रॉक गार्डन के निर्माता नेकचंद नेकचंद का इस तरह चले जाने से न केवल उनकी पत्नी का रो-रोकर बुरा हाल है, बल्कि उनके चाहने वालों की आंखों से आंसू नहीं थम रहे। देखिए गमगीन तस्वीरें।
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नेकचंद की अंतिम विदाई, पत्नी पथराई...हर आंख फूट-फूट रोई
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नेक चंद सैनी की पत्नी कमला सैनी कहती हैं कि आईसीयू में होने के कारण वे नेक चंद को अंतिम क्षणों में देख नहीं सकी, इसका हमेशा मलाल रहेगा। उम्मीद थी कि वह ठीक होकर वापस घर आएंगे। नहीं पता था कि इस तरह चले जाएंगे।
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पुरानी यादें ताजा करते हुए उन्होंने बताया कि नेक चंद को कबाड़ और पुरानी चीजों से लगाव था। हालात यह हो गए थे कि लोग कबाड़ बेचने घर आने लगे। सबसे हर तरह का कबाड़ खरीद लेते थे। नदियों से पत्थर ढूंढ कर लाते। साइकिल से ही सारे पत्थर रॉक गार्डन तक ढोए।
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कमला सैनी कहती हैं कि एक दिन उनसे पूछा कि आखिर इनका करते क्या हैं, तो कहने लगे चल तुझे दिखाकर लाता हूं। वह मुझे पीडब्ल्यूडी स्टोर ले गए और अंदर बनी छोटी सी झोंपड़ी दिखाई। वहीं हमने पिकनिक मनाई और रोटी खाई।
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कमला ने बताया कि नवंबर में ही कैंसर की जानकारी मिल गई थी। लेकिन नेक चंद को यह बताया नहीं गया। मुंबई में एक डॉ. के साथ अप्वाइंटमेंट फिक्स कर दिखाने जाना था। लेकिन नेक चंद ने ‘यहां क्या कम डॉक्टर हैं’ कहकर जाने से मना कर दिया। काफी दिनों से उन्होंने खाना पीना छोड़ रखा था। जब मैं अस्पताल में मिलने गई तो मुझसे पूछा तुम ठीक हो।
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कमला सैनी ने बताया कि उस जमाने में आर्किटेक्ट और नक्शे से संबंधित अन्य काम करने वाले लोग नेक चंद की जमकर तारीफ करते थे। आर्किटेक्ट नेक चंद को कहते कि आपने हमें रोजी-रोटी दिलाई है। जब भी कोई बाहरी लोग चंडीगढ़ आकर किसी से कुछ देखने लायक चीज पूछते तो सीधा रॉक गार्डन का जिक्र आता। इसे दिखाकर आर्किटेक्ट को भी अन्य शहरों के लिए काम मिल जाता था।
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फ्लाइंग सिख मिल्खा सिंह कहते हैं कि मैंने अपना एक करीबी दोस्त खो दिया है। जब-जब देशवासी, शहरवासी या मैं खुद रॉक गार्डन को देखेंगे, हमेशा ही नेक चंद की याद आएगी। हम दोनों एक दूसरे से हर बात शेयर करते थे। हफ्ते में एक-दो बार उनसे मुलाकात हो जाया करती थी। नेक चंद ने जो देश और शहर को दिया है ऐसी धरोहर किसी ने न तो दी है और न ही दे पाएगा। वह दुनिया के लिए आदर्श हैं।
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नेकचंद की मौत की खबर सुनकर उनके घर पहुंचे भाई गुरदासमल सैनी।
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नेकचंद की मौत की खबर सुनकर उनके घर पहुंचे भाई गुरदासमल सैनी और दोस्त।
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नेकचंद की मौत की खबर सुनकर उनके घर पहुंचे उनके साथ काम करने वाले लोगा विलाप करते हुए।
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नेकचंद की मौत की खबर सुनकर उनके घर पहुंची एक कर्मचारी फूट-फूटकर रोती हुई।
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पत्थर मारकर आसमां में सुराख करने वाली हस्ती का नाम था नेकचंद। नेकचंद के निधन पर प्रधानमंत्री मोदी भी गमजदा हैं। तस्वीरों में देखिए, नेकचंद की पूरी कहानी।
