फ़िल्म ‘गांधी’ को मिले कई पुरस्कार
फ़िल्म ‘गांधी’ को सर्वोत्तम पिक्चर, सर्वोत्तम अभिनेता, सर्वोत्तम निर्देशक, सर्वोत्तम स्क्रीनप्ले, सर्वोत्तम सिनेमाटोग्राफ़ी, सर्वोत्तम कला निर्देशन, सर्वोत्तम संपादन तथा सर्वोत्तम कॉट्यूम डिजाइनिंग के लिए ऑस्कर पुरस्कार प्राप्त हुए। इसके अलावा, अमेरिका, जापान एवं अन्य देशों में भी इस फ़िल्म को बेशुमार पुरस्कार-सम्मान प्राप्त हुए।
इसकी एक विशेषता है कि इसका स्क्रीनप्ले किसी कहानी पर आधारित न हो कर सीधे फ़िल्म के लिए लिखा गया है। कॉस्ट्यूम डिजाइनिंग के लिए जॉन मोलो के साथ भानु अथैया को यह संयुक्त रूप से मिला। भानु ऑस्कर पाने वाली भारतीय मूल की प्रथम विजेता हैं।
भारत सरकार ने एटेनबरो को 1983 में पद्मभूषण से सम्मानित किया। हमने गांधी को देवता बना कर पूजा की है, भले ही उनकी राह पर चलने का शायद ही कभी प्रयास किया है। समय के साथ गांधी की प्रासंगिकता बढ़ती जा रही है और चाह कर भी उन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। रिचर्ड एटनबरो ने परदे पर महात्मा गांधी के जीवन का ऐसा ‘लार्जर दैन लाइफ़’ चित्रण किया है, जिससे हम भारतीय अभिभूत हैं।
इस फ़िल्म ने विश्व में गांधी की छवि परिवर्तित कर दी। फ़िल्म समीक्षक रोजर एबर्ट इसे रिमार्केबल कहते हैं। फ़िल्म ‘गांधी’ इसीलिए महान फिल्म है क्योंकि बनने के बाद यह पूरे विश्व की फिल्म हो गई। किताबों से निकलकर पहली बार कोई महान हिंदुस्तानी, सिनेमा के परदे पर इस कदर भास्वर लगा।
फिल्म के लिए इकट्ठा की गई लाखों लोगों की भीड़ ने हमारे दिलों में किताबों से बनी राष्ट्रपिता की छवि को हटाकर गांधी जी के प्रिय भजन ‘वैष्णव जन तो’ को सुनते वक्त, कवि प्रदीप के ‘साबरमती के संत’ सुनते वक्त, गांधी जी का चेहरा बेन किंग्सले को बना दिया।
निर्देशक रिचर्ड एटेनबरो की सहानुभूति की प्रशंसा करते हुए रोटेन टोमाटोज की वेबसाइट इस लंबी बायोपिक की सफ़लता का श्रेय बेन किंग्सले के चुम्बकीय अभिनय को देती है। एटेनबरो की प्रतिबद्धता फ़िल्म के प्रति थी तभी गांधी की शव यात्रा और जलियावाला बाग के हत्याकांड को इतनी ईमानदारी और लगन से फ़िल्मा सके।
गांधी जी अंग्रेजों के कृत्य को नापसंद करते, उनसे नफ़रत नहीं
जरा सोचिए जिन अंग्रेजों से गांधी जी ने लोहा लिया उन्हीं के द्वारा सेल्यूलाइड पर वे प्रसिद्ध हुए। अगर इस बात को वे जान पाते तो वे कैसा अनुभव करते? मेरे ख्याल से उन्हें अच्छा लगता और वे इसका स्वागत करते क्योंकि उनके अनुसार वे अंग्रेजों के कृत्य को नापसंद करते थे, अंग्रेजों से नफ़रत नहीं करते थे। नफ़रत एक बहुत नकारात्मक शब्द है।
काम को नापसंद करना एक बात है और किसी व्यक्ति, जाति अथवा नस्ल से नफ़रत करना बिल्कुल भिन्न बात है। जब भी गांधी पर बनी फ़िल्मों की बात होगी रिचर्ड एटेनबरो की ‘गांधी’ के बिना बात पूरी नहीं होगी। किसी भारतीय द्वारा गांधी पर इस फ़िल्म से बेहतर फ़िल्म का अभी इंतजार है। शायद भविष्य में यह आकांक्षा पूरी हो।
इस फ़िल्म में जवाहर लाल नेहरू बने रोशन सेठ कहते हैं, फिल्म गांधी की खासियत यह है कि वह अपने दर्शकों से बात करती है और इतिहास से रूबरू होती है। वे कहते हैं, ‘एक विदेशी ने ऐसी फिल्म बनाई है, जिसे भारतीय देख सकते हैं और गर्व कर सकते हैं।
ऐसा न तो पहले हुआ, न उसके बाद। 30 साल से इस फिल्म का जादू बरकरार है और अगले 30 साल तक भी कोई उसे फीका नहीं कर सकता और कौन जाने अगले 300 सालों तक भी?’ अब इस फ़िल्म को बने 40 साल हो चुके हैं और जादू कायम है। बल्कि समय के साथ गांधी की प्रासंगिकता के साथ इस फ़िल्म का महत्व भी बढ़ गया है।
जैसा मैंने पहले कहा है, गांधी जी पर और बहुत सारी फ़िल्में बनेंगी। भविष्य किसने देखा है। आज तो महात्मा को नमन करने का दिन है। देश की स्वतंत्रता के अमृत महोत्सव वर्ष में इस अंतिम कड़ी द्वारा महात्मा गांधी को मेरी श्रद्धांजलि।
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