6 दिन, 109 घंटे, 150 फीट गहरा बोरवेल और दो साल के बच्चे को बचाने की कोशिश, जो फेल हो गई। 18 क्लिक करके देखिए कैसे चला 'ऑपरेशन फतेह' और कैसे वो नाकाम हुआ।
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ऑपरेशन फतेह
- फोटो : अमर उजाला
10 साल पुराना बोरवेल था, कार निकालने के लिए हटाई थी ईटें
घटना 6 जून दिन वीरवार शाम चार बजे की है। संगरूर जिले में सुनाम के गांव भगवानपुरा निवासी सुखविंदर सिंह का दो साल का बेटा फतेहवीर खेत में बने बोरवेल में गिर गया। 10 साल पुराने बोरवेल को ईटों से ढककर रखा गया था। किसी ने गाड़ी निकालने को ईंटें हटा दी। फिर उसके ऊपर रेत से भरा कट्टा रख दिया गया , लेकिन बारिश पड़ने से वह कमजोर हो चुका था। खेलते-खेलते बच्चे का पैर उस पर आ गया। उसके दबाव से कट्टा बोरवेल में धंसता चला गया और फतेहवीर भी।
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मां बचाने आई, पर बस छू सकी बेटे को
फतेहवीर के चिल्लाने की आवाज सुनकर मां-बाप दौड़े आए। मां गगनदीप ने भागकर बच्चे को पकड़ने की कोशिश भी की थी, लेकिन वह फतेहवीर को केवल छू ही सकी थीं। उसके हाथ में रद्दी हो चुके कट्टे का टुकड़ा आया। वह इसके लिए खुद को कोस रही है। मैं अपने बच्चे को बचा नहीं सकी, ये कहते हुए वह बार-बार बेहोश हो जाती है। वहीं पिता का भी रो-रोकर बुरा हाल है। वह यही कह रहे हैं कि मैं हाथ धोने न जाता तो फतेहवीर को गिरने से बचा सकता था।
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इकलौती संतान था, पांच साल बाद हुआ था
परिजनों ने बताया कि फतेहवीर उनकी इकलौती संतान है। सुखविंदर सिंह और गगनदीप कौर की शादी करीब सात साल पहले हुई थी, जिसके पांच साल बाद कई मन्नतों के बाद फतेहवीर सिंह का जन्म हुआ था। 10 जून को फतेहवीर दो साल का हो गया था। नेशनल डिजास्टर रिस्पॉन्स फोर्स (एनडीआरएफ) और डेरा समर्थक टीम (शाह सतनाम फोर्स) ने मोर्चा संभाला हुआ था, लेकिन 109 घंटे तक जिंदगी और मौत से लड़ने के बाद फतेहवीर हार गया।
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एनडीआरएफ की रस्सी से खींचने की कोशिश नाकाम रही
वीरवार को बच्चा गिरा और शुक्रवार को बठिंडा से आई आर्मी की यूनिट ने मोर्चा संभाल लिया। इससे पहले एनडीआरएफ की टीम ने बच्चे के हाथों में रस्सी डालकर उसे बाहर निकालने का प्रयास किया गया,लेकिन सफलता नहीं मिली। बच्चे को सुरक्षित बाहर निकालने के लिए प्रशासन को बार-बार योजना बदलनी पड़ रही है। बोर के आसपास करीब चालीस फीट जमीन को खोद दिया गया है और बोर के समानांतर करीब 48 इंची चौड़ा पाइप जमीन में डालने का काम शुरू किया गया।
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डेरा समर्थक टीम ने बोर को समानांतर कर दिया था
योजना बनाई गई थी कि उक्त पाइप को करीब साठ फीट जमीन के नीचे डालने के बाद नौ इंच बोर (जिसमें बच्चा गिरा है) के साथ मिलाया जाएगा और फिर बच्चे को निकाला जाएगा। कई जेसीबी मशीनें और ट्रैक्टर मिट्टी हटाने के काम में जुटे रहे। शनिवार को डेरा समर्थक टीम (शाह सतनाम फोर्स) ने भी मोर्चा संभाला लिया। शाम चार बजे तक डेरा समर्थक टीम ने सौ फीट समानांतर बोर कर दिया और उसके बाद नए बोर को पुराने बोर से मिलाने की कवायद शुरू की।
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सीमेंट के पाइप गीली मिट्टी होने के कारण टेढ़े हो गए
ऑपरेशन ‘फतेह’ के लिए किसी आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल नहीं किया गया, बल्कि दशकों से चली आ रही पुरानी तकनीक अपनाई गई। हाथों से ही मिट्टी निकालने का काम हुआ। सौ फुट नीचे ऑक्सीजन की कमी के कारण बचाव टीम के कुछ सदस्य बीमार हो गए। जिस बोर में फतेहवीर फंसा था, उसके समानांतर करीब तीन फीट चौड़ी टनल खोदकर उसमें पाइप डाले गए, लेकिन 100 फीट गहराई पर पहुंचने पर मिट्टी गीली होने के कारण एक पाइप टेढ़ी हो गई।
