बहस छिड़ गई है कि ट्विटर अब बदल जाएगा। ट्विटर के इस्तेमाल का नजरिया बदल जाएगा।
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फेक यूजर्स को लेकर सजगता
दुनिया में ट्विटर के यूजर्स भले 21 करोड़ हों, लेकिन भारत में करीब 2 करोड़ ट्विटर यूजर्स हैं। स्वतंत्र निवेशकों के बोर्ड वाले ट्विटर के एलन मस्क द्वारा खरीदने के बाद इस सोशल मीडिया प्लेटफार्म बड़े कॉरपोरेट के पास है। इस कॉरपोरेट सौदे को भी सोशल मीडिया पर गोदी मीडिया बनाम डिजाइनर मीडिया के चश्मे से ही देखा जा रहा है।
बहस छिड़ गई है कि ट्विटर अब बदल जाएगा। ट्विटर के इस्तेमाल का नजरिया बदल जाएगा। हालांकि, खुद एलन मस्क भी इसे अभिव्यक्ति की आजादी का बड़ा प्लेटफॉर्म मानते हैं लेकिन यह संयोग है या प्रयोग कि जिस ट्विटर की नीतियों के मस्क विरोधी रहे हैं, उसी कंपनी (ट्विटर) को उन्होंने न केवल खरीदा बल्कि इसे मजेदार बनाने और फेक यूजर्स से लेकर यूजर्स पर प्रतिबंध और लगाम को लेकर सजग दिख रहे हैं। उन्होंने फंड जुटाने के लिए के 44 लाख शेयर भी बेच दिए। बदलाव की बयार की पहल शुरू हो गई है। आने वाले दिनों में इसका असर भी दिखे।
ताना-बाना बिगड़ने पर सरकार सजग
अली-बजरंगबली, हनुमान चालीसा-अजान जैसे विवादों के बीच सोशल मीडिया के ज्यादातर प्लेटफॉर्म कटुता परोसने का माध्यम बन कर रह गए हैं। सरकार भी सोशल मीडिया को लक्ष्मण रेखा के दायरे में लाने के लिए सजग है, ताकि सामाजिक ताना-बाना बिगड़ने पर जिम्मेदारी तय हो सके।
अभी हाल में सरकार ने जहांगीरपुर हिंसा, हिजाब विवाद के मद्देनजर टीवी चैनल्स को भी अली-बजरंग बली जैसे शीर्षक से खलबली मचाने से परहेज करने को चेताया। इतना ही नहीं समाज में नफरत का जहर उगलने वाले 6 पाक चैनल्स समेत 16 और यू ट्यूब चैनलों को प्रतिबंधित किया है। जिस सोशल मीडिया से सामाजिक सौहार्द की अपेक्षा की जाती है, फिजा बिगाड़ने से लेकर देश विरोधी गतिविधियों में जाने-अनजाने यदि उसी की संलिप्तता बढ़ती जाए तो चिंता स्वाभाविक है।
प्लेटफॉर्म कोई हो, पैमाना निष्पक्षता ही होना चाहिए
ऐसा नहीं कि सोशल मीडिया या मीडिया पर पहली बार कॉरपोरेट के हाथ है। वाशिंगटन पोस्ट पर अमेजन, टाइम मैगजीन पर सेल्स फोर्स के सह संस्थापक मार्क वैनी, अलीबाबा के जैक का साउथ चाइना मूविंग पोस्ट में निवेश जैसे कई मिसाल हैं। सोशल मीडिया पर यदि सामाजिक कटुता परोसने वाले सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल सौहार्द के लिए हो, और हवा बदले तो इसमें हर्ज क्या है।
आज अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर जो दो धाराएं बंटी हैं, वह घातक है। ऐसे में पक्ष-विपक्ष के बीच निष्पक्ष की गुंजाइश कम होती जा रही है। प्रिंट हो डिजिटिल, सोशल मीडिया हो इलेक्ट्रॉनिक्स चैनल्स, निष्पक्षता ही हमें आगे बढ़ाती है। सबसे तेजी से संदेश पहुंचाने वाले कबूतर (ट्विटर) की उड़ान को भले पंख लगे हों लेकिन जिस जैक ने इस कंपनी को शुरू किया था, वहीं नीतियों की वजह से कंपनी से बाहर हाशिये पर चले गए और एलन मस्क के सौदे से पहले से यह स्वतंत्र निवेशकों के बोर्ड द्वारा संचालित हो रही थी।
मीडिया हो या सोशल मीडिया उसकी तटस्थता, निष्पक्षता और सामाजिक सरोकार ही सर्वोपरि है, इसी भरोसे के बूते वे खुद को अरसे तक बड़ा और खड़ा रख पाते हैं। इसी निष्पक्ष और मीठी-मीठी बातों से सामाजिक सरोकार और राष्ट्रहित में मिठास की उम्मीद की जा सकती है। सो, अब सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर भी यदि बदलाव की बयार की आस जग रही है तो कुछ मीठा हो जाए.... का बहाना तो बनता ही है।
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