पृत्थु के शासन काल में ही गोवंश के संरक्षण की परंपरा प्रारंभ हुई
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यहां महाराजा पृथु की कथा का विवरण देना बेहद जरूरी है। दुनिया में पर्यावरण संरक्षित करने वाले राजा का संभवत: यह पहला उदाहरण है। पृथु राजा वेन के पुत्र थे। भारतीय धार्मिक ग्रंथों के आधार पर भूमंडल पर सर्वप्रथम सर्वांगीण रूप से राजशासन स्थापित करने के कारण उन्हें पृथ्वी का प्रथम राजा भी माना गया है।
पौराणिक कथा के अनुसार साधुशीलवान अंग के दुष्ट पुत्र वेन से तंग आकर ऋषियों ने हुंकार-ध्वनि से उसे मार डाला था। तब अराजकता के निवारण हेतु नि:संतान मरे वेन की भुजाओं का मंथन किया गया, जिससे स्त्री-पुरुष का एक जोड़ा प्रकट हुआ।
पुरुष का नाम पृत्थु रखा गया तथा स्त्री का नाम अर्चि। वे दोनों पति-पत्नी हुए। उन्हें भगवान विष्णु तथा लक्ष्मी का अंशावतार भी माना जाता है। ऐसा कहा जाता है कि महाराज पृत्थु ने ही पृथ्वी को समतल किया, जिससे वह उपज के योग्य हो पाई।
महाराज पृत्थु से पहले इस पृथ्वी पर पुर-ग्रामादि का विभाजन नहीं था। लोग अपनी सुविधा के अनुसार जहां-तहां बस जाते थे, लेकिन राजा पृत्थु ने व्यवस्थित राज व्यवस्था और सामाजिक व्यवस्था की नींव रखी थी। महाराज पृत्थु अत्यंत लोकहितकारी राजा थे। उन्हें चक्रवर्ती संम्राट की उपाधि भी प्राप्त हुई।
पृथु के बारे में यह भी कहा जाता है कि उनके शासन काल में ही गाय और बैल यानी गोवंश के संरक्षण की परंपरा प्रारंभ हुई। जूर-सीतल का पर्व महाराजा पृत्थु के समय से ही प्रारंभ हुआ बताया जाता है।
ऐसा कहा जाता है कि पाण्डुनन्दन, वेनपुत्र पृत्थु के चिंतन करते ही उनकी सेवा में घोड़े, रथ, हाथी और करोड़ों मनुष्य प्रकट हो गए थे। उनके राज्य में किसी को बुढ़ापा, दुर्भिक्ष तथा आधि-व्याधि का कष्ट नहीं था। राजा की ओर से रक्षा की समुचित व्यवस्था होने के कारण वहां कभी किसी को सर्पों, चोरों तथा आपस के लोगों से भय नहीं प्राप्त होता था।
जिस समय वे समुंद्र में होकर चलते थे, उस समय उसका जल स्थिर हो जाता था। पर्वत उन्हें रास्ता दे देते थे, उनके रथ की ध्वजा कभी टूटी नहीं। उन्होंने इस पृथ्वी से सत्रह प्रकार के धान्यों का दोहन किया था, यक्षों, राक्षसों और नागों में से जिसको जो वस्तु अभीष्ट थी, वह उन्होंने पृथ्वी से दुह ली थी।
उन महात्मा ने संपूर्ण जगत में धर्म की प्रधानता स्थापित कर दी थी। उन्होंने समस्त प्रजाओं का रंजन किया था, इसलिए वे राजा कहलाते थे। ब्राह्मणों को क्षति से बचाने के कारण वे क्षत्रिय कहे जाने लगे। उन्होंने धर्म के द्वारा इस भूमि को प्रथित किया-इसकी ख्याति बढ़ाई, इसलिए बहुसंख्यक मनुष्यों द्वारा यह पृथ्वी की संज्ञा उन्हें दी गई।
भारतीय चिंतन में पृथ्वी के संरक्षण की परंपरा सनातन से रही है
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दरअसल, ये सब अलंकारिक कथाएं है, लेकिन इसकी व्याख्या करने से कई बातों की जानकारी होती है। सबसे पहले तो ऋषियों ने उनके पिता की हत्या की थी। सच पूछिए तो हत्या का मुख्य कारण राज्य में अकाल का पड़ना था। हिंदू राज चिंतन में कहा जाता है कि राजा के पाप के कारण राज्य में अकाल पड़ता है।
इसका मतलब यह है कि जब राजा ठीक से प्रजा और राज्य के संसाधनों का प्रबंधन नहीं करता है तो अकाल की स्थिति पैदा हो जाती है। राजा वेन के राज्य में भी यही हुआ होगा। यानी वेन ने अपने राज्य का प्रबंधन ठीक से नहीं किया होगा और उसके कारण अकाल की स्थिति पैदा हुई होगी।
भुजा के मथने का अभिप्राय क्षात्र शक्ति से है। कहा जाता है कि परम पुरुष की भुजा ही क्षत्रीय है। इससे यह साबित होता है कि तब राज्य के कुछ प्रबुद्ध जन मिलकर राजा की खोज के लिए संपूर्ण राज्य का मंथन यानी भ्रमण किया होगा।
इसके बाद योज्ञ व्यक्ति को राजा बनाया गया होगा, जिसका नाम इतिहास में पृथु के नाम से विख्यात हुआ। पृथु के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने पहाड़ को समतल किया, पेड़ लगवाए, जीवों का संरक्षण किया, अपने राज्य में कई प्रकार के नियम बनवाए और इस प्रकार के नियम बनवाए जो बाद में चलकर वह समाज के लिए परंपरा बनी और फिर वह संस्कृति का अंग बनते हुए धर्म के साथ जुड़ गया।
इस प्रकार भारतीय चिंतन में प्रकृति, पृथ्वी आदि के संरक्षण की परंपरा सनातन से रही है। सच पूछिए तो जिसे हम सभ्य समाज का प्रमाण-पत्र दे रहे हैं, उन्होंने ही सबसे ज्यादा पर्यावरण का कुठाराघात किया है। यदि आदिवासी समाज को देखें तो पर्यावरण संरक्षण की शिक्षा अलग से लेने की जरूरत नहीं पड़ेगी।
हालांकि विकास और पर्यावरण संरक्षण का संतुलन कैसे बनाया जाए और दोनों को एक-दूसरे का पूरक कैसे बने यह हमारी पीढ़ी को तय करना है। अब वह वक्त आ गया है। मसलन कोरोना ने हमें इस दिशा में सोचने के लिए मजबूर कर दिया है।
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