीतिक रिश्ते नहीं हैं जबकि भारत उसे सैन्य और कूटनीतिक रूप से समर्थन देता है। ऐसे में चीन इस इलाके को अपना बताते हुए सड़क निर्माण कर रहा है। भारतीय सेना इसका विरोध करते हुए सीमा पर डटी हुई है।

 
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बुद्ध
निगमा सेंटर, देहरादून के वरिष्ठ प्रशासक तेनक्याप लामा ने कहा कि हमारे पास ऐसी पांडुलिपियां हैं जो चीन की पोल खोल देंगी। सिक्किम, तिब्बत, भूटान के साथ भारत के हजारों वर्ष पुराने संबंध रहे हैं। यहां बौद्ध धर्म का प्रचार करने के लिए भारत से ही धर्मप्रचारक गए थे। शाक्या, निगमा, काज्यू, गैलूक सभी तिब्बती बौद्ध संप्रदायों का मूल भारत ही रहा है। ये पांडुलिपियां अंतरराष्ट्रीय पटल पर भारतीय पक्ष को सही साबित कने में सक्षम हैं। 
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