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धोनी लंबी प्रतीक्षाओं का वो परिणाम थे, जिसके अभाव को भारतीय क्रिकेट ने जिया

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एमएस धोनी - फोटो : सोशल मीडिया
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महेंद्र सिंह धोनी, एक बल्लेबाज, बेहतरीन विकेटकीपर और शानदार कप्तान। 15 अगस्त की शाम धोनी ने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट को अलविदा कह दिया। यानी यह फिनिशर अब कभी नीली जर्सी में नहीं दिखेगा। लगभग 16 साल के इंटरनेशनल क्रिकेट करियर का अंत एक इंस्टाग्राम पोस्ट से हुआ। इसका अंदाजा तो साल भर पहले ही लग गया था, जब न्यूजीलैंड के खिलाफ महज दो इंच की दूरी ने विश्व कप 2019 की ट्रॉफी हमसे मीलों दूर कर दी और पवेलियन की तरफ लौटते धोनी की तस्वीर ने सभी के दिल में मानो खंजर मार दिया।

बदल गई विकेटकीपर की भूमिका

माही विकेट के पीछे चुपचाप खड़े होकर भारतीय क्रिकेट के हर उस खाली पन्ने पर अपने हुनर की स्याही से इतिहास लिखते गए, जिसपर कई महारथी कलम तक नहीं चला पाए थे। धोनी लंबी प्रतीक्षाओं का परिणाम थे, जिसके अभाव-काल को भारतीय क्रिकेट ने जिया, इसे समझने के लिए विश्व क्रिकेट में थोड़ा पीछे लौटते हैं। साल 1991 में विश्व क्रिकेट के पटल पर पहली बार एडम गिलक्रिस्ट का नाम सामने आया।

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'गिल्ली' का अब तक अंतरराष्ट्रीय डेब्यू तो नहीं हुआ था, लेकिन उनके खास हुनर की चर्चा चल निकली थी। ऑस्ट्रेलिया के इस खब्बू खिलाड़ी ने बताया कि विकेटकीपर का काम ग्लव्स पहनकर सिर्फ विकेट के पीछे खड़े होना नहीं बल्कि बल्ला भी चलाना है। विकेटकीपर के निचले क्रम पर उतरने की परिपाटी को गिलक्रिस्ट ने बदलकर रख दिया और विकेटकीपर्स के नए मानक तय किए। 

खत्म किया भारत का सूखा

दक्षिण अफ्रीकी टीम को मॉर्क बाउचर के रूप में एक शानदार विकेटकीपर-बल्लेबाज मिला। श्रीलंका को कालूविथरना, कुमार संगकारा और न्यूजीलैंड को ब्रेंडन मैकुलम के रूप में ऐसे खिलाड़ी मिले, जो विशुद्ध बल्लेबाजी के लिए पहचाने जाते थे और विकेट के पीछे भी शानदार काम करते। मगर भारत का इंतजार चलता रहा। 

भारत की यह खोज 2004 में खत्म हुई। लंबे इंतजार के बाद धोनी ने भारतीय क्रिकेट में विकेटकीपर-बल्लेबाज के सूखे को खत्म किया। धोनी, एक बेहतरीन विकेटकीपर और शानदार बल्लेबाज रहे साथ ही एक ऐसे कप्तान थे, जो हर छोटी-बड़ी ट्रॉफी जीतकर खिलाड़ियों को पकड़ा देते और खुद को पीछे कर लेते।

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जो अनहोनी को होनी कर दे वही धोनी

महेंद्र सिंह धोनी - फोटो : ट्विटर

टीम को जब-जैसी जरूरत पड़ी उस भूमिका में उतर गए। इंग्लैंड दौरे पर जब बीच मैच में जहीर चोटिल होकर बाहर बैठ गए तो, राहुल द्रविड़ को विकेटकीपिंग ग्लव्स थमा, धोनी ने गेंदाबाजी की भी कमान संभाल ली। वह अपने समकक्ष विकेटकीपर्स से सिर्फ बल्लेबाजी में आगे नहीं निकले बल्कि विकेट के पीछे भी असाधारण ही रहे। आमतौर पर, जब किसी स्पिनर की गेंद विकेटकीपर के ग्लव्स में पहुंचती है, तो कीपर उसकी गति और अपनी हथेली के संपर्क से उत्पन्न होने वाले घर्षण को कम करने के लिए हाथों को पीछे की ओर ले जाते हुए गेंद पकड़ता है, इसे भौतिक विज्ञान की भाषा में जड़त्व का नियम भी कह सकते हैं।

तमाम विकेटकीपर इसी नियम के अनुसार अभ्यास करते हैं, लेकिन जितना समय ग्लव्स को पीछे ले जाते हुए गेंद पकड़ने में लगता है, उमसें स्टंपिंग के मौके कम हो जाते हैं। धोनी की उपलब्धि यह रही है कि उन्होंने स्टंपिंग के समाप्त होने वाले मौके को परिणाम में बदला। चीते सी फुर्ती दिखाई। यहां तक कि डीआरएस को धोनी रीव्यू सिस्टम बना डाला। 

विदाई के आंसू फैंस की आंखों की कोर पर ही आकर अटक गए

इस देश को माही से कोई शिकायत नहीं है। हिंदुस्तान के क्रिकेटप्रेमियों की आंखों में जितने भी सपने थे, माही ने सब साकार किए। हम सभी चाहते थे कि वह जब आखिरी बार मैदान से लौटें तो हेलमेट पहनकर नहीं, बल्कि हाथों में लेकर लौटें, क्योंकि अक्सर वो आउट होने के बाद बिना हेलमेट उतारे ही पवेलियन लौटते थे।

पूरा हिंदुस्तान उन्हें आखिरी बार मैदान से नाबाद लौटते हुए देखना चाहता था, लेकिन वो चुप-चाप निकल गए। धोनी तुम्हारी विदाई के आंसू इस देश के क्रिकेट प्रेमियों की आंखों की कोर पर ही आकर अटक गए हैं, तुम मैदान से अलविदा कहते तो, ये आंसू छलककर बाहर निकल आते और शायद यही हमारी ओर से तुम्हारे ऐतिहासिक कामों का मेहनताना होता।

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