वो ऐसा पहला अप्रैल था, जब देश अपने ही प्राण बचाने की जद्दोजहद में जुटा था।
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आंकड़े बताते हैं कि डेल्टा कोविड की मार इतनी जबर्दस्त थी कि अप्रैल और मई के दरम्यान उसने भारत में 1 लाख 66 हजार 632 लोगों ने कोविड से समुचित इलाज के अभाव में अपनी जानें गंवा दीं। यानी औसतन हर 10 में से 4 मरीज कोविड के कारण दम तोड़ रहे थे। ये वायरस इतना भयानक था कि संक्रमित व्यक्ति के सीधे फेंफड़ों पर हमला कर उसकी सांस प्रणाली को ही खत्म कर देता था। जब सांसे ही नहीं रहती तो मनुष्य के रूप में बचता क्या है।
ऑक्सीजन की दरकार
वो ऐसा पहला अप्रैल था, जब देश अपने ही प्राण बचाने की जद्दोजहद में जुटा था। पहली दफा पता चला कि देश में मेडिकल ऑक्सीजन का भयंकर टोटा है। रसोई गैस सिलेंडर के लिए भटकने वाले हाथ एक अदद आॅक्सीजन सिलेंडर के लिए दर-दर भटक रहे थे। सरकार ने औद्योगिक ऑक्सीजन पर पांबदी लगा कर केवल मेडिकल ऑक्सीजन के उत्पादन का आदेश दिया। लेकिन ढोने के लिए क्रायोजेनिक टैंकरों का अभाव था। प्राणवायु की राशनिंग देश ने पहली बार भुगती। ऑक्सीजन गैस तक की चोरी होने लगी। टैंकर लूटे जाने लगे। दुनिया हमारी ध्वस्त होती स्वास्थ्य प्रणाली को हैरत से देख रही थी। हम दुनिया से ऑक्सीजन और वेंटीलेटर मांग रहे थे।
उधर कोविड डैशबोर्ड पर आंकड़ा दिनो दिन और डरावना होता जा रहा था। 30 अप्रैल 2021 के दिन पूरे देश में 4 लाख लोग संक्रमित हुए और 3500 मौतें सिर्फ कोरोना के कारण हुईं। यह शायद पहला मौका था, जब देश में श्मशान घाट अपूरे पड़ने लगे, कब्रिस्तानों में कब्र खोदने वालों का टोटा पड़ गया। कई श्मशान घाटों में एक साथ जलती सैंकड़ों चिताओं की आंच और बेतरह उठते धुएं में समूचे देश का आर्तनाद महसूस किया जा सकता था। हालांकि लोग लड़ रहे थे, लेकिन देश त्राहि त्राहि कर रहा था। मौत का ये ज्वार कब उतरेगा, किसी की समझ नहीं आ रहा था।
कोरोना का हाहाकार
कोविड की उस दूसरी लहर ने हकीकत में कितनो को लीला, इसका सही आंकड़ा शायद ही कभी सामने आए। क्योंकि अंत्येष्टि स्थलों पर मौतों की गिनती लगभग रोक दी गई थी। मृत्यु को दर्ज करने वाली रजिस्टर सच बोल सकते थे, इसलिए उन्हें भी बंद कर दिया गया था। फिर भी माना जाता है कि जो आंकड़े बताए गए, संख्या उनसे सात आठ गुना ज्यादा थी। मौतों के सरकारी आंकड़ों को कुछ विशेषज्ञों ने तो ‘आंकड़ों के हत्याकांड’ की संज्ञा दी। एक ऐसा युद्ध, जो अदृश्य शत्रु के साथ लड़ा जा रहा था।
दुख और पीड़ा का यह तूफान इतना व्यापक और गहरा था कि समझ नहीं आ रहा था कि कौन किसके आंसू पोंछें। लोग अपनो की विधिवत अंत्येष्टि भी नहीं कर पा रहे थे। विदा होते स्वजन की आखिरी झलक भी दूभर थी। मनुष्य का वजूद महज एक पीपीई किट में समा गया था। सिर्फ भोपाल शहर की बात करें तो यह 1984 के जहरीली गैस लीक कांड में हुई हजारों मौतों के बाद आई दूसरी भयंकर आपदा थी। हालांकि जिस रात वो सब घटा था, वो एक सर्द रात थी।
30 अप्रैल 2021 के दिन पूरे देश में 4 लाख लोग संक्रमित हुए और 3500 मौतें सिर्फ कोरोना के कारण हुईं।
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यूं ग्रिगोरियन कैलेंडर के चौथे माह अप्रैल का महीना भारतीय संदर्भ में बैसाखी की मस्ती लिए होता है। सर्दी विदा हो चुकी होती है और गर्मियां अपना रंग दिखाने लगती है। फसलों के कटने और ढीले कपड़े पहनने का मौसम आ चुका होता है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अप्रैल माह की शुरूआत 1 अप्रैल को ‘फूल्स डे’ (मूर्ख दिवस) से होती है और समापन 30 अप्रैल को ‘पशु चिकित्सा दिवस’ से होता है। इस बीच और भी कई विशेष दिन और धार्मिक त्यौहार भी पड़ते हैं। लेकिन पिछले साल के अप्रैल ने अपने पीछे सिर्फ दुख और दहशत भरी दास्तां छोड़ी है।
यूं तो हर प्राणी के लिए मृत्यु अटल है। लेकिन वह इस क्रूर और सामाजिकता पर ही घनाघात करने वाले तेवर से आएगी, यह तो शायद ही किसी ने नहीं सोचा होगा। ऐसी लड़ाई कि जिसमें आप लगभग निहत्थे ही हों। ऐसी निर्दयता कि ईश्वर ने भी पीडि़त की प्रार्थना सुनने के बजाए अपने कान बंद कर लिए हों। विश्वास की हर सांस मास्क के पीछे छुप गई हो। गमी वाले घर में मातमपुरसी का साहस भी जवाब दे गया हो। हर कोई इस मानसिक आतंक में जी रहा हो कि मैं बचूंगा या नहीं..।
कौन क्यों जिंदा रहेगा और कौन चल देगा जैसे यक्ष प्रश्न कि जिसका उत्तर धर्मराज युधिष्ठिर के पास भी शायद ही हो। श्मशान घाटों में मंडी की तरह वारिसी और लावारिस लाशों की लंबी कतारें हों। शवों को जलाने के लिए विश्रामघाटों का ताबड़तोड़ विस्तार करना पड़ा हो। अस्पतालों की हालत मुसाफिरखाने से भी ज्यादा बदतर हो। दवाइयों और इंजेक्शनों की ब्लैक की सरेआम कालाबाजारी और चोरी हो। जिंदा रहने की आस में मनमर्जी से ली और दी गई दवाइयों का घातक दुष्परिणाम हो। जिसका असर कई लोग आज तक भुगत रहे हों..वो अप्रैल जो अब इतिहास में काले अक्षरों में दर्ज हो गया है...ईश्वर करे फिर न आए...।
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