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आखिर क्यों न हों, नेक चंद सैनी ही वह अकेले शख्स हैं, जिनका 40 साल पहले किया गया एक प्रयास आज चंडीगढ़ की एक विशिष्ट पहचान बन चुका है और दुनिया इसे रॉक गार्डन के नाम से जानती है। प्रधानमंत्री मोदी ने भी नेकचंद के निधन पर टवीट कर शोक जताया।
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ट्विटर और पीएमओ की ऑफिश्यल वेबसाइट पर प्रधानमंत्री ने अपने शोक संदेश में कहा, ‘श्री नेकचंद जी रॉक गार्डन की अपनी प्रतिभावान कलाकारी और शानदार सृजनात्मकता के लिए हमेशा याद किए जाएंगे जिसे बहुत लोगों ने देखा है।’ ‘ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दे।’
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नेकचंद वो शख्स हैं, जिन्होंने मन में एक काम करने की ठानी, तो उसे पूरा करने के लिए अपनी सारी ताकत झोक दी। उनकी इच्छा शक्ति साकार हुई तो सरकार ने इसे नाम दिया रॉक गार्डन। नेकचंद ने अभी हाल ही में 15 दिसंबर 2014 को 90 साल पूरे किए थे। रॉक गार्डन पर भव्य तरीके से जन्मदिन मनाया गया था।
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रॉक गार्डन बनाने के पीछे का सच खुद नेकचंद ने बताया था। उन्होंने कहा था कि नौकरी के दौरान ही उन्हें इस काम का आइडिया आया था। वे अक्सर ऐसी जगह जाते थे, जहां बेकार सामान को फेंक दिया जाता था। उसे देखकर ही उन्हें बेकार चीजों से कुछ बनाने का विचार आया और वे उसे पूरा करने में जुट गए।
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नेकचंद के मुताबिक शुरुआत थोड़ी कठिन थी, लेकिन एक बार काम शुरू किया, तो फिर रुके नहीं। वे साइकिल से जगह-जगह जाते और बेकार सामान जुटाते। दिन में कई-कई घंटे वे सामान ही ढोते रहते थे, लेकिन जुनून इतना था कि कभी भी थकान को अपने पर हावी नहीं होने दिया।
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नेक चंद कहते थे कि आज से कई साल पहले चंडीगढ़ में सिर्फ खेत ही खेत थे। उस समय वे साइकिल से ही पूरे शहर का चक्कर लगा लेते थे। आज बड़ी-बड़ी इमारतें खड़ी हो गईं हैं। बेशक यहां हरियाली कम हुई है, लेकिन फिर भी उन्हें हमेशा इस शहर से बहुत लगाव रहा।
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नेक चंद की बेटी और परिवार के साथ इंग्लैंड में रहते हैं। नेक चंद की दोहती अनुपमा ने बताया कि उनके नाना जी बचपन में उन्हें यहां लेकर आते थे। यहां आकर उन्हें बहुत अच्छा लगता था। वे कई साल बाद भारत आई और वो भी खासकर नाना जी के बर्थ डे के लिए। (नेकचंद जी के जन्मदिन पर)
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शायद ही ऐसा कोई पर्यटक होगा, जो चंडीगढ़ आए और रॉक गार्डन नहीं पहुंचे। हर साल यहां देश-विदेश से लाखों लोग आते हैं। रोजाना करीब छह हजार सैलानी यहां आते हैं। इनमें स्कूली बच्चों से लेकर विदेशी पर्यटक तक शामिल हैं। इसके अलावा स्थानीय लोग भी बड़ी संख्या में यहां पहुंचते हैं।
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एक इंसान ने कबाड़ इकट्ठा करके ऐसा खूबसूरत जहान बना दिया, जिसे दुनिया भर में सराहा गया। ये इंसान कोई और नहीं, बल्कि रॉक गार्डन के निर्माता पद्मश्री नेकचंद थे, जो आज हमारे बीच नहीं रहे।
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रॉक गार्डन के निर्माता पद्मश्री नेकचंद का वीरवार रात पीजीआई में निधन हो गया। वे 90 वर