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श्राद्ध पर्व 2015: 13 क्लिक कर जानें, कौन-सा श्राद्ध कब करें?

Mon, 21 Sep 2015 09:56 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़
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27 सितंबर से श्राद्ध पर्व शुरू हो रहा। किस तारीख को कौन सा श्राद्ध है और कौन सा श्राद्ध कब करना चाहिए, सिर्फ 13 क्लिक में जानिए। रिपोर्टः नीरज कुमार, चंडीगढ़
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आश्विन कृष्ण पक्ष प्रतिपदा से अमावस्या तक के समय को श्राद्ध कहते हैं। यह कहना है सेक्टर-30 के भृगु ज्योतिष केंद्र के प्रमुख और कर्मकांडी बीरेंद्र नारायण मिश्र का। उनके अनुसार धर्म शास्त्र कहते हैं कि पितरों को पिंडदान करने वाला गृहस्थ दीर्घायु, यश को प्राप्त करने वाला होता है।
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मिश्र करते हैं कि पितरों की कृपा से सब प्रकार की समृद्धि और सौभाग्य की प्राप्ति होती है। पितृपक्ष में पितरों को आस रहती है कि हमारे पुत्र पौत्र पिंड दान करके हमें संतुष्ट कर देंगे। इसी आस से पितृलोक से पितर पृथ्वी पर आते हैं। मृत्यु तिथि के दिन किए श्राद्ध को पार्वण श्राद्ध कहा जाता है।

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पूर्णिमा का श्राद्ध 27 सितंबर रविवार, प्रतिपदा का श्राद्ध 28 सितंबर सोमवार, द्वितीया का श्राद्ध 29 सितंबर मंगलवार, तृतीया का श्राद्ध 30 सितंबर बुधवार, चतुर्थी का श्राद्ध 1 अक्तूबर वीरवार, पंचमी का श्राद्ध 2 अक्तूबर शुक्रवार, षष्टी का श्राद्ध 3 अक्तूबर शनिवार, सप्तमी का श्राद्ध 4 अक्तूबर रविवार
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अष्टमी का श्राद्ध 5 अक्तूबर सोमवार, नववीं का श्राद्ध 6 अक्तूबर मंगलवार, दशवीं का श्राद्ध 7 अक्तूबर बुधवार, एकादशी का श्राद्ध 8 अक्तूबर वीरवार, द्वादशी का श्राद्ध 9 अक्तूबर शुक्रवार, त्रयोदशी का श्राद्ध 10 अक्तूबर शनिवार, चतुर्दशी का श्राद्ध 11 अक्तूबर  रविवार, अमावस्या का श्राद्ध 12 अक्तूबर सोमवार
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सेक्टर-18 के श्री राधा कृष्ण मंदिर में पुजारी और देवालय पूजक परिषद के कोषाध्यक्ष लाल बहादुर दुबे का कहना है कि किसी व्यक्ति की मृत्यु पूर्णिमा को हो तो उसका श्राद्ध भाद्र शुक्ल पूर्णिमा को करना चाहिए। इसमें दादा -दादी, परदादी और नाना नानी का श्राद्ध करना चाहिए।
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30 सितंबर को तृतीया तिथि दिन बुधवार को भरणी नक्षज्ञ होने के कारण भरणी का श्राद्ध कहा जाता है। भरणी नक्षत्र में पितरों का पार्वणा श्राद्ध करने का विशेष महत्व है। यह श्राद्ध करने से गया श्राद्ध करने का महत्व है। नवमी तिथि को सौभाग्यवती स्त्रियों का श्राद्ध किया जाता है। संन्यासियों का श्राद्ध पार्वणा पद्धति से द्वादशी में किया जाता है। भले ही इनकी मृत्यु तिथि कोई भी क्यों न हो।

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सेक्टर-30 के शिव शक्ति मंदिर के पुजारी श्याम सुंदर शास्त्री का कहना है कि 10 अक्तूबर दिन शनिवार को मघा नक्षत्र होने के कारण मघा त्रयोदशी का श्राद्ध कहते हैं। आश्विन कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी में पितृ श्राद्ध का बहुत महत्व है।

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त्रयोदशी के साथ मघा नक्षत्र हो तो इसका महत्व यह है कि यदि श्राद्ध किया जाए तो पितर प्रसन्न होकर आशीर्वाद देते हैं। उनके अनुसार जिनके जन्म कुंडली में पितृदोष के कारण घर परिवार में और पति पत्नी में क्लेश अशांति हो तो वह शांत हो जाता है। घर में सुख शांति रहती है।

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सेक्टर-15 स्थित जय श्री राम ज्योतिष केंद्र के प्रमुख स्वामी राम बहादुर मिश्रा, सेक्टर-32 के प्राचीन श्री हनुमान मंदिर के पुजारी रवींद्र प्रसाद मिश्र और अभय चंद झा के अनुसार वाहन दुर्घटना, सांप के काटने से, विष के खाने से, अकाल मृत्यु के कारण जिसकी मृत्यु हुई हो उसका श्राद्ध चतुर्दशी तिथि में करनी चाहिए।

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चतुर्दशी तिथि में मरने वालों का श्राद्ध चतुर्दशी में नहीं करनी चाहिए। इसका श्राद्ध त्र्योदशी या अमावस्या को करनी चाहिए। जिसे किसी की मृत्यु की तिथि का ज्ञान न हो उसका श्राद्ध अमावस्या को करनी चाहिए।

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बीरेंद्र नारायण मिश्र के अनुसार श्राद्ध में पिंड दान और तर्पण करने के बाद पंचवली करने के बाद ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए। पंचवली के बिना श्राद्ध पूर्ण नहीं होता।
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क्या करें श्राद्ध पर- गो को पश्चिम दिशा में मुख करके पत्ते पर देना चाहिए। कुत्ते को जमीन पर। कौवा को पृथ्वी पर। देवता मनुष्य, यक्ष आदि को पत्ते पर। कीड़ा मकोड़ों चीटियों को पत्ता पर देना चाहिए।
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