दिल्ली में हुए विधानसभा चुनाव में प्रधानमंत्री ने दो रैलियों को संबोधित किया और ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ पर बरसे
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योजना में गड़बड़
हाल ही में दिल्ली में हुए विधानसभा चुनाव में प्रधानमंत्री ने दो रैलियों को संबोधित किया और ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ पर बरसे। अखबारों, टेलीविजन चैनलों और सोशल मीडिया साइट्स ने 'गैंग' की तस्वीरें चमकाईं। लेकिन एक गड़बड़ हो गई। ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ के लोग एक हाथ में राष्ट्रीय ध्वज और एक हाथ में भारत के संविधान की प्रति रखे हुए थे।
इसके अलावा वे बीच-बीच में पूरे उत्साह के साथ राष्ट्रगान भी गा रहे थे। लोगों के खिलाफ उतारा जा रहा गुस्सा और मीडिया में आई तस्वीरें और छवियां एक दूसरे के एकदम उलट थीं। लोगों का प्रत्येक वर्ग विश्वास करने लगता था कि वह क्या विश्वास करना चाहता है।
अब एक मंत्री का चौंका देने वाला बयान आया है। भाजपा का कोई भी नेता यह बताने के लिए सामने नहीं आया कि पिछले एक महीने के दौरान उन्होंने जो आरोप लगाए हैं और पिछले हफ्ते संसद में मंत्री द्वारा दिए गए बयान इतने असंगत क्यों हैं।
दक्षिणपंथी विचारधारा के बारे में कुछ भी असामान्य या स्वाभाविक रूप से गलत नहीं है। दक्षिणपंथी नेता जब अपने धर्म का राजनीतिकरण करते हैं और लोगों को धर्म के आधार पर बांटने की कोशिश करते हैं (मेरा धर्म बनाम तुम्हारा धर्म) केवल तभी संविधान का उल्लंघन होता है और सामाजिक सौहार्द बिगड़ता है।
भाजपा ने यही किया है और उसने पिछले छह सालों में सरकार और अन्य राज्य संस्थानों में ऐसे व्यक्तियों को रखा है, जो न केवल धार्मिक हैं, बल्कि वे ऐसे व्यक्ति हैं, जो अपने धार्मिक विश्वासों को हथियार बनाकर समाज के बड़े हिस्से में लोगों में भय और अनिश्चितता फैलाएंगे।
जैसा कि दिल्ली विश्वविद्यालय की राजनीति विज्ञान की पूर्व प्राध्यापक डॉ. नीरा चंदोक ने लिखा है, 'धर्मनिरपेक्षता का मुकाबला राजनीतिक रंग देने वाली सत्ता से है, सत्ता का इस्तेमाल एक धार्मिक उद्घोष के लिए किया गया, धार्मिक पहचान सत्ता के रूप में...धर्मनिरपेक्षता राजकीय धर्म को राज्य को नियंत्रित करने से रोकने का एक प्रयास है। यह बिल्कुल अपरिहार्य था, क्योंकि देश का विभाजन धर्म के आधार पर हुआ था।'
लड़ाई धर्म के राजनीतिकरण और धर्मनिरपेक्ष संविधान की सर्वोच्चता बनाए रखने के बीच है। यह लड़ाई, दिल्ली, लखनऊ, कोलकाता, हैदराबाद पुणे, कोचि और अन्य कई छोटे शहरों और विश्वविद्यालयों तथा अन्य जगहों पर हो रही है।
इस लड़ाई को आगे बढ़ाने वाले लोग राजनीतिक दलों से स्वाभाविक रूप से जुड़े लोग नहीं हैं। इनमें महिलाएं और बच्चे हैं, जो कि सामान्य तौर पर घरों में रहते हैं, युवा हैं जो कि उत्तरोत्तर सरकारों से निराश हैं और विद्यार्थी हैं जो कि राजनीति को लेकर ही निंदक हो गए हैं। उन्होंने कड़कड़ाती ठंड, पानी की बौछारों, लाठियां यहां तक गोलियों (अकेले में उत्तर प्रदेश में पुलिस फायरिंग में 23 लोग मारे गए) का सामना किया।
दिल्ली के चुनाव ने भारत के लिए 'वियतनाम मोमेंट' (1960-70 के दशक में वियतनाम युद्ध के समय हुए प्रदर्शन) ला दिया है। इसमें महत्वपूर्ण जीत-और समता तथा धर्मनिरपेक्षता की पुष्टि-तब हुई जब दिल्ली के लोगों ने प्रचंड वोट दिए। ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ जीत गया! टुकड़े टुकड़े गैंग और मजबूत और तब तक आगे बढ़े जब तक वह अपने सांविधानिक लक्ष्यों को हासिल न कर ले!
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