1971 के भारत-पाक युद्ध के दौरान एक घटना ऐसी भी घटी थी, जिस पर आज भले ही पाकिस्तान वाहवाही लूटता है, लेकिन इस घटना ने पूरी दुनिया को भारतीय जांबाजों की शूरवीरता से रूबरू करवा दिया था। पढ़ें कैप्टन महेंद्र नाथ मुल्ला की बहादुरी की कहानी।
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कैप्टन महेंद्र नाथ मुल्ला
नेवी के कैप्टन महेंद्र नाथ मुल्ला की आईएनएस खुखरी की इस शहादत को हमेशा देश सलाम करता रहेगा। किस तरह उन्होंने अपने अन्य साथियों की जान बचाते हुए न केवल शहादत को गले लगाया, बल्कि जहाज पर सवार एक कैप्टन के दायित्व को भी बखूबी निभाया। इतना ही अपनी लाइफ जैकेट भी जहाज के बावर्ची को पहनाकर उसे भी पानी में धकेल दिया, ताकि उसकी जान भी बच जाए और आप खुद आईएनएस खुखरी के क्वार्टर डेक पर खड़े होकर शहादत का इस्तकबाल करने लगे।
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कैप्टन महेंद्र नाथ मुल्ला
विगत दिनों चंडीगढ़ में आयोजित मिलिट्री लिटरेचर फेस्ट के दौरान युद्ध वार्ताकार मेजर जनरल आके कौशल ने इस वीरता की दास्तां से अवगत करवाया। मेजर जनरल आके कौशल ने बताया कि भारत-पाकिस्तान के बीच सन 1971 में युद्ध छिड़ चुका था। अंदेशा था कि पाक नौसेना भी हरकत कर मुंबई बंदरगाह को निशाना बना सकती है। इसलिए नौसेना फ्लीट अरब सागर में सक्रिय हो गई।
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कैप्टन महेंद्र नाथ मुल्ला
पाकिस्तान की पीएनएस हंगोर (पनडुब्बी) भारतीय नौसेना को निशाना बनाने भारतीय जल सीमा में घुस चुकी थी। उसके भेजे जा रहे संदेशों को भारतीय नौसेना ने टैप कर लिया और ये मालूम चल गया कि पाकिस्तानी पनडुब्बी भारतीय जल सीमा में ही घूम रही है। इसे नेस्तनाबूद करने के लिए नेवी ने अपनी एंटी सबमरीन आईएनएस खुखरी और कृपाण को तैनात किया। दोनों 8 दिसंबर को मुंबई से चले और 9 दिसंबर को उस इलाके तक पहुंच गए, जहां पाकिस्तानी पनडुब्बी हंगोर के होने का अंदेशा था।
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कैप्टन महेंद्र नाथ मुल्ला
हंगोर को भारतीय एंटी सबमरीनों के पहुंचते ही सबमरीन कृपाण पर टॉरपीडो (पनडुब्बी का गोला) दाग दिया। लेकिन निशाना चूक गया। उसके तुरंत बाद ही पाक पनडुब्बी हंगोर ने दूसरा टॉरपीडो एनआईएस खुखरी पर दाग दिया। खुखरी पर दो छेद हो चुके थे और जहाज डूबना शुरू हो गया था। कैप्टन मुल्ला ने सभी साथियों को जल्द से जल्द लाइफ सेविंग जैकेट पहनकर अरब सागर में कूदने को कहा। दो अफसर साथी मुल्ला को भी अपने साथ लेकर पानी में कूदना चाहते थे, लेकिन मुल्ला ने उन्हें फटाफट नीचे धकेल दिया।
मेजर जनरल आके कोशल ने बताया कि उस वक्त जहाज के बावर्ची के पास लाइफ सेविंग जैकेट मौजूद नहीं थी। मुल्ला ने अपनी लाइफ सेविंग जैकेट पहनाकर उसे भी पानी में धकेल दिया, ताकि उसकी भी जान बच जाए। जहाज डूबता जा रहा था। ऐसे में मुल्ला क्वार्टर डेक पर सिगरेट सुलगाकर बेखौफ खड़े हो गए । मेजर जनरल ने बताया कि नेवी में ये नियम होता है कि चाहे जहाज डूब रहा हो, कैप्टन जहाज नहीं छोड़ता। मुल्ला ने अपनी शहादत के साथ नेवी की इस परंपरा को भी निभाया। मरणोपरांत कैप्टन महेंद्रनाथ मुल्ला का महावीर चक्र से सम्मानित किया गया।