डर में जी रहा समाज कई परिवर्तनों को देखेगा।
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आज संक्रमण की जद से अपने आप को बचा ले जाना बड़ा मुश्किल का काम है, वहीं अपनी जमी जमाई रोजगार को फिर से चालू करना और पुनः प्रतिष्ठित कर खोई साख को जमा लेना भी बहुत ही बड़ी चुनौती है। इस संक्रमण काल में पुराने रोजगार के साधन डूबेंगे तो रोजगार के नए साधन और नए तरीके भी इसी कठिन समय की खोज साबित होंगे। नई पीढ़ी को परंपरागत समाज से तालमेल भी बैठाना होगा।
भय की कल्पना में डूबता -उबरता समाज ना जाने कितनी बेमानी अफवाहों से सामना करेगा और जाने कितनी बेमानी अफवाहों को सच मानकर उन पर भरोसा करने लगेगा। कई अफवाहों को बुध्दि का प्रयोग करके खारिज भी करेगा। समाज के कई वर्ग आपस में शक और संदेह के घेरे में शामिल रहेंगे।
इन घेरों को तोड़ना बहुत मुश्किल हो जाएगा। ये शक और संदेह के घेरे नए सांप्रदायिकता को जन्म देंगे। अभी मौत का भय मनुष्य को विचारहीन कठपुतलों में बदल रहा है और समाज के ये भयभीत रोबोट नुमा मानव संवेदना शून्य होकर केवल यातना का समीकरण ही बनाएंगे। भय इस समय का सबसे बड़ा सत्य साबित होगा।
आज के इस समय की नफरतों से भरी कल्पना केे मिश्रित कुछ किस्से बनेंगे, कुछ घटनाएं यथार्थ के हिस्से बनेगी। लॅाकडाउन के ये दिन बहुत से मेहनतकशों के फाकाकशी में गुजरेगें। बहुत से रोजगार खत्म हो जाएंगे। कुछ रोजगार नए बन जाएंगे।
कुल मिलाकर समाज की आर्थिक संरचना और भू आधारों में बहुत बड़े परिवर्तन को स्वीकार करना होगा। समाज में एक नए प्रकार की छुआछूत और संदेह का जन्म होगा। संक्रमण के संदेह पर लोग अलगाव के लिए मजबूर किए जाएंगे। जन उपेक्षा खासी फैलेगी, जो आहत करने वाली होगी।
समाज में जो मानवीय सरोकारा उभरेंगे वे भी नोटिस किए जाने लायक होंगे। धर्म और संप्रदाय के नए मायने समाज में प्रचलित होंगे। जो सर्व स्वीकृत और राजनीतिक स्वार्थ बंदी से अलग -थलग होंगे। एक नई मानवीय चेतना से मजहब और धर्म के नए स्वरूप विकसित हो सकेंगे।
ये आज संक्रमण के मृत्युभिमुखी समाज चेतना का सामूहिक परिणाम आगामी समय में देखने को मिल सकता है। जो समाज का सकारात्मक बदलाव की दिशा होगी।
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