जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभाव
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जलवायु परिवर्तन पर समिति का गठन
जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों से निपटने और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करने, जलवायु परिवर्तन के अपरिहार्य प्रभावों के अनुकूल होने और भारत में जलवायु अनुकूल स्थितियां बनाने के लिए भारत सरकार ने प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया है जिसका मुख्य कार्य जलवायु परिवर्तन का मूल्यांकन, अनुकूलन और उसके प्रभाव को कम करने के लिए राष्ट्रीय कार्यक्रम का समन्वय करना है।
यह समिति विभिन्न मंत्रालयों और अन्य अभिकरणों द्वारा जलवायु परिवर्तन से संबंधित कार्यों के लिए समग्र दिशा निर्देश उपलब्ध कराती है। साथ ही भारत सरकार के प्रधान वैज्ञानिक सलाहकारों की अध्यक्षता में गठित एक उप-समिति भारत में जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का अध्ययन कर रही है तथा प्रतिकूल प्रभावों से निपटने के लिए समुचित सलाह देने का काम करने लगी है।
सरकार चुनौती का सामना करने के प्रयास तो कर रही है, मगर कोई भी प्रयास तब तक सफल नहीं हो सकता जब तक उसमें जनता की भागीदारी न हो। आम आदमी को इस प्रयास में शामिल करने से तभी लाभ होगा जब उसे जागरूक किया जाएगा और उसे जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों से सचेत किया जाएगा।
इस दिशा में किसानों को सचेत कर बदलती जलवायु परिस्थितियों के अनुकूल कृषि पैटर्न अपनाने के लिए प्रेरित किया जा सकता है जिसमें कृषि वानिकी और फसल विविधीकरण शामिल हो सकते हैं। वर्षा जल संचयन, भूजल पुनर्भरण और कुशल सिंचाई प्रणालियों सहित बेहतर जल प्रबंधन, जल उपलब्धता पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को कम करने में मदद कर सकता है। इसके साथ ही सौर और पवन ऊर्जा जैसे नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों को बढ़ावा देने से ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन कम करने और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने में मदद मिल सकती है।
जलवायु परिवर्तन, आपदाओं का भी मुख्य कारण बनता जा रहा है। इसलिए पूर्व चेतावनी प्रणाली और निकासी योजनाओं सहित आपदा तैयारी को मजबूत करने से प्राकृतिक आपदाओं के प्रभाव को कम करने में मदद मिल सकती है।
बढ़ रही हैं आपदाएं
समस्या दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है और और बढ़ती आबादी के विकास संबंधी जरूरतों को पूरा करने के लिए अक्सर सरकार पर्यावरणीय मापदण्डों की अपेक्षा कर बैठती है। इसका जीता जागता उदाहरण उच्च हिमालई संवेदनशील क्षेत्र में ऋषिगंगा और धौलीगंगा जैसे बिजली प्रोजेक्टों को मंजूरी देना है। पारितंत्र की उपेक्षा और विकास की अंधी दौड़ का एक और उदाहरण उसी सीमान्त जिला चमोली का आपदाग्रस्त जोशीमठ शहर है।
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