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विश्व पृथ्वी दिवस 2023: जलवायु परिवर्तन का असर भारत की आर्थिकी पर

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2023 विश्व पृथ्वी दिवस - फोटो : Agency (File Photo)
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परिवर्तन प्रकृति का नियम है और जलवायु प्रकृति की ही गतिविधि होने के नाते उसमें परिवर्तन स्वाभाविक ही है। अगर जलवायु परिवर्तन की प्रक्रिया न होती तो सूर्य से निकली यह पृथ्वी आग का गोला बनी रहती। न तो शीतलन की प्रक्रिया होती, न हिम युग आते और ना ही जीवन की उत्पत्ति होती। लेकिन जब परिवर्तन की गति अस्वाभाविक रूप से बढ़ने लगे तो वह न केवल मानव जीवन बल्कि धरती के समूचे जल, थल और नभचरों के अस्तित्व के लिए खतरे की घंटी है, और इस गंभीर चुनौती के लिए मानवजनित क्रिया-कलाप ही प्रमुख कारक हैं। इस चुनौती से विश्वभर के योजनाकार, सरकारें तथा पर्यावरणवादी चिंतित हैं।

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भारत के लिए समस्या कुछ ज्यादा ही

जलवायु परिवर्तन का पहले से ही पृथ्वी पर गहरा प्रभाव पड़ रहा है, जिसमें लगातार भीषण गर्मी या लू, सूखा, बाढ़, तूफान और समुद्र का बढ़ता स्तर शामिल है। यह जैव विविधताओं के नुकसान का कारण भी बन रही है और मानव स्वास्थ्य, कृषि और जल संसाधनों को भी प्रभावित कर रही है। यद्यपि जलवायु परिवर्तन एक वैश्विक समस्या हैे, लेकिन कुछ विशेष परिस्थितियों के कारण भारत के लिए यह समस्या कुछ ज्यादा ही चिन्ताजनक है।

भारत के संदर्भ में जलवायु का महत्व आर्थिक विकास से जुड़ा हुआ है। आबादी के मामले में भारत ने चीन को पीछे छोड़ दिया है। अत्यंत घनी आबादी वाला यह देश कृषि प्रधान है, जहां दो तिहाई से अधिक लोग गांवों में निवास करते हैं तथा खेती पर निर्भर हैं। भारत की अर्थव्यवस्था पर जलवायु का अत्यधिक प्रभाव पड़ता है। भारत में मौसम विज्ञान संबंधी रिकॉर्ड वर्षा की मात्रा में अधिक परिवर्तन न होते हुए भी वायु तापमान में वृद्धि की ओर संकेत करते हैं।

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भारत के लिए जलवायु परिवर्तन की समस्या इसलिए भी गंभीर है, क्योंकि इसने अपने माथे पर विश्व की सबसे युवा पर्वत श्रृंखला हिमालय को धारण किया हुआ हैे, जो कि निर्माण की प्रक्रिया में होने के कारण उसका पारितंत्र बहुत संवेदनशील है। हिमालय अपने आप में सम्पूर्ण ऐशिया का वाटर टावर और जलवायु नियंत्रक है। यह हिम-आलय जलवायु परिवर्तन के कारण आपदा-आलय बन रहा है।

जलवायु परिवर्तन के कारण सन् 2013 में समय से पहले 16 जून को ही मानसून हिमालय पर चढ़ जाता है और बादल वहां फटता है जहां सीधे हिमपात होता है। इसी का नतीजा केदारनाथ की आपदा थी जिसमें हजारों तीर्थ यात्री मारे गए थे, समूची केदारघाटी तबाह हो गई थी।

सर्दी के मौसम में जब हिमालय में नदियां जमने लगती हैं तब फरबरी 2021 में धौलीगंगा-ऋषिगंगा की बाढ़ आ गई जिनमें सेकड़ों लोगों के मरने के साथ ही अरबों रुपये लागत के प्रोजेक्ट नष्ट हो गए।
 

