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'16 साल मां की दर्द भरी आंखें पढ़ी हैं, स्टूडेंट्स को भी नहीं बताया- पत्रकार छत्रपति की बेटी हूं'

Sat, 19 Jan 2019 09:08 AM IST
खुशबू गोयल रीतिका पठानियां, अमर उजाला, पंचकूला
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श्रेयसी
मैंने 16 साल तक मां की दर्द भरी आंखों पढ़ी, यहां तक कि अपने स्टूडेंट्स को भी नहीं बताया कि पत्रकार छत्रपति की बेटी हूं। कहते-कहते भावुक हो गई वो, पढ़ें एक बेटी के दर्द की कहानी...
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श्रेयसी
पापा की मौत के बाद हम पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। मां को हमने पल-पल दुख झेलते देखा है लेकिन लंबे इंतजार के बाद फैसले का यह पल हमारे लिए बेहद सुकून भरा है। फैसला आने के बाद मां के चेहरे पर जो खुशी दिखी, वह हमने इन 16 सालों में कभी नहीं देखी। यह कहते हुए मृतक पत्रकार रामचंद्र छत्रपति की बेटी श्रेयसी की आंखें छलक पड़ीं।
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श्रेयसी
अमर उजाला से खास बातचीत में श्रेयसी ने बताया कि उनकी मां बेहद शांत स्वभाव की हैं। वह अपनी भावनाएं शब्दों में बयां नहीं करतीं लेकिन इन 16 सालों में मैंने अपनी मां की दर्द भरी आंखें पढ़ी हैं। मुझे मेरे स्वर्गीय पिता पर गर्व है कि उन्होंने डेरा प्रमुख के हाथों उजड़े परिवारों का बदला लिया, जिससे लोग बहुत बड़ी ताकत समझकर डर जाते थे। पिता ने अपनी जान गंवाकर सब को न्याय दिलाया। देश के सभी पत्रकारों और लोगों को उनसे सीख लेनी चाहिए।

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श्रेयसी
श्रेयसी पंचकूला के एक कॉलेज में पत्रकारिता विषय पढ़ाती हैं। वे कहती हैं कि मैं अकसर क्लास में पत्रकार छत्रपति का उदाहरण दिया करती थी, लेकिन छात्रों को कभी नहीं बताया कि उसी पत्रकार की बेटी हूं। अब बच्चों को इस बारे में पता चला है और मैं जानती हूं कि क्लास में जाते ही उनके सवालों का जवाब देना है। आज पूरे देश को पता चला है कि छत्रपति का बेटा अंशुल ही नहीं, पूरा परिवार इस लड़ाई में एक था।

 
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श्रेयसी
श्रेयसी ने बताया कि जब उनके पिता की गोली मारकर हत्या कर दी गई, तब वह 16 साल की थीं। उनके पिता को न्याय दिलाने के लिए उन्हें काफी संघर्ष करना पड़ा। न्याय के इंतजार में बीते इन 16 सालों में उनके हौसले कई बार गिरते-उठते रहे। इस दौरान उन्हें बहुत से लोगों और राजनीतिक नेताओं से केस वापस लेने का संदेश भी मिला लेकिन परिवार ने कदम पीछे नहीं हटाया। आज फैसला आने के बाद वही रिश्तेदार और राजनीतिक हस्तियां बहती गंगा में हाथ धो रही हैं।
 
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Anshul Chhatrapati
भाई अंशुल के जज्बे को सलाम
श्रेयसी ने अपने पिता को न्याय दिलाने में किए गए संघर्ष के लिए भाई अंशुल का धन्यवाद किया। उन्होंने कहा कि उनका भाई मात्र 21 साल का था जब यह दर्दनाक घटना हुई। जिस उम्र में युवा अपने करियर बनाने के लिए संघर्ष में जुट जाते हैं, उस उम्र में भाई ने पिता को न्याय दिलाने के लिए कचहरियों के चक्कर काटने शुरू किए। वह अपने छोटे-छोटे बच्चों को घर छोड़कर कोर्ट में तारीखें भुगतने पहुंचता था। हालांकि इस दौरान जहां कुछ अच्छे लोग साथ खड़े रहे, वहीं कुछ पीछे भी हट गए। लेकिन उनसे भी उन्हें सीख मिली कि न्याय की लड़ाई अकेले ही लड़नी पड़ती है।
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श्रेयसी
सिस्टम ने दिया सबसे अधिक दर्द
श्रेयसी ने कहा कि पिता को न्याय दिलाने में सबसे अधिक दर्द परिवार को सिस्टम से मिला है। पापा की आखिरी इच्छा थी कि डेरा प्रमुख का चेहरा बेनकाब हो और उनकी इसी इच्छा ने ही हमें जज्बा दिया। वह सिस्टम को बताना चाहती हैं कि जनता टीआरपी या वोट बैंक के लिए नहीं है, सिस्टम को हर इंसान की भावना की कद्र करनी चाहिए।  
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