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Harmanpreet: दुपट्टा बांधकर तेज गेंदें फेंकने वाली लड़की बनी विश्व विजेता, मोगा की बेटी हरमनप्रीत कौर की कहानी

Mon, 03 Nov 2025 03:01 PM IST
स्वप्निल शशांक स्पोर्ट्स डेस्क, अमर उजाला, मुंबई

सार

हरमनप्रीत ने अपने करियर में जितनी बार हार देखी, उतनी ही बार सीखा। उन्होंने कहा था, 'इतना हार लिया है कि अब हार से डर नहीं लगता… हर हार ने मुझे कुछ सिखाया है।'
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हरमनप्रीत कौर - फोटो : PTI
पंजाब के मोगा जिले की एक छोटी सी लड़की, जिसके कमर पर बंधा दुपट्टा उसकी स्पीड और जज्बे को नहीं रोक पाया, आज भारतीय महिला क्रिकेट की सबसे बड़ी पहचान बन चुकी है।
वह लड़की थी हरमनप्रीत कौर, जिसने अपने जुनून, संघर्ष और नेतृत्व से भारत को पहला आईसीसी महिला वनडे विश्व कप दिलाया।

उन दिनों गुरु नानक कॉलेज ग्राउंड पर वह अपने स्कूल यूनिफॉर्म में लड़कों को अपनी तेज गेंदों से परेशान करती थी। उनके कोच कमलदीश सिंह सोढी आज भी वह पल याद करते हैं। उन्होंने बताया,'मैं मॉर्निंग जॉग पर था, तभी देखा कि एक लड़की इतनी रफ्तार से गेंद फेंक रही है कि लड़के पीछे हट रहे थे। तभी समझ गया कि यह कोई आम बच्ची नहीं है।' 
 
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हरमनप्रीत कौर - फोटो : ANI/PTI
कोच ने पिता को मनाया और सपना बुना
कमलदीश ने हरमनप्रीत के पिता हरमंदर सिंह भुल्लर को मनाया कि बेटी को उनके निजी एकेडमी में ट्रेनिंग दी जाए। पिता एक जिला अदालत में क्लर्क थे और फीस की चिंता थी। मगर कोच ने कहा, 'फीस मैं दूंगा, बस उसे खेलने दो।' बस वहीं से शुरू हुआ भारत की सबसे प्रेरक क्रिकेट सफर का पहला अध्याय। हरमंदर सिंह ने बेटी के जन्मदिन पर एक टी-शर्ट खरीदी थी जिस पर लिखा था- गुड बैटर यानी अच्छी बल्लेबाज। उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा था, 'मुझे नहीं पता था कि वो क्रिकेटर बनेगी, लेकिन ये जरूर जानता था कि वो खेलों में चमकेगी।'
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हरमनप्रीत कौर - फोटो : ANI/PTI
जब बल्ले से गूंज उठा मोगा
2006 में हरमनप्रीत ने मोगा टीम को पंजाब इंटर-डिस्ट्रिक्ट खिताब जिताया और फिर लगातार नौ साल तक उनका जिला चैंपियन रहा। कमलदीश को याद है जब पटियाला के खिलाफ मैच में उसने 75 रन की पारी खेली थी। उन्होंने बताया, 'उसका एक छक्का पड़ोसी के घर की खिड़की तोड़ गया। लोग पहले नाराज हुए, लेकिन जब पता चला कि ये काम एक लड़की ने किया है, तो उन्होंने तालियां बजाईं।' यही वो आत्मविश्वास था जो आगे चलकर 2017 विश्व कप में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ 171 रन की ऐतिहासिक पारी में झलका।
 

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हरमनप्रीत कौर - फोटो : ANI/PTI
'अपनी विल ते सिक्स मारदी ए', कोच का गर्व
एडिलेड स्थित कोच यदविंदर सिंह सोढी, जो कमलदीश के बेटे हैं, उन्होंने कहा, 'हरमन की ताकतवर हिटिंग उनके जीन में थी।' यदविंदर मुस्कुराते हुए बताते हैं, 'वो लड़कों के बीच खेलती थी, इसलिए कभी डरना सीखा ही नहीं। 2009 में एलीस पेरी के खिलाफ 91 मीटर का छक्का मारा था, तब उसका बैट भी चेक हुआ था।' हरमन ने 'काऊ कॉर्नर' और 'मिडविकेट' क्षेत्रों में स्ट्राइक करने की कला पर लगातार मेहनत की। उनका कहना था- अगर गेंद देख ली, तो हिट कर दूंगी।
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हरमनप्रीत कौर - फोटो : PTI
एक लीडर जो हार से सीखती रही
हरमनप्रीत ने अपने करियर में जितनी बार हार देखी, उतनी ही बार सीखा। उन्होंने कहा था, 'इतना हार लिया है कि अब हार से डर नहीं लगता… हर हार ने मुझे कुछ सिखाया है।' इस विश्व कप में भी लीग स्टेज में टीम तीन मैच हारी, लेकिन कप्तान ने संयम नहीं खोया। उन्होंने टीम को एकजुट रखा और विश्वास दिलाया कि हम जीत सकते हैं। सेमीफाइनल में उन्होंने जेमिमा रोड्रिग्स के साथ 167 रन की साझेदारी कर इतिहास रचा और फाइनल में भले 20 रन ही बनाए हों, लेकिन शफाली वर्मा को गेंदबाजी देने का उनका निर्णय भारत की जीत का टर्निंग पॉइंट बन गया।
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हरमनप्रीत कौर और जय शाह - फोटो : PTI
'वो दुपट्टा बांधने वाली लड़की अब वर्ल्ड चैंपियन है'
कोच कमलदीश भावुक होकर कहते हैं, 'जिस दिन उसे दुपट्टा बांधकर गेंदबाजी करते देखा था, उस दिन ही समझ गया था कि यह बच्ची एक दिन देश का नाम रोशन करेगी। आज वो वर्ल्ड कप उठा रही है, इससे बड़ा गर्व कुछ नहीं।' उनके मुताबिक, अब मोगा ही नहीं, पूरे पंजाब में सैकड़ों लड़कियां हरमन को देखकर क्रिकेट पकड़ रही हैं। उन्होंने कहा, 'अब माता-पिता अपनी बेटियों को क्रिकेट खेलने देंगे, जैसे हरमन, स्मृति, जेमिमा ने रास्ता बनाया है।'
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ट्रॉफी के साथ भारतीय महिला टीम - फोटो : PTI
'इतना हार के जीतना ही तो असली कहानी है'
हरमनप्रीत की कहानी सिर्फ एक खिलाड़ी की नहीं, बल्कि भारतीय महिला क्रिकेट की नई क्रांति की कहानी है। उस लड़की ने जिसने बचपन में स्कूल यूनिफॉर्म में लड़कों के बीच तेज गेंदें फेंकीं, आज दुनिया के सबसे बड़े मंच पर जीत का झंडा गाड़ दिया। हरमनप्रीत ने मुस्कुराते हुए कहा, 'अब पता चल गया कि वर्ल्ड चैंपियन बनना कैसा लगता है, इतना हार के जो सीखा, वो आज काम आया।' हरमनप्रीत कौर सिर्फ एक कप्तान नहीं, वो एक युग हैं। वो युग, जिसमें भारतीय बेटियां अब सिर्फ खेल नहीं रही हैं, बल्कि इतिहास लिख रही हैं।
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