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बदरीनाथ धाम में पूजा के समय रावल को बनना पड़ता है स्त्री, जानिए इसके पीछे की रोचक कहानी

Fri, 17 Nov 2017 06:31 PM IST
टीम डिजिटल/अमर उजाला, देहरादून
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badrinath dham
भगवान शिव के धाम बदरीनाथ के गर्भगृह में पूजा के समय वहां के रावल को स्त्री का रूप धारण करना पड़ता है। चलिए जानते हैं इसके पीछे की रोचक कहानी...
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बदरीनाथ धाम के कपाट बंद होने और खुलने के दिन रावल साड़ी पहन कर पार्वती का श्रृंगार करके ही गर्भगृह में प्रवेश करते हैं। इसके बाद पूजा अर्चना होती है और तभी कपाट खोले जाते हैं।
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badrinath rawal - फोटो : AmarUjala
इस मान्यता की वजह से ही पहाड़ में रावल को लोग भगवान की तरह पूजते हैं। वे उन्हें पार्वती का रूप भी मानते हैं। पहाड़ में जो लोग रावल को नहीं पूजते हैं उसे लोग अच्छा नहीं मानते हैं।

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badrinath dham
वहीं कहा जाता है कि, मंदिर के रावल सखी बनकर लक्ष्मी मंदिर में जाते हैं। मान्यता यह कि उद्धव ही कृष्ण के बाल सखा है और उम्र में बड़े, इसलिए लक्ष्मी जी के जेठ हुए। हिन्दू परंपरा के अनुसार जेठ के सामने बहू नहीं आती है। इसलिए पहले जेठ बाहर आयेंगे तब लक्ष्मी को विराजा जाएगा।
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badrinath - फोटो : amarujala
कहा जाता है क‌ि बदरीनाथ की मूर्ति शालग्रामशिला से बनी हुई है। जानकारों के मुताब‌िक यह मूर्ति देवताओं ने नारदकुण्ड से निकालकर स्थापित की थी। सिद्ध, ऋषि, मुनि इसके प्रधान अर्चक थे।
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badrinath - फोटो : amarujala
जब बौद्धों का प्राबल्य हुआ तब उन्होंने इसे बुद्ध की मूर्ति मानकर पूजा आरम्भ की। शंकराचार्य की प्रचार-यात्रा के समय बौद्ध तिब्बत भागते हुए मूर्ति को अलकनन्दा में फेंक गए।
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badrinath - फोटो : amarujala
आदिशंकराचार्य भारत-भ्रमण के क्रम में जब यहां आए, तो उन्होंने नारदकुंड में प्रवेश करके विष्णु के इस विग्रह का उद्धार किया और बद्रीनाथ के रूप में इसकी प्राण-प्रतिष्ठा की।
इसल‌िए बद्रीनाथ के दो और नाम द‌िए गए हैं। बदरीनाथ एवं बद्रीविशाल। जानकारों के मुताब‌िक बद्रीनाथ क्षेत्र में बदरी(बैर) के जंगल थे, इसलिए इस क्षेत्र में स्थित विष्णु के विग्रह को बद्रीनाथ की संज्ञा प्राप्त हुई।
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