समय के साथ कोरोना के लक्षण और संक्रमण के तरीकों में बदलाव भी देखा जाने लगा है।
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लॉकडाउन से घर बैठे लोगों की मानसिक सेहत और देश की अर्थव्यवस्था दिनों-दिन गंभीर रूप से प्रभावित हो रही है। इसलिए सरकार ने लोगों को अपनी जिम्मेदारी समझाते हुए धीरे-धीरे सख्ती कम करना शुरू कर दिया है। लेकिन लॉकडाउन में ढील देते ही ज़्यादातर देशों में कोरोना संक्रमण फिर से बढ़ने लगा है।
जर्मनी में दोबारा कोरोना संक्रमण तेजी से फैलने लगा। यही नहीं समय के साथ कोरोना के लक्षण और संक्रमण के तरीकों में बदलाव भी देखा जाने लगा है। यह बतलाता है कि लंबे समय तक लॉकडाउन के सहारे इस बीमारी से नहीं निपटा जा सकता। जरूरी है कि हम इससे निपटने के लिए अपने नियम खुद बनाए और उसका पूरी ईमानदारी से पालन करें।
डब्ल्युएचओ के एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर हेल्थ इमरजेंसी प्रोग्राम, डॉक्टर माइक रेयान ने भी साफ शब्दों में कह दिया है कि हमें इस वायरस के साथ जीने की आदत डाल लेनी चाहिए। संभव है कि इस वायरस का भी कुछ दूसरे वायरस की तरह स्थानीयकरण हो जाए और वह कभी दूर ही नहीं जाए।
जैसे एचआईवी का वायरस आज भी बना हुआ है, लेकिन हम एहतियात बरत कर इससे दूरी बनाए हुए हैं। इसी तरह खसरा को भी तमाम प्रयासों के बावजूद खत्म नहीं किया जा सका, लेकिन इससे पीड़ित लोगों की संख्या दिनों दिन कम होती चली गई।
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने यह भी चेताया है कि कोरोना लोगों के शरीर के साथ मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी खतरा बनता जा रहा है। इसलिए लॉकडाउन को इसका स्थायी हल नहीं समझा जा सकता। जबतक वैक्सीन नहीं तैयार कर लिया जाता लोगों को इसी के साथ जीने की आदत डालनी होगी।
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जब लोग बाहर निकलेंगे तब परिणाम और भी भयावह हो सकते हैं।
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अमेरिका, यूरोप, ऑस्ट्रेलिया, एशिया सभी महादेशों में अलग-अलग स्तर पर शोध किए जा रहे हैं। दर्जनों विशेषज्ञ व उनकी टीम वैक्सीन को तैयार करने के लिए एड़ी चोटी की मेहनत कर रही है। स्वीडन के कैरोलिंस्का इंस्टीट्यूट के डॉक्टर कहते हैं कि कोरोना का अस्तित्व कब तक रहेगा और किस दिन इसका वैक्सीन तैयार हो जाएगा, इसकी भविष्यवाणी नहीं की जा सकती।
अगर कोई वैक्सीन साल भर में तैयार होकर बाजार में उपलब्ध हो जाता है तो यह अपने आप में रिकॉर्ड साबित होगा, क्योंकि वैक्सीन तैयार करने की प्रक्रिया लंबी होती है। तबतक विश्व स्वास्थ्य संगठन की ओर से बताई गई सावधानियों को अपनाकर इससे बचने की कोशिश जरूर होनी चाहिए।
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कोरोना की वजह से बच्चे व युवाओं के साथ स्वास्थ्यकर्मियों पर भी भारी मानसिक दबाव बना हुआ है, इसलिए जरूरी है कि कोरोना की भयावहता सोचने की जगह अब इसके साथ जीने के तरीके सोचें जाएं।
स्वीडन की पब्लिक हेल्थ एजेंसी वैक्सीन नहीं उपलब्ध होने तक हर्ड इम्युनिटी, एंटीबॉडीज के जरिए कोरोना वायरस को बेअसर करने की बात काफी हद तक स्वीकार करने लगी है। कारण है वैक्सीन तैयार होने में लंबा समय लगने का अनुमान।
यह कहा जा रहा है कि जब देश की 60 फीसदी आबादी कोरोना से संक्रमित हो जाए और वे लोग ठीक होने लगे यानी इम्युन होने लगे तो तो इसका मतलब यह है कि कोरोना ऐसे लोगों पर बेअसर हो रहा है। यानी इस बीमारी से लड़ने के लिए लोगों के शरीर में प्रतिरक्षात्मक गुण (एंटी बॉडिज) विकसित होने लगे हैं।
हालांकि यह बड़ा ही विवादित प्रयोग है। कई वैज्ञानिक इसके विरोध में हैं, क्योंकि इस प्रक्रिया में बड़ी संख्या में लोगों की जान जा सकती है। लेकिन इसके पक्षधर वैज्ञानिक मानते हैं कि लॉकडाउन कोरोना को पूरी तरह से नहीं रोक सकता।
एक समय के बाद जब लोग बाहर निकलेंगे तब परिणाम और भी भयावह हो सकते हैं, इसलिए किसी सोसाइटी में जैसे-जैसे लोग इम्युन होंगे कोरोना वायरस वहां उतना ही कमजोर पड़ता जाएगा।
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