इमरान खान अपने वादों को पूरा नहीं कर पाए।
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प्रधानमंत्री भले ही निर्वाचित होते रहे हों ,वे इन दोनों के सख़्त शिकंजे में जकड़े रहते हैं। ऐसे में कट्टरपंथी खुली बग़ावत कर बैठे हैं तो इसके दो अर्थ निकलते हैं। एक-या तो वे वाकई इमरान ख़ान की हुक़ूमत से त्रस्त हो चुके हैं और स्वप्रेरणा से सड़कों पर आए हैं और दूसरा यह कि सेना भी इमरान ख़ान से छुटकारा पाना चाहती है। लेकिन वह इसे औपचारिक तख़्तापलट की शक़्ल नहीं देना चाहती।
जनरल बाजवा जानते हैं कि विश्व राजनीति में अलग-थलग पड़े पाकिस्तान में यदि उन्होंने एक बार फिर फौजी सत्ता क़ायम की तो आने वाले अनेक साल तक विश्व बिरादरी पाकिस्तान पर भरोसा करना छोड़ देगी, इसलिए परदे के पीछे से सेना इमरान ख़ान के ख़िलाफ़ जन आंदोलन को समर्थन दे रही है। गंभीर स्थिति निर्मित होने पर वह इमरान की बैसाखी खिसका लेगी और गरीब मुल्क़ फिर एक बार चुनाव के द्वार खड़ा हो जाएगा।
पाकिस्तान का भविष्य क्या है? या तो नवाज़ शरीफ और बिलावल भुट्टो की पार्टियां अन्य लोगों के समर्थन से सरकार बनाने का दावा करे अथवा देश में नए चुनाव कराए जाएं। फ़ौज के तरकश में अब भी एक तीर है जिसका अभी तक इस्तेमाल नहीं हुआ है।
अतीत में नवाज़ शरीफ़ ने तो फौज से पंगा लिया था और दूरी इतनी बढ़ गई थी कि उसे पाटने की कोई संभावना नहीं थी, इसीलिए जनरल बाजवा ने उन्हें सफ़ाई से अलग कर दिया। अब उनके भाई शाहबाज़ शरीफ़ पर वह दांव लगा सकती है।
शाहबाज़ के सेना के साथ दशकों से मधुर संबंध रहे हैं। नवाजशरीफ के प्रधानमंत्री रहते हुए उन्होंने अनेक बार परदे के पीछे से फ़ौज और प्रधानमंत्री के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाई है। बिलावल जरदारी उसकी पहली पसंद कभी नहीं बनेंगे। बेनज़ीर भुट्टो की हत्या के बाद से यह परिवार भी फौज को पसंद नहीं करता। उसे संदेह है कि बेनज़ीर की हत्या के पीछे सेना का हाथ था।
इसका एक कारण यह भी समझा जाता है कि बेनज़ीर और भारतीय प्रधानमंत्री राजीव गांधी के बीच कश्मीर को लेकर सहमति बन गई थी और पाक में लोकतंत्र की जड़ों को मज़बूत करने पर काफी काम हो रहा था। अगर ऐसा हो जाता तो सेना एक एपेंडिक्स की तरह रह जाती। नवाज़शरीफ़ को हटाने के पीछे भी यही कारण है। एक बार पाकिस्तान अपनी नियति के चौराहे पर खड़ा है।
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