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इरफान और ऋषि कपूर स्मृति शेष: चल कहीं दूर निकल जाएं

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इरफान खान और ऋषि कपूर कोई साधारण व्यक्तित्व नहीं थे
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अभी 29 अप्रैल 2020 को इरफान खान के इंतकाल की खबर और दुख को हम सभी ने स्वीकारा भी नहीं था कि अगली सुबह यानी 30 अप्रैल को भारतीय सिने जगत के दिग्गज अभिनेता ऋषि कपूर साहब के निधन की सूचना ने मानों सबको हिला कर रख दिया हो। लोगों की प्रतिक्रिया और अपने दिल की पीड़ा से ऐसा महसूस हुआ मानों कोई अपना बिछड़ गया हो। सोचने लगी हम सब इतने व्यथित क्यों हो रहे हैं रोज किसी न किसी की मृत्यु होती है, तभी दिल के किसी कोने से आवाज आई कि ये कोई साधारण व्यक्तित्व नहीं थे।

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ये वे लोग हैं जिनके जरिए हम अपनी दबी हुई इच्छाओं को बाहर निकालते हैं। जिनके माध्यम से मौन रहकर भी हम कई किरदार निभा जाते हैं। ये कलाकार समाज के सुपर एलिट वर्ग से ताल्लुकात रखते हुए भी सभी प्रकार की भूमिका अदा करने में सक्षम होते हैं।

साधारणतः व्यक्ति अपने- आप को उनमें देखता है। ऋषि कपूर साहब की एक फिल्म ' एक चादर मैली सी ' (इसके लेखक राजिंदर सिंह बेदी थे) में उन्हें अपने बड़े भाई के निधन के बाद अपनी भाभी ( जिसका किरदार हेमा मालिनी ने निभाया था ) से विवाह करना पड़ता है।
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फिल्म ज्यादा नहीं चली थी, पर भारतीय समाज में बड़ी भाभी हमेशा मां की तरह देखी जाती है और एक बार किसी महिला को बड़ी भाभी के रूप में स्वीकार करने के बाद पत्नी के रूप में स्वीकार करना कितना कठिन होता होगा, इस किरदार को ऋषि कपूर ने इतना बढ़िया निभाया है कि जितनी तारीफ की जाए कम है ।

" दूसरा आदमी " में भी उनकी भूमिका सराहनीय थी । बहुत से लोगों को शायद पता न हो कि सुप्रसिद्ध अभिनेता प्रेमनाथ और राजेन्द्र नाथ ऋषि कपूर के मामा थे, तो नानी घर से गंभीर और निगेटिव रोल निभाने की क्षमता भी उनके रगों में आ गई थी। फिल्म 'अग्निपथ ' में ऋषि कपूर ने खलनायक की भूमिका बड़ी मजबूती से अदा की है।

इरफान खान की असाधारण अभिनय क्षमता ने उन्हें व्यक्तिगत तौर पर कई सम्मान दिलाए

इरफान खान ने नेेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा से 'ड्रामेटिक आर्ट' का कोर्स किया था। - फोटो : सोशल मीडिया

इरफान खान ने भी ' हासिल ' फिल्म में स्टूडेंट डॉन की बड़ी ही सशक्त भूमिका निभाई है। फिल्म 'पानसिंह तोमर' में इरफान ने चंबल के डाकू पानसिंह तोमर की भूमिका ऐसी निभाई है, जैसे वर्षों से इस जीवन के जीने के आदी हों।

तो कहने का मतलब ये कलाकार जिनसे हममें से ज्यादातर लोग शायद कभी मिले नहीं होते हैं पर अपनी भूमिका अपने अभिनय के जरिए हम सबसे ऐसे जुड़े होते हैं जैसे उनके साथ रोज का उठन - बैठना होता हो।

कई बार लोग उनकी तरह उठना- बैठना, वेशभूषा, बोलचाल आदि अन्य आदतों को अपने जीवन में उतार लेते हैं, इसलिए ये कलाकार हमारे जीवन में इतनी अहमियत रखते हैं। मनोविज्ञान की भाषा में इसे ''रोल आइडेंटिफिकेशन' कहते हैं।

ये मनोरंजन के साथ-साथ हमें मानसिक रूप से तनाव, निराशा, मानसिक दबाव आदि से मुक्त कराते हैं। अब हम इन कलाकारों के जीवन पर संक्षिप्त प्रकाश डालेंगे। 7 जनवरी 1967  को इरफान खान का जन्म जयपुर शहर में हुआ था। इन्होंने हिन्दी सिनेमा के अलावा ब्रिटिश और अमेरिकन फिल्मों में भी काम किया था। 1985-2020 तक करीब 30 वर्षों  तक उन्होंने फिल्म जगत में काम किया।

