कोविड के चलते स्कूलों के सामने एक नहीं कई चुनौतियां हैं।
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स्कूल और चुनौतियां
हम इन स्कूलों पर पड़ा बोझ कैसे कम करें और कैसे गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के रास्ते पर बढ़ते रहें? हमें स्कूलों को मुनाफे के साथ चलने और निवेश आकर्षित करने की मंजूरी देनी होगी। भारत में अधिकतर निजी स्कूलों को या तो सोसाइटी या किसी ट्रस्ट के रूप में पंजीकरण कराना पड़ता है। इसका मतलब है कि ये स्कूल मुनाफा कमाने वाले निकायों के तौर पर नहीं चल सकते।
हरियाणा अकेला ऐसा राज्य है, जहां स्कूल कंपनी अधिनयम 2013 के तहत किसी कंपनी के तौर पर काम कर सकते हैं। महाराष्ट्र स्कूलों को धारा 8 कंपनियों के तौर काम करने की मंजूरी देता है। इन स्थितियों में मुनाफा कोई बुरा शब्द नहीं है। इसके बजाए यह भारत में सर्वश्रेष्ठ श्रेणी के स्कूलों को पैसों के लिहाज से उपयुक्त बनाता है। न केवल ये स्कूल नवोन्मेष कर पाते हैं और अपनी मर्जी से अपना विस्तार कर सकते हैं, बल्कि उन्हें अपनी किताबें अभिभावकों के सामने खोलनी पड़ती हैं और उन्हें अभिभावकों को उनके खर्च किए जा रहे पैसों की उपयोगिता भी समझाना पड़ती है।
कंपनियों के तौर पर पंजीकरण कराने वाले निजी स्कूलों को कंपनी अधिनियम 2013 के तहत वित्तीय और प्रशासनिक मानकों का पालन करना पड़ेगा। कानून के तहत सभी कंपनियों को हर साल के लिए अपने खाते और वित्तीय दस्तावेज बनाए रखने की जरूरत पड़ती है। कामकाज के समय में किसी भी पल इन दस्तावेजों का निरीक्षण किया जा सकता है और ये केंद्र सरकार, आय कर अधिकारियों और प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड की जांच के दायरे में आ सकते हैं।
सोसाइटी और ट्रस्ट के नियमन में इस तरह के वित्तीय खुलासे और जवाबदेही नहीं होती। ज्यादा से ज्यादा, भारतीय न्यास अधिनियम 1882 के तहत एक ट्रस्टी की जरूरत होती है जो “ट्रस्ट के साफ और सटीक खाते” बनाए रखे और लाभार्थियों को ट्रस्ट की संपत्ति की सही राशि और हालत की “पूरी और सटीक जानकारी” देता रहे। सोसाइटी पंजीकरण अधिनियम 1860 में इस तरह का कोई नियम नहीं है। इसके कारण पारदर्शिता कम होती है, क्योंकि निजी स्कूल मुनाफा कमाने की कोशिश करते ही हैं।
वे बच्चेे जो ऑनलाइन नहीं पढ़ पा रहे उनकी हालत बेहद चिंताजनक है।
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इसलिए स्कूलों को कंपनियों के तौर पर पंजीकरण करने की मंजूरी क्यों न दी जाए? विशेषज्ञ दलील देते हैं कि मुनाफे के लिए काम करने वाले स्कूल कम समय में मुनाफा कमाने के लिए ऊंची लागत पर कम गुणवत्ता वाली शिक्षा प्रदान कर सकते हैं। लेकिन मुनाफा, जिस चीज की मांग है उसका निर्देश मुहैया कराने का भत्ता है। अभिभावक तब ही पैसे देंगे जब छात्रों को शिक्षा के रूप में एक अच्छा उत्पाद मिलेगा और उन्हें मिलने वाले लाभ कीमत से ज्यादा होंगे। इसलिए स्कूलों को लगातार बदलाव करते रहना चाहिए और अपनी सेवा में सुधार करना चाहिए।
नियामक संरचना, जैसा कि इस समय है, शिक्षा उद्यमियों के प्रवेश में मुख्य अवरोध का काम करती है। देश में शिक्षा की पूर्ण गुणवत्ता को सुधारने के लिए निजी क्षेत्र का लाभ उठाना चाहिए। मुनाफे के लिए दुनिया भर में, विकसित और विकासशील दोनों ही तरह के देशों में, स्कूल काम करते हैं। भारत को अगर सबसे अच्छा प्रदर्शन करने वाले देशों में शामिल होना है, तो हमें अपने बच्चों की शिक्षा के लिए भी सबसे अच्छे उपायों को मंजूरी देनी होगी।
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