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देवभूमि के देवीधुरा में खेला गया युद्ध, 30 हजार से ज्यादा लोग बने साक्षी, 122 रणबांकुरे घायल

Fri, 16 Aug 2019 02:06 PM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंपावत
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- फोटो : अमर उजाला
चंपावत जिले के बाराही धाम देवीधुरा में रक्षाबंधन के मौके पर खोलीखाड़ दुर्बाचौड़ मैदान में खेली गई ऐतिहासिक बग्वाल के साक्षी 30 हजार से ज्यादा लोग बने। करीब दस मिनट तक चले बग्वाल युद्ध में 122 लोग घायल हुए। जिन्हें प्राथमिक उपचार के बाद छुट्टी दे दी गई। ऐतिहासिक बगवाल को देखने के लिए पूर्व सीएम भगत सिंह कोश्यारी, पूर्व केंद्रीय राज्य मंत्री और सांसद अजय टम्टा, विधायक पूरन सिंह फर्त्याल, राम सिंह कैंडा सहित सैकड़ों लोग शामिल रहे।
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- फोटो : अमर उजाला
मेले के दौरान देवीधुरा की सड़कों में पांव रखने को जगह नहीं थी। पुलिस ने करीब दो किमी पहले ही वाहन रोक दिए थे। जिले समेत आसपास के जिलों की पुलिस लगाई गई थी। मेले का संचालन भुवन चंद्र जोशी ने किया।
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- फोटो : अमर उजाला
देवीधुरा का बग्वाल यहां के लोगों की धार्मिक मान्यता का पवित्र रूप है। किंवदंती है कि एक वृद्धा के पौत्र का जीवन बचाने के लिए यहां के चारों खामों की विभिन्न जातियों के लोग आपस में युद्ध कर एक मानव के रक्त के बराबर खून बहाते हैं। क्षेत्र में रहने वाली विभिन्न जातियों में से चार प्रमुख खामों चम्याल, वालिक, गहरवाल और लमगडिय़ा के लोग पूर्णिमा के दिन पूजा अर्चना कर एक दूसरे को बगवाल का निमंत्रण देते हैं।
 

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कहा जाता है कि पूर्व में यहां नरबलि देने की प्रथा थी, लेकिन जब चम्याल खाम की एक वृद्धा के एकमात्र पौत्र की बलि देने की बारी आई तो वंश नाश के डर से उसने मां बाराही की तपस्या की। माता के प्रसन्न होने पर वृद्धा की सलाह पर चारों खामों के मुखियाओं ने आपस में युद्ध कर एक मानव के बराबर रक्त बहाकर कर पूजा करने की बात स्वीकार ली, तभी से ही बगवाल का सिलसिला चला आ रहा है।
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बग्वाल में भाग लेने के लिए रणबांकुरों को विशेष तैयारियां करनी होती हैं। बग्वाल लाठी और रिंगाल की बनी ढालों से खेली जाती है। स्वयं को बचाकर दूसरे दल की ओर से फेंके गए फल, फूल या पत्थर को फिर से दूसरी ओर फेंकना ही बग्वाल कहलाता है।
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अतीत से ही आषाड़ी कौतिक के नाम से मशहूर देवीधुरा की बग्वाल को देखने देश-विदेश के हजारों पर्यटक और श्रद्धालु देवीधुरा पहुंचते हैं। पांच वर्ष पूर्व तक बग्वाल पत्थरों से खेली जाती थी, लेकिन हाईकोर्ट के रोक लगाने के बाद अब फल और फूलों से बगवाल युद्ध लड़ा जा रहा है।
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