उनकी असाधारण अभिनय क्षमता ने उन्हें व्यक्तिगत तौर पर कई सम्मान दिलाए और उनके चाहने वालों के दिल में हमेशा के लिए एक उच्चतम श्रेणी के कलाकार के रूप में जगह बना ली। उन्हें 2011  में पद्मश्री, नैशनल फिल्म अवार्ड तथा चार फिल्म फेयर अवार्ड से सम्मानित किया गया था।

उनकी कुछ मशहूर फिल्में दि लंच बॉक्स, पीकू, पानसिंह तोमर, सलाम बॉम्बे, स्लम डॉग मिलेनियर, हैदर, तलवार, हिंदी मिडियम आदि थी। इन्होंने कई टीवी सीरियल में भी काम किया। फिल्म ' हासिल ' के बाद इनके करियर में उछाल आई और ' अंग्रेजी मिडियम ' इनकी आखिरी फिल्म थी।

इरफान कहते थे कि शुरू में कोई भी कलाकार नाम और शोहरत के पीछे भागता है पर कुछ अनुभव होने के बाद उसे समझ में आता है कि उसका वास्तविक सपना कुछ और है। वह कला की गहराई में उतरने लगता है।

उन्होंने नेेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा से 'ड्रामेटिक आर्ट' का कोर्स किया था। ऐसा लगता है मानों इनकी तरक्की, योजनाओं, सपनों, आकांक्षाओं को ग्रहण लगा गया हो। सिर्फ 53 वर्ष की उम्र में 'न्यूरोइंडोक्राइन कैंसर ' की वजह से इनकी मृत्यु हो गई।

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दोनों कलाकारों ने एक साथ मन बना लिया था कि इस पीड़ादायक बीमारी की गुलामी और नहीं सहनी है....

ऋषि कपूर बहुप्रतिभा के धनी कलाकार थे। - फोटो : फाइल फोटो

अभिनेता ऋषि कपूर का जन्म 4  सितंबर 1952 को हिन्दी सिनेमा जगत के सबसे प्रभावशाली परिवार ' कपूर परिवार ' में हुआ था। वे मशहूर अभिनेता राज कपूर साहब के द्वितीय पुत्र और पृथ्वीराज कपूर के पौत्र थे। वे एक मस्त स्वभाव के व्यक्ति थे।

परिवार, दोस्त और अच्छा खाना उनकी प्राथमिकता थी। वे बहुप्रतिभा के धनी कलाकार थे। वे फिल्म इंडस्ट्री और देश के विकास के लिए हमेशा चिंतित रहते थे। वे एक अभिनेता, डाइरेक्टर और प्रोड्यूसर थे।

1970  में ' मेरा नाम जोकर ' में बाल कलाकार का रोल किया था और उन्हें नैशनल फिल्म अवॉर्ड से नवाजा गया था। 1973  से 2000 तक उन्होंने 92  फिल्मों में काम किया। 1973  में उनकी प्रतिष्ठित फिल्म ' बॉबी ' आई थी, उसमें उन्होंने डिंपल कपाड़िया के साथ काम किया।

इसके लिए उन्हें फिल्म फेयर अवॉर्ड मिला था। इन्हें 2008 में लाइफ टाइम एचिवमेंट अवॉर्ड मिला था। अमर अकबर एंथनी, लैला-मजनू, रफूचक्कर, कर्ज, सरगम, दो-दूनी चार आदि इनकी मशहूर फिल्में थींं।

1980  में इनकी शादी मशहूर अभिनेत्री नीतू सिंह से हुई। इनके एक पुत्र अभिनेता रणबीर कपूर है और इनकी बेटी रिद्धिमा कपूर साहनी है। ये एक जिंदादिल इंसान थे। वे एक ऐसे व्यक्तित्व थे जिन्हें आप हमेशा मुस्कुराहट के साथ ही याद करेंगे। इनकी मृत्यु भी ब्लड कैंसर से सिर्फ 67 वर्ष की उम्र में हो गई।

लगता है दोनों कलाकारों ने एक साथ मन बना लिया था कि इस पीड़ादायक बीमारी की गुलामी और नहीं सहनी है और 'चल कहीं दूर निकल जाएं' कहकर अपने को आजाद कर लिया। हम सभी भारतवासी इन दोनों को अश्रुपूर्ण श्रद्धांजली देते हैं और इस भारत भूमि पर पुनर्जन्म लेने के आह्वान के साथ ईश्वर से इनकी आत्मा की शांति की प्रार्थना करते हैं।

इन दोनों के लिए ये कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि -    

ना बुढ़ापा आया और ना जवानी खत्म हुई।
इक दर्द भरे मोड़ पे इनकी कहानी खत्म हुई ।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण):
 यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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