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सुरंग की दिशा गलत हो गई, जो किसी और बोर से मिल गई
नई योजना के तहत लोहे के पाइप तैयार कर टनल में डाले गए और फिर फतेहवीर को निकालने की कवायद शुरू हुई। रविवार आधी रात को होरिजोंटल सुरंग को सवा सौ फीट तक खोद दिया गया था, लेकिन वर्टिकल सुरंग को पहले के बोर (जिसमें फतेहवीर फंसा हुआ है) से मिलाने की दिशा गलत हो गई। उसके बाद फिर से नई दिशा में सुरंग खोदी गई। सोमवार सुबह सुरंग को पहले के बोर से मिलाने का काम शुरू किया गया, लेकिन उक्त जमीन में पहले से पडे़ एक बोर से उसका संपर्क हो गया।
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दूसरी बार सुरंग की गहराई ज्यादा हो गई
इसके बाद सोमवार को नए सिरे से दोबारा काम शुरू हुआ, लेकिन फिर पता चला कि नई सुरंग की गहराई (120 फुट) पुराने बोर (108 फुट पर जहां फतेहवीर फंसा है) के मुकाबले ज्यादा हो गई है। इसके बाद टनल में लोहे का फ्रेम डालकर ऊपर फिक्स किया गया और फिर से खुदाई शुरू की गई। शाम पांच बजे पुराने बोर का निचला भाग मिलने का दावा किया गया, लेकिन फतेहवीर को निकालने की जद्दोजहद जारी रही। शाम 6 बजे भी ऐसे ही हालात दिखाई दिए।
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जब सब नाकाम हो गए तो गुरिंदर को बुलाया गया
मंगलवार सुबह करीब तीन बजे जब नौ इंच चौडे़ पुराने बोर का संपर्क नई सुरंग से कराने की तमाम कोशिशें नाकाम हो गईं तो प्रशासन ने देसी जुगाड़ का सहारा लिया गया। 109 घंटे हो चुके थे और बोर से बदबू आने लगी थी। प्रशासनिक अधिकारियों ने मौके पर मौजूद गांव मंगवाल के गुरिंदर सिंह को बुलाया गया। सीसीटीवी के जरिए मुआयना करने के बाद नई योजना बनाई गई। गुरिंदर ने पहले ही दिन कहा था कि मुझे एक घंटा दे दो, बच्चे को निकाल दूंगा, लेकिन अधिकारी नहीं माने।
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गुरिंदर ने 15 मिनट में ही बच्चे के साथ फंसी बोरी ढीली कर दी थी
सूत्र बताते हैं कि गुरिंदर ने जब फतेहवीर को निकालने का काम शुरू किया तो अधिकारी घटनास्थल से खिसक गए। गुरिंदर के कहने पर मौके पर ही लोहे की एक लंबी रॉड बनाई गई और उसमें प्लास्टिक के पाइप जोडे़ गए। गुरिंदर ने सीसीटीवी पर नजर रखते हुए बच्चे के शरीर में फंसी बोरी को रॉड से धीरे-धीरे दबाते हुए 15 मिनट से भी कम समय में ढीला कर हटा दिया। इसके बाद उसी पुराने बोर में से फतेहवीर को रस्सी से ऊपर खींच लिया गया, तब तक फतेह का शरीर सड़ने लगा था।
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रिस्क नहीं लेने का फैसला पड़ा भारी
फतेहवीर को बाहर निकालने के ऑपरेशन पर पहले ही दिन से सवाल उठ रहे थे। अंतिम तीन दिन तो सरकार और प्रशासन बस अंधेरे में तीर में चलाते रहे और परिजन गुमराह होते गए। प्रशासन और सरकार के प्रतिनिधि यही बात दोहराते रहे कि फतेहवीर को सुरक्षित बाहर लाने में किसी भी तरह का रिस्क नहीं लिया जाएगा। बावजूद इसके फतेहवीर सिंह, इस तंत्र की ‘नीति व नीयत’ की भेंट चढ़ गया और ऑपरेशन फतेह अपने पीछे कई गंभीर सवाल छोड़ गया है।
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पुराने बोर की लोकेशन ही नहीं तलाश पाई टीम
दो साल के मासूम ‘वीर’ की जिंदगी ‘फतेह’ हो सकती थी। बशर्ते सरकार किसी ठोस योजना पर अमल करती। किसी भी टीम का टारगेट अंजाम तक नहीं पहुंच सका। शर्मसार करने वाली बात तो यह है कि पुराने बोर की लोकेशन ढूंढने में ही दो दिन का वक्त बर्बाद हो गया, लेकिन लोकेशन नहीं मिली।
