रणजी ट्रॉफी में पहली बार जम्मू-कश्मीर क्रिकेट टीम ने कड़े संघर्ष और वर्षों की मेहनत के बाद खिताब जीतकर इतिहास रच दिया। कमजोर मानी जाने वाली टीम ने आत्मविश्वास, बेहतर नेतृत्व और संरचनात्मक बदलाव के दम पर नई पहचान बनाते हुए भारतीय घरेलू क्रिकेट में प्रेरणादायक मिसाल पेश की।
रणजी ट्रॉफी के इतिहास में इस बार एक नया अध्याय जुड़ा, जब जम्मू-कश्मीर ने तमाम संघर्षों और उतार-चढ़ावों को पीछे छोड़ते हुए पहली बार खिताब अपने नाम किया। यह जीत सिर्फ एक ट्रॉफी भर नहीं, बल्कि दशकों की मेहनत, धैर्य और आत्मविश्वास का परिणाम है।
संघर्ष से शिखर तक का सफर
जम्मू-कश्मीर ने 1959-60 सत्र में रणजी ट्रॉफी में पहली बार हिस्सा लिया था। शुरुआती वर्षों में टीम को कभी भी मजबूत दावेदार नहीं माना गया। इस सत्र से पहले उसने 334 मुकाबले खेले थे, जिनमें से केवल 45 में जीत दर्ज की थी। अपनी पहली जीत हासिल करने में उसे 44 साल लग गए 1982-83 में सेना के खिलाफ मिली वह जीत टीम के लिए ऐतिहासिक थी।
लंबे समय तक जम्मू-कश्मीर को अपेक्षाकृत कमजोर टीम माना जाता रहा। 90 के दशक में कई बड़ी टीमें उसके खिलाफ मुकाबले को आसान मानती थीं। दिल्ली के कुछ पूर्व खिलाड़ियों के संस्मरण इस बात की गवाही देते हैं कि उस दौर में जम्मू-कश्मीर के खिलाफ मैच को रन बनाने का सुनहरा मौका समझा जाता था। दिग्गज बल्लेबाजों की मौजूदगी ही उसके खिलाड़ियों के लिए दबाव का कारण बन जाती थी। लेकिन समय बदला, सोच बदली और टीम की मानसिकता भी बदली।
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जम्मू-कश्मीर ने जीता खिताब
- फोटो : PTI
पहली बड़ी आहट
2013-14 सत्र में जम्मू-कश्मीर ने नेट रन रेट के आधार पर गोवा को पीछे छोड़ते हुए क्वार्टर फाइनल में जगह बनाई। यह उपलब्धि टीम के आत्मविश्वास को नई दिशा देने वाली साबित हुई। इसके बाद 2015-16 में कप्तान परवेज रसूल की अगुवाई में टीम ने वानखेड़े स्टेडियम में मुंबई को हराकर सनसनी फैला दी। वह जीत जम्मू-कश्मीर के क्रिकेट इतिहास की सबसे बड़ी जीतों में से एक मानी गई।
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दिल्ली का योगदान और बदलाव की बुनियाद
जम्मू-कश्मीर के इस उत्थान में दिल्ली के क्रिकेट जगत का योगदान महत्वपूर्ण रहा। पूर्व भारतीय कप्तान बिशन सिंह बेदी का कोच के रूप में टीम से जुड़ना एक निर्णायक मोड़ साबित हुआ। उन्होंने खिलाड़ियों में यह विश्वास भरा कि वे सिर्फ भाग लेने के लिए नहीं, बल्कि प्रतिस्पर्धा करने और जीतने के लिए मैदान में उतरते हैं। चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता और अनुशासन लाने की उनकी कोशिशों ने टीम की बुनियाद मजबूत की।
इसके बाद संजय शर्मा जैसे पूर्व खिलाड़ियों ने भी कोचिंग के जरिए टीम को दिशा दी। लेकिन असली संरचनात्मक बदलाव तब आया जब जम्मू के मूल निवासी मिथुन मन्हास को जम्मू-कश्मीर क्रिकेट संघ की जिम्मेदारी सौंपी गई। उन्होंने प्रशासनिक सुधारों के जरिए टीम के भीतर स्थिरता और पेशेवर माहौल तैयार किया। मन्हास का सबसे अहम निर्णय था अजय शर्मा को मुख्य कोच नियुक्त करना। अजय शर्मा ने कप्तान पारस डोगरा के साथ मिलकर टीम में आक्रामकता, आत्मविश्वास और जीतने की संस्कृति विकसित की। दिल्ली की प्रतिस्पर्धी मानसिकता और अनुशासन को जम्मू-कश्मीर की नई पीढ़ी ने आत्मसात किया।
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ऐतिहासिक फाइनल और खिताबी जीत
फाइनल में जम्मू-कश्मीर का मुकाबला कर्नाटक क्रिकेट टीम से था। पहली पारी में 291 रन की बड़ी बढ़त हासिल कर टीम ने मैच पर पकड़ मजबूत कर ली। पांचवें दिन दूसरी पारी में चार विकेट पर 342 रन बनाकर कुल बढ़त 633 रन तक पहुंचा दी गई। इसके बाद कप्तान पारस डोगरा ने पारी घोषित की और मैच ड्रॉ पर समाप्त हुआ, लेकिन पहली पारी की बढ़त के आधार पर जम्मू-कश्मीर ने खिताब अपने नाम कर लिया।
एक नई पहचान
यह जीत उन तमाम वर्षों के संघर्ष का प्रतीक है, जब टीम को हल्के में लिया जाता था। अब हालात बदल चुके हैं। जिस टीम के खिलाफ कभी रन बनाने की योजनाएं बनती थीं, वही टीम अब देश की सर्वश्रेष्ठ बनकर उभरी है। जम्मू-कश्मीर की यह उपलब्धि सिर्फ खेल की जीत नहीं, बल्कि विश्वास, सुधार और सही मार्गदर्शन की जीत है। संघर्ष से शिखर तक की यह कहानी भारतीय घरेलू क्रिकेट में प्रेरणा का नया अध्याय बन चुकी है।