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शुभ होली 2021: इस होली बच्चों की "फुलवारी" रंग-बिरंगी हो

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कोरोना के चलते स्कूली शिक्षा के क्षेत्र में स्थिति गंभीर है। - फोटो : Pexels
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पिछले साल मार्च की शुरुआत से देश भर में स्कूलों के संचालन में बहुत सारी समस्याएं आई हैं। चूंकि भारत में स्कूलों को उद्यम नहीं माना जाता, उन्हें कोरोना महामारी से हुए वित्तीय नुकसान से निपटने के लिए सरकार से कोई राहत या किसी तरह की वित्तीय मदद नहीं मिली। लेकिन स्कूलों की फीस भरने में अक्षम अभिभावकों ने राहत के लिए अदालतों में याचिकाएं दायर की।

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उच्च न्यायालयों ने अपने आदेश में स्कूलों को केवल ट्यूशन फीस लेने और अपने कर्मचारियों को वेतन का भुगतान करने को कहा। लेकिन शैक्षणिक वर्ष के लिए पर्याप्त धन के अभाव में ये स्कूल इन जरूरतों को कैसे पूरा करेंगे? जैसा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति में कहा गया है, हमें भारत में के-12 शिक्षा की मौजूदा नियामक संरचना का तत्काल पुनर्निरीक्षण करने और क्षेत्र में शिक्षा प्रदाताओं के लिए प्रवेश को आसान करने की जरूरत है।

स्कूली शिक्षा और भारत 
स्कूली शिक्षा के क्षेत्र में स्थिति गंभीर है। सेंटर फोर सिविल सोसाइटी की पहल ‘बोलो इंग्लिश’ के अनुसार कोई फीस जमा न हो पाने के कारण स्कूलों को अपने बहुत सारे कर्मचारियों को हटाना पड़ा, क्योंकि उन्हें बाकियों के वेतन, किराया और बिल देने थे। बहुत सारे शिक्षक वेतन में कटौती या बेराजगारी के कारण जीविका के लिए दूसरे उपायों का सहारा लेने पर मजबूर हुए जिनमें सब्जी बेचने जैसा पेशा शामिल है।
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नेशनल इंडिपेंडेंट स्कूल्स अलायंस डेटा के अनुसार 2020 के सितंबर महीने तक देश में केवल 10 फीसदी निजी बजट स्कूल शैक्षणिक वर्ष के लिए फीस जुटाने में सफल रहे। समस्या केवल मौजूदा शैक्षणिक वर्ष के लिए ही नहीं, बल्कि बल्कि पिछले शैक्षणिक वर्ष के लिए भी छिटपुट फीस संग्रह से बिगड़ी। इससे छोटे मुनाफे पर काम करने वाले और देशभर के करीब 9 करोड़ बच्चों को शिक्षा देने वाले निजी बजट स्कूलों पर गैरआनुपातिक रूप से असर पड़ा।

कोविड के चलते स्कूलों के सामने एक नहीं कई चुनौतियां हैं। - फोटो : Pixabay
स्कूल और चुनौतियां 
हम इन स्कूलों पर पड़ा बोझ कैसे कम करें और कैसे गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के रास्ते पर बढ़ते रहें? हमें स्कूलों को मुनाफे के साथ चलने और निवेश आकर्षित करने की मंजूरी देनी होगी। भारत में अधिकतर निजी स्कूलों को या तो सोसाइटी या किसी ट्रस्ट के रूप में पंजीकरण कराना पड़ता है। इसका मतलब है कि ये स्कूल मुनाफा कमाने वाले निकायों के तौर पर नहीं चल सकते।

हरियाणा अकेला ऐसा राज्य है, जहां स्कूल कंपनी अधिनयम 2013 के तहत किसी कंपनी के तौर पर काम कर सकते हैं। महाराष्ट्र स्कूलों को धारा 8 कंपनियों के तौर काम करने की मंजूरी देता है। इन स्थितियों में मुनाफा कोई बुरा शब्द नहीं है। इसके बजाए यह भारत में सर्वश्रेष्ठ श्रेणी के स्कूलों को पैसों के लिहाज से उपयुक्त बनाता है। न केवल ये स्कूल नवोन्मेष कर पाते हैं और अपनी मर्जी से अपना विस्तार कर सकते हैं, बल्कि उन्हें अपनी किताबें अभिभावकों के सामने खोलनी पड़ती हैं और उन्हें अभिभावकों को उनके खर्च किए जा रहे पैसों की उपयोगिता भी समझाना पड़ती है।

कंपनियों के तौर पर पंजीकरण कराने वाले निजी स्कूलों को कंपनी अधिनियम 2013 के तहत वित्तीय और प्रशासनिक मानकों का पालन करना पड़ेगा। कानून के तहत सभी कंपनियों को हर साल के लिए अपने खाते और वित्तीय दस्तावेज बनाए रखने की जरूरत पड़ती है। कामकाज के समय में किसी भी पल इन दस्तावेजों का निरीक्षण किया जा सकता है और ये केंद्र सरकार, आय कर अधिकारियों और प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड की जांच के दायरे में आ सकते हैं।

सोसाइटी और ट्रस्ट के नियमन में इस तरह के वित्तीय खुलासे और जवाबदेही नहीं होती। ज्यादा से ज्यादा, भारतीय न्यास अधिनियम 1882 के तहत एक ट्रस्टी की जरूरत होती है जो “ट्रस्ट के साफ और सटीक खाते” बनाए रखे और लाभार्थियों को ट्रस्ट की संपत्ति की सही राशि और हालत की “पूरी और सटीक जानकारी” देता रहे। सोसाइटी पंजीकरण अधिनियम 1860 में इस तरह का कोई नियम नहीं है। इसके कारण पारदर्शिता कम होती है, क्योंकि निजी स्कूल मुनाफा कमाने की कोशिश करते ही हैं।
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वे बच्चेे जो ऑनलाइन नहीं पढ़ पा रहे उनकी हालत बेहद चिंताजनक है। - फोटो : Pixabay
इसलिए स्कूलों को कंपनियों के तौर पर पंजीकरण करने की मंजूरी क्यों न दी जाए? विशेषज्ञ दलील देते हैं कि मुनाफे के लिए काम करने वाले स्कूल कम समय में मुनाफा कमाने के लिए ऊंची लागत पर कम गुणवत्ता वाली शिक्षा प्रदान कर सकते हैं। लेकिन मुनाफा, जिस चीज की मांग है उसका निर्देश मुहैया कराने का भत्ता है। अभिभावक तब ही पैसे देंगे जब छात्रों को शिक्षा के रूप में एक अच्छा उत्पाद मिलेगा और उन्हें मिलने वाले लाभ कीमत से ज्यादा होंगे। इसलिए स्कूलों को लगातार बदलाव करते रहना चाहिए और अपनी सेवा में सुधार करना चाहिए।

नियामक संरचना, जैसा कि इस समय है, शिक्षा उद्यमियों के प्रवेश में मुख्य अवरोध का काम करती है। देश में शिक्षा की पूर्ण गुणवत्ता को सुधारने के लिए निजी क्षेत्र का लाभ उठाना चाहिए। मुनाफे के लिए दुनिया भर में, विकसित और विकासशील दोनों ही तरह के देशों में, स्कूल काम करते हैं। भारत को अगर सबसे अच्छा प्रदर्शन करने वाले देशों में शामिल होना है, तो हमें अपने बच्चों की शिक्षा के लिए भी सबसे अच्छे उपायों को मंजूरी देनी होगी।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।


 
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