रिपोर्टर जानकारियों को अपनी नोटबुक में रखता है
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रिपोर्टर का हथियार होती है उसकी नोटबुक। रिपोर्टर का कार्यक्षेत्र कहिए या युद्धक्षेत्र, वहां से वह रोजाना जानकारियां जुटाता है और उन जानकारियों को सूत्र वाक्य में अपनी नोटबुक में रखता जाता है।
उचित वक्त और दिन के लिए। जब नोटबुक में सूत्रवाक्य में दर्ज कहानियां पत्रकार की कलम के सहारे मूर्त रूप लें सकें। सूत्र वाक्य में दर्ज घटनाएं और कहानियां नोटबुक के खुलते ही रिपोर्टर के दिमाग को चौकस कर देती हैं और फिर जन्म लेती हैं कभी दिल छू लेनी वाली कहानी तो कभी चौंकाने वाली रिपोर्ट।
लेकिन सोचिए वह नोटबुक ही खो जाए।
उसका खो जाना रिपोर्टर के हाथ से अचानक निकल गए खजाने की भांति होता है।
कोरोना काल में पुराने दस्तावेजों को झाड़ते-पोंछते वक्त पता चला कि इन पंक्तियों के लेखक के ऐसे ही तीन नोटबुक खो गए हैं। जिनमें दर्ज कई कहानियां बिना दुनिया देखे ही काल के गर्त में समा गईं। साल 2001 में गुजरात में भयानक सूखा पड़ा था। उस अकाल की रिपोर्टिंग के लिए दैनिक भास्कर अखबार की ओर से इन पंक्तियों के लेखक को कच्छ भेजा गया था। कच्छ की एक हफ्ते की यात्रा के दौरान नोटबुक में पचासों कहानियां सूत्र वाक्य में दर्ज हुईं। जिनमें दौरे किए गए गांवों के ब्योरे थे, करगिल युद्ध के बाद पाकिस्तान से लगे सरक्रीक के नजदीक तत्कालीन कांग्रेस नेता राजेश पायलट के पाकिस्तान विरोधी प्रदर्शन की स्थानीय लोगों की जुबानी कहानी हो, या फिर कच्छ के यायावर माधव जोशी के साथ गुजारे तीन दिन हों या फिर महान समाजवादी नेता जॉर्ज फर्नांडिस के साथी रहे स्वर्गीय दीपक मयपानी के अनुभव रहे हों।
अकाल की कहानियां तो अखबार के पन्नों पर छप गई...
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या मुंबई स्थित कच्छ समाज के कच्छ में चलाए जा रहे जन सहयोगी अभियानों का विवरण हो या फिर एक दौर में गुजरात का प्रमुख बंदरगाह रहे लखपत के किला स्थित नगर की वहां के फटेहाल-पैबंद लगे कपड़ा पहने गोपाल जोशी के पोपले मुंह और आंसू भरी आंखों से निकली कहानी हो, लखपत किला स्थित मजार और मंदिर की कहानी हो या फिर गुरुनानक देव की खड़ाऊं और दांत संभाले जीर्ण गुरूद्वारे में बैठे ग्रंथियों की पुकार हो।
सब दर्ज थीं...
