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मजहबी बंधन तोड़ हिंदू और मुस्लिम दंपती ने एक दूसरे को दी किडनी, एक की पत्नी तो दूसरे का बचा सुहाग

Thu, 30 May 2019 01:58 AM IST
ajay kumar न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
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देश में जाति और धर्म के नाम पर राजनीति करने वालों के लिए यह खबर किसी एक प्रेरणा से कम नहीं है। बीते एक साल से किडनी जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे दो संप्रदाय के लोगों को जब कोई सहारा नहीं मिला तो सभी मजहबी बंधन टूट गए। स्वैप किडनी ट्रांसप्लांट के बाद अब एक हिंदू और मुस्लिम परिवार के बीच रिश्तों के एक नए बंधन में बंधकर नए जीवन का आनंद उठा रहे हैं।
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सांकेतिक तस्वीर
इस पूरे मिशन को अंजाम तक पहुंचाने वाले फोर्टिस अस्पताल के डॉ. प्रियादर्शी रंजन ने प्रेस क्लब में आयोजित एक कार्यक्रम में बताया कि अब्दुल अजीज (53) एक कश्मीरी मुसलमान पिछले एक साल से किडनी फेल होने के कारण डायलिसिस पर जिंदगी के लिए संघर्ष कर रहे थे, क्योंकि उसे किडनी दान करने की इच्छुक पत्नी शाजिया (50) का ब्लड ग्रुप मैचिंग नहीं हुआ था इसलिए किडनी नहीं मिल पा रही थी। 
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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : demo pic
इसी प्रकार बिहार की मंजुला देवी (42) और उनके पति सुजीत कुमार (46 वर्ष) का भी ब्लड ग्रुप मैच नहीं होने के कारण किडनी ट्रांसप्लांट संभव नहीं हो पा रहा था। इसके चलते भारत के मानव अंग प्रत्यारोपण अधिनियम के दिशा-निर्देशों के अनुसार वैध किडनी दाता होने के बावजूद मंजुला की किडनी ट्रांसप्लांट नहीं हो पा रही थी।

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सांकेतिक तस्वीर
उन दोनों को स्वैप किडनी ट्रांसप्लांट से आशा की एक किरण दिखी, जहां ये दोनों परिवार एक-दूसरे के साथ आई किडनी ऐप के जरिए संपर्क में आए, जिसके बाद दोनों का सफल इलाज हुआ। शाजिया की किडनी प्राप्त करने वाली मंजुला देवी ने कहा, मैं बहुत खुशकिस्मत महसूस करती हूं कि हमारा शाजिया के परिवार से संपर्क हुआ। सुजीत कुमार से किडनी प्राप्त करने वाले अब्दुल अजीज ने कहा कि किसी व्यक्ति की जरूरत के समय मदद करने से बड़ा कोई धर्म नहीं है। 
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सांकेतिक तस्वीर
दुनिया में 90 फीसदी लोग डायलिसिस के सहारे चल रहे हैं। जबकि 10 प्रतिशत लोग ट्रांसप्लांट करा पाते हैं। आई किडनी ऐप के संचालकों का कहना है कि देश-दुनिया के लोगों को एक साथ जोड़ा जाएगा। डायलिसिस की अपेक्षा ट्रांसप्लांट अधिक आसान है। डायलिसिस के केस में 80 प्रतिशत ही लोग बच पाते हैं, जबकि ट्रांसप्लांट में सौ फीसदी बचने की संभावना रहती है।
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