उत्तराखंड को देवभूमि कहा जाता है। माना जाता है कि भगवान यहां विराजते हैं। इसीलिए दुनिया भर से श्रद्घालुगण यहां शांति की तलाश में आते हैं। आइए हम आपको बताते हैं बदरीनाथ मंदिर की स्थापना की कहानी।
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बदरीनाथ
पौराणिक मान्यता है कि जब गंगा नदी धरती पर अवतरित हुई, तो यह 12 धाराओं में बंट गई। बदरीनाथ स्थान पर मौजूद धारा अलकनंदा के नाम से विख्यात हुई और यह स्थान बदरीनाथ, भगवान विष्णु का वास बना। शंकराचार्य, आठवीं शताब्दी के दार्शनिक संत ने इसका निर्माण कराया था।
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बदरीनाथ
चमोली जनपद में स्थित बदरीनाथ में एक मंदिर है, जिसमें बदरीनाथ या विष्णु की वेदी है। ऐसा माना जाता है कि यह 2,000 वर्ष से भी अधिक समय से एक प्रसिद्ध तीर्थ स्थान रहा है।
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शंकराचार्य
- फोटो : google
बदरीनाथ की मूर्ति शालग्रामशिला से बनी हुई, चतुर्भुज ध्यानमुद्रा में है। कहा जाता है कि यह मूर्ति देवताओं ने नारदकुण्ड से निकालकर स्थापित की थी। शंकराचार्य की प्रचार-यात्रा के समय बौद्ध अनुयायी तिब्बत जाते हुए मूर्ति को अलकनन्दा में फेंक गए थे। शंकराचार्य ने अलकनन्दा से इस मूर्ति को पुन: बाहर निकालकर उसकी स्थापना की। तदनन्तर मूर्ति फिर स्थानान्तरित की गई। और तीसरी बार तप्तकुण्ड से निकालकर रामानुजाचार्य ने इसकी स्थापना की।
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नीलकंठ पर्वत
पौराणिक कथाओं और यहां की लोक कथाओं के अनुसार यहां नीलकंठ पर्वत के समीप भगवान विष्णु ने बाल रूप में अवतरण किया था। लेकिन, यह स्थान पहले शिव भूमि (केदार भूमि) के रूप में व्यवस्थित था।
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पार्वती और शिव
भगवान विष्णुजी अपने ध्यानयोग हेतु स्थान खोज रहे थे और उन्हें अलकनंदा नदी के समीप यह स्थान बहुत भा गया। उनकी आवाज सुनकर माता पार्वती का हृदय द्रवित हो गया। फिर माता पार्वती और शिवजी स्वयं उस बालक के समीप पहुंचे।
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माता पार्वती ने पूछा कि बालक तुम्हें क्या चहिये? तो बालक ने ध्यानयोग करने हेतु वह स्थान मांग लिया। इस तरह से रूप बदल कर भगवान विष्णु ने शिव-पार्वती से यह स्थान अपने ध्यानयोग हेतु प्राप्त कर लिया। यही पवित्र स्थान आज बदरीविशाल के नाम से जाना जाता है।
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जब भगवान विष्णु योगध्यान मुद्रा में तपस्या में लीन थे तो बहुत अधिक हिमपात होने लगा। भगवान विष्णु हिम में पूरी तरह डूब चुके थे। उनकी इस दशा को देख कर माता लक्ष्मी का हृदय द्रवित हो उठा और उन्होंने स्वयं भगवान विष्णु के समीप खड़े हो कर एक बेर (बदरी) के वृक्ष का रूप ले लिया और समस्त हिम को अपने ऊपर सहने लगीं।
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लक्ष्मीजी भगवान विष्णु को धूप, वर्षा और हिम से बचाने की कठोर तपस्या में जुट गयीं। कई वर्षों बाद जब भगवान विष्णु ने अपना तप पूर्ण किया तो देखा कि लक्ष्मीजी हिम से ढकी पड़ी हैं। तो उन्होंने माता लक्ष्मी के तप को देख कर कहा कि हे देवी! तुमने भी मेरे ही बराबर तप किया है सो आज से इस धाम पर मुझे तुम्हारे ही साथ पूजा जायेगा।
जहां भगवान बदरीनाथ ने तप किया, वही पवित्र-स्थल आज तप्त-कुण्ड के नाम से विश्व-विख्यात है और उनके तप के रूप में आज भी उस कुण्ड में हर मौसम में गर्म पानी उपलब्ध रहता है।