सिंधु घाटी सभ्यता के दौर की सभ्यता की गवाह कच्छ स्थित धौलावीरा के शंभू की कहानी हो, कच्छ में बनते नमक की कहानी और रेह के ढेर की कलात्मकता।
ना जाने ऐसी कितनी ही कहानियां उस नोट बुक में दर्ज थीं। अकाल की कहानियां तो अखबार के पन्नों पर छप गई, लेकिन कुछ गहरे तक बोध कराने वाली ये कहानियां उस नोटबुक में दर्ज ही रह गईं। तरतीबवार रूप में दुनिया का प्रकाश देखे बिना ही ऐसे अनजान कब्र में खो गईं, जहां से उन्हें वापस किसी भी कीमत पर हासिल नहीं किया जा सकता। रिपोर्टर की रूटीन के इतर की हर यात्रा ऐसी कहानियों से भरी होती हैं।
साल 2017 के अप्रैल महीने में पश्चिम बंगाल के उत्तरी 24 परगना जिले की यात्रा का मौका मिला। इस यात्रा के दौरान भी ढेरों कहानियां नोटबुक में दर्ज हुईं।
उत्तरी चौबीस परगना जिले के आर्सेनिक प्रभावित गांवों की पानी जुटाने की कहानियां, महिलाओं के दर्द, बनगांव के नजदीक स्थित पेट्रापोले-बेनापोले चेकपोस्ट पर जरूरी दस्तावेज चेक कराने के लिए रूकी बांग्लादेश से आ रही मालगाड़ी के ड्राइवर का अनुभव, शाम को होने वाली बीटिंग रिट्रीट के ब्योरे, बांग्लादेश बॉर्डर गार्ड की महिला सिपाहियों के पैरों में पड़े सतही जूते, बनगांव के नजदीक स्थित इस्कॉन मंदिर के जरिए चल रहे अभियान आदि की दर्जनों कहानियां भी उस नोटबुक में दर्ज थीं।
माटी का मोह परगना जिले की मास्टरी के लिए पकड़ लाया
राष्ट्रीय राजमार्ग 31 पर स्थित एक प्राइमरी स्कूल और उसकी हिंदी बोलने वाली एक मात्र अध्यापिका का भी दर्द भी उसी नोट बुक में कहीं खो गया, जो अब शायद ही कभी दुनिया के सामने आ पाए।
अध्यापिका का दर्द यह था कि नौसैनिक पिता के साथ मुंबई, विशाखापत्तनम और ऐसी ही जगहों पर पढ़ी, चमकदार मुंबई के किसी केंद्रीय विद्यालय में नौकरी भी पा गई, लेकिन माटी का मोह ससुराल के पास उत्तर चौबीस परगना जिले की मास्टरी के लिए पकड़ लाया। लेकिन यहां आकर उसे लगा कि ना तो वह पढ़ा पा रही है, ना ही अपनी माटी की सेवा कर पा रही है। उल्टे वह तृणमूल कार्यकर्ताओं के चक्कर में तृणमूल की वैसी ही सेवक बन गई है, जैसे कम्युनिस्ट राज के दौरान कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं की सेवा के लिए पश्चिम बंगाल के सरकारी कर्मचारी मजबूर थे।
इसी नोटबुक में दर्ज थी मिदिनापुर के किसानों की खुशहाली की कहानियां, उत्तर चौबीस परगना जिले के मधुसूदन कांटी गांव के स्थानीय लेकिन जिला प्रसिद्ध कवि की कहानी। सब कहीं डूब गया...
जिस बैग में वह नोटबुक रखी थी वो कहीं गुम हो गया
कोरोना के चक्रव्यूह काल के हताशा और उदासीभरे दिन में इंदौर की जुलाई 2011 की यात्रा के दौरान हिंदी और पत्रकारिता पर जुटाई जानकारियों वाली नोटबुक भी बहुत याद आई। जो इंदौर से लौटते वक्त कहीं खो गई।
शायद जिस बैग में वह नोटबुक रखी थी, वही कहीं गुम हो गया। पश्चिम बंगाल की यात्रा के दौरान ही पश्चिम बंगाल वाली नोटबुक भी कहीं खो गई। शायद एक दोस्त वहां की बीटिंग रिट्रीट देखने के कुछ देर बाद बीमार हो गए थे, उनके लिए दवा खोजने के क्रम में फैली बदहवासी ने उस नोटबुक की बलि ले ली।
आप कह सकते हैं कि इन नोटबुकों में आखिर ऐसा क्या था कि आप इतने परेशान हों, लेकिन यह दर्द रिपोर्टर ही जान सकता है। क्योंकि उसके लिए उसके नोट कारूं का खजाना ही होते हैं, जिन्हें कई बार तह करके रख दिया जाता है और उचित मौकों पर निकालकर उनमें दर्ज कहानियों को सिलसिलेवार निकालता है।
उन कहानियों से कभी आंसुओं की धार बहाता है तो कई बार चौंकाता है। कई बार इतिहास बदलने की कोशिश करता है। पता नहीं इतिहास बदल पाता है या नहीं, लेकिन यह तय है कि इन नोटबुकों के सहारे वह इतिहास में दर्ज जरूर हो जाता है।
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