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न फौज बुलाई, न विशेषज्ञों की टीम
ऑपरेशन फतेहवीर पर पहले ही दिन से सवाल उठ रहे थे। लोगों का कहना है कि किसी फौज या विशेषज्ञों की टीम को बुलाया जाता तो फतेहवीर को बचाया जा सकता था। छह जून को जिस दिन फतेहवीर गिरा, उस दिन एनडीआरएफ की टीम ने बच्चे की हाथों में रस्सी डालकर खींचने की कोशिश की, लेकिन नाकाम रही। इसके बाद पैरलल सुरंग बनाने का काम शुरू किया गया। ऐसे में देरी से बचाव कार्य शुरू होने से भी फतेहवीर की जान गई।
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पहले ही दिन नहीं सुनी गई गुरिंदर की बात
कछुए की चाल से काम किया गया। प्रशासन ने अत्याधुनिक मशीनें नहीं मंगाई। लोगों ने तसलों में भरकर मिट्टी निकाली। इससे तीन दिन बर्बाद हो गए। पूरे ऑपरेशन में अनुभवहीनता साफ तौर पर दिखाई दी। 9 और 10 जून को कभी टनल ज्यादा गहरी हुई तो कभी इसका बोर से मिलान ही नहीं हो सका। जब प्रशासन अपनी कोशिशें कर थक गया तो 11 जून को सुबह मौके पर मौजूद गुरिंदर सिंह की बात सुनी गई। आखिरकार गुरिंदर ने ही फतेहवीर का शव बाहर निकाला।
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मुंह में रेत भर गई थी, ऑक्सीजन नहीं मिल पाई
दो साल के मासूम फतेहवीर सिंह की मौत तड़प-तड़प कर हुई है। जांच में खुलासा हुआ कि फतेहवीर सिंह जब वह गिरा तो उसके साथ रेत की बोरी भी थी। दोनों साथ-साथ नीचे गए और फतेहवीर के मुंह में रेत भर गई, जिस कारण वह सांस नहीं ले पा रहा था। उसे पर्याप्त ऑक्सीजन भी नहीं मिल पाई थी। उसके मुंह के अंदर से रेत और बाहर बोरी के अंश मिले हैं। उसकी मौत तीन से चार दिन पहले हो गई थी। शरीर भी सड़ने लगा था।
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न पल्स चल रही थी, न सांस थे
फतेहवीर का पोस्टमार्टम करने वाले पीजीआई के फोरेंसिक डिपार्टमेंट के एचओडी डॉ. वाईएस बंसल व असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. सेनथिल ने बताया कि जब बच्चे को पीजीआई में लाया गया तो न उसकी पल्स चल रही थी और न ही सांस। हृदय की धड़कन भी बंद थी। डाक्टरों के मुताबिक मौत की एक वजह नहीं है, बल्कि कई सारे फैक्टर ऐसे रहे, जिनकी वजह से उसने दम तोड़ा। शरीर के अंदर किसी भी तरह के चोट के निशान नहीं है।
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किसी तरह की चोट के निशान नहीं
पहली वजह, फतेहवीर को पर्याप्त ऑक्सीजन न मिलना था। मेडिकल की भाषा में इसे हाइपोक्सिया कहते हैं। बोरवेल के अंदर पहले से ही घुटन की स्थिति बनी हुई थी। दूसरा, मुंह के ऊपर रेत होने के कारण उसे सांस लेने में दिक्कत आ रही थी। तीसरा, तापमान अधिक होने और खाने-पीने का सामान नहीं मिलने से उसे डिहाइड्रेशन भी हुआ। उसके हाथ में रेस्क्यू के निशान मिले हैं, जिससे पता चलता है कि उसे बचाने की कोशिश हुई है।
लोगों ने अंतिम विदाई देते हुए हाथ जोड़कर मांगी माफी
चंडीगढ़ पीजीआई में औपचारिकता के बाद फतेहवीर सिंह के पार्थिव शरीर को हेलीकॉप्टर से सीधे गांव भगवानपुरा लाया गया। फतेहवीर के पिता सुखविंदर सिंह, माता गगनदीप कौर, दादी जसवंत कौर और दादा रोही सिंह ने धार्मिक रस्मों को पूरा किया। इसके तुरंत बाद अंतिम संस्कार के लिए फतेहवीर के पार्थिव शरीर को गांव शेरों ले जाया गया। फतेहवीर के पिता सुखविंदर और दादा रोही सिंह ने चिता को अग्नि दी। इस दौरान कई लोग हाथ जोड़कर माफी मांगते दिखाई दिए। लोग कह रहे थे कि ‘फतेहवीर सानूं माफ करीं साडियां दुआवां वी तेनूं बचा नहीं सकियां।’