सेंट्रल जीएसटी में व्याप्त भ्रष्टाचार सिर्फ कानपुर तक ही सीमित नहीं है। रिश्वतखोरी का यह मकड़जाल लखनऊ और दिल्ली मुख्यालय तक फैला है। इसी मकड़जाल ने अब तक के सबसे बड़े कर सुधार जीएसटी की धार को कमजोर करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।
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जिन पर टैक्स चोरी रोकने की सबसे बड़ी जिम्मेदारी थी, उन्होंने ही उत्पादक इकाइयों, सेवा प्रदाताओं और बड़ी फर्मों को टैक्स चोरी की खुली छूट दी। उसके बदले में मोटा माल लिया जाता था। इस रिश्वतखोरी का हिस्सा विभागीय अफसरों के ही संगठित गिरोह के जरिए लखनऊ और दिल्ली तक पहुंचाया जाता था।
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यही वजह है कि खुद विभागीय अफसर भी मानने लगे थे कि आजादी के बाद सबसे ज्यादा टैक्स चोरी इन्हीं छह माह में हुई है। सेंट्रल जीएसटी के अफसरों ने कानपुर और आसपास के इलाके में फैले अरबों रुपये के अघोषित पान मसाला, इस्पात, प्लास्टिक कारोबार को नजरअंदाज किया।
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उपभोक्ता वस्तुओं के आवागमन में राज्य के ई-वे बिल के मुताबिक विभागीय अफसरों ने वाहनों की छानबीन नहीं की। टैक्स चोरी रोकने के लिए वाणिज्यिक और औद्योगिक इकाइयों की जांच पड़ताल के आदेशों को नजरअंदाज किया जाता रहा। इसके बदले में छोटी बड़ी औद्योगिक इकाइयों और उत्पादकों को माल लाने ले जाने की खुली छूट दी गई।
अफसरों से जब सवाल होता तो जवाब मिलता था कि उद्यमियों को यह जीएसटी के शुरुआती दौर की राहत है। पेचीदगियों को समझने का वक्त दिया जा रहा है। दरअसल, इसके पीछे रिश्वतखोरी के संगठित गिरोह की कमाई का खेल था। हालांकि जीएसटी लागू होने के सात माह बाद इस कर प्रणाली में भ्रष्टाचार के खिलाफ अब तक की सबसे बड़ी कार्रवाई हुई है।