श्राद्ध पक्ष में कुछ तीर्थ स्थलों का भी बड़ा महत्व है।
- फोटो : Social media
श्राद्ध पक्ष में कुछ तीर्थ स्थलों का भी बड़ा महत्व है और इन तीर्थ स्थलों में सबसे महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल गया है। गया तीर्थ को लेकर ऐसी मान्यता है कि यहां पर पितरों का श्राद्ध-तर्पण करके पितृऋण से मुक्ति पाई सकती है। क्योंकि स्वयं भगवान विष्णु पितृ देवता के रूप में गया तीर्थ में निवास करते हैं।
शास्त्रों में गया को पिंडदान के लिए सबसे उत्तम स्थान माना गया है। वायु पुराण में एक श्लोक में कहा गया है- 'ब्रह्महत्या सुरापानं स्तेयं गुरुः अंगनागमः, पापं तत्संगजं सर्वं गयाश्राद्धाद्विनश्यति। यानी गया में श्राद्ध करने से ब्रह्महत्या, सुरापान, स्वर्ण की चोरी, गुरुपत्नीगमन और उक्त संसर्ग जनित महापातक सभी महापातक नष्ट हो जाते हैं।
यह स्थान मोक्ष प्राप्ति का द्वार है। ऐसी मान्यता है कि भगवान राम ने माता सीता संग यहां पर अपने पिता राजा दशरथ का पिंडदान किया था। गया के अलावा पुष्कर, प्रयाग, हरिद्वार आदि तीर्थों में श्राद्ध और पिंडदान की विशेष महिमा बताई गई है।
श्राद्ध कर्म में पिंड सबसे पहले पिता के लिए, उसके बाद दादा और फिर परदादा के लिए किया जाता है। शास्त्रों में यही श्राद्ध की विधि बतायी गई है। जिसके लिए आप पिंडदान कर रहे हैं उस समय एकाग्रचित्त होकर गायत्री मंत्र का जप तथा
सोमाय पितृमत्ते स्वाहा मंत्र का जप करना चाहिए।
महाभारत के अनुसार, श्राद्ध में तीन पिंडों का विधान है। जिसमें पहले पिंड जल में दिया जाता है। दूसरा पिंड पत्नी एवं गुरूजनों को देना चाहिए और तीसरा पिंड अग्निदेव को समर्पित करना चाहिए। हिन्दू धर्म में श्राद्ध परंपरा पितृ ऋण को चुकाने के लिए किया जाता है।
हमारे धार्मिक शास्त्रों में देव ऋण, ऋषि ऋण और पितृ ऋण बताए गए हैं। जब व्यक्ति अपने ऊपर से ये ऋण नहीं चुका पाता है तो उसे न केवल इसी जन्म में, बल्कि मरणोपरांत भी अनेक प्रकार के कष्टों और संकटों का सामना करना पड़ता है। इसलिए श्राद्ध पक्ष में पितृ ऋण चुकाने के लिए पितरों का तर्पण अवश्य करना चाहिए।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।