टीम को जब-जैसी जरूरत पड़ी उस भूमिका में उतर गए। इंग्लैंड दौरे पर जब बीच मैच में जहीर चोटिल होकर बाहर बैठ गए तो, राहुल द्रविड़ को विकेटकीपिंग ग्लव्स थमा, धोनी ने गेंदाबाजी की भी कमान संभाल ली। वह अपने समकक्ष विकेटकीपर्स से सिर्फ बल्लेबाजी में आगे नहीं निकले बल्कि विकेट के पीछे भी असाधारण ही रहे। आमतौर पर, जब किसी स्पिनर की गेंद विकेटकीपर के ग्लव्स में पहुंचती है, तो कीपर उसकी गति और अपनी हथेली के संपर्क से उत्पन्न होने वाले घर्षण को कम करने के लिए हाथों को पीछे की ओर ले जाते हुए गेंद पकड़ता है, इसे भौतिक विज्ञान की भाषा में जड़त्व का नियम भी कह सकते हैं।
तमाम विकेटकीपर इसी नियम के अनुसार अभ्यास करते हैं, लेकिन जितना समय ग्लव्स को पीछे ले जाते हुए गेंद पकड़ने में लगता है, उमसें स्टंपिंग के मौके कम हो जाते हैं। धोनी की उपलब्धि यह रही है कि उन्होंने स्टंपिंग के समाप्त होने वाले मौके को परिणाम में बदला। चीते सी फुर्ती दिखाई। यहां तक कि डीआरएस को धोनी रीव्यू सिस्टम बना डाला।
विदाई के आंसू फैंस की आंखों की कोर पर ही आकर अटक गए
इस देश को माही से कोई शिकायत नहीं है। हिंदुस्तान के क्रिकेटप्रेमियों की आंखों में जितने भी सपने थे, माही ने सब साकार किए। हम सभी चाहते थे कि वह जब आखिरी बार मैदान से लौटें तो हेलमेट पहनकर नहीं, बल्कि हाथों में लेकर लौटें, क्योंकि अक्सर वो आउट होने के बाद बिना हेलमेट उतारे ही पवेलियन लौटते थे।
पूरा हिंदुस्तान उन्हें आखिरी बार मैदान से नाबाद लौटते हुए देखना चाहता था, लेकिन वो चुप-चाप निकल गए। धोनी तुम्हारी विदाई के आंसू इस देश के क्रिकेट प्रेमियों की आंखों की कोर पर ही आकर अटक गए हैं, तुम मैदान से अलविदा कहते तो, ये आंसू छलककर बाहर निकल आते और शायद यही हमारी ओर से तुम्हारे ऐतिहासिक कामों का मेहनताना होता।