कृषि पर जलवायु परिवर्तन का प्रभाव 

जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभाव, भारत की अर्थव्यवस्था और खासकर इसके कृषि क्षेत्र पर नजर आने लगे हैं। कृषि क्षेत्र देश के आधे से अधिक कार्यबल को रोजगार देता है और इसके सकल घरेलू उत्पाद के एक महत्वपूर्ण हिस्से में भूमिका निभात है। जलवायु में परिवर्तन से बाढ़, सूखा और लू जैसी चरम मौसमी घटनाओं के कारण फसल की पैदावार में कमी आती है। बार-बार प्राकृतिक आपदाओं के आने और उनकी तीव्रता, जैसे बाढ़ और चक्रवात, जलवायु परिवर्तन के साथ बढ़ने की संभावना रहती है, जिससे बुनियादी ढांचे, फसलों और आजीविका को काफी नुकसान होता है।

जलवायु पविर्तन से वर्षा के बदलते पैटर्न के कारण पानी की कमी या सूखे के कारण फसलें बरबाद हो जाती हैं, खासकर उन क्षेत्रों में जहां सिंचाई सुविधाओं के अभाव में खेती वर्षा पर निर्भर रहती है। यही नहीं इस स्थिति में कीट और रोग भी फैल सकते हैं, जो फसलों को नष्ट कर देते हैं और गंभीर आर्थिक नुकसान का कारण बन सकते हैं।

कृषि के अलावा जलवायु परिवर्तन अन्य उद्योगों जैसे पर्यटन, मत्स्य पालन और वानिकी पर भी नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है, जो आगे चलकर सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकता है।

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जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभाव - फोटो : iStock

जलवायु परिवर्तन पर समिति का गठन

जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों से निपटने और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करने, जलवायु परिवर्तन के अपरिहार्य प्रभावों के अनुकूल होने और भारत में जलवायु अनुकूल स्थितियां बनाने के लिए भारत सरकार ने प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया है जिसका मुख्य कार्य जलवायु परिवर्तन का मूल्यांकन, अनुकूलन और उसके प्रभाव को कम करने के लिए राष्ट्रीय कार्यक्रम का समन्वय करना है।

यह समिति विभिन्न मंत्रालयों और अन्य अभिकरणों द्वारा जलवायु परिवर्तन से संबंधित कार्यों के लिए समग्र दिशा निर्देश उपलब्ध कराती है। साथ ही भारत सरकार के प्रधान वैज्ञानिक सलाहकारों की अध्यक्षता में गठित एक उप-समिति भारत में जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का अध्ययन कर रही है तथा प्रतिकूल प्रभावों से निपटने के लिए समुचित सलाह देने का काम करने लगी है।

सरकार चुनौती का सामना करने के प्रयास तो कर रही है, मगर कोई भी प्रयास तब तक सफल नहीं हो सकता जब तक उसमें जनता की भागीदारी न हो। आम आदमी को इस प्रयास में शामिल करने से तभी लाभ होगा जब उसे जागरूक किया जाएगा और उसे जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों से सचेत किया जाएगा।

इस दिशा में किसानों को सचेत कर बदलती जलवायु परिस्थितियों के अनुकूल कृषि पैटर्न अपनाने के लिए प्रेरित किया जा सकता है जिसमें कृषि वानिकी और फसल विविधीकरण शामिल हो सकते हैं। वर्षा जल संचयन, भूजल पुनर्भरण और कुशल सिंचाई प्रणालियों सहित बेहतर जल प्रबंधन, जल उपलब्धता पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को कम करने में मदद कर सकता है। इसके साथ ही सौर और पवन ऊर्जा जैसे नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों को बढ़ावा देने से ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन कम करने और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने में मदद मिल सकती है।

जलवायु परिवर्तन, आपदाओं का भी मुख्य कारण बनता जा रहा है। इसलिए पूर्व चेतावनी प्रणाली और निकासी योजनाओं सहित आपदा तैयारी को मजबूत करने से प्राकृतिक आपदाओं के प्रभाव को कम करने में मदद मिल सकती है।

बढ़ रही हैं आपदाएं

समस्या दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है और और बढ़ती आबादी के विकास संबंधी जरूरतों को पूरा करने के लिए अक्सर सरकार पर्यावरणीय मापदण्डों की अपेक्षा कर बैठती है। इसका जीता जागता उदाहरण उच्च हिमालई संवेदनशील क्षेत्र में ऋषिगंगा और धौलीगंगा जैसे बिजली प्रोजेक्टों को मंजूरी देना है। पारितंत्र की उपेक्षा और विकास की अंधी दौड़ का एक और उदाहरण उसी सीमान्त जिला चमोली का आपदाग्रस्त जोशीमठ शहर है।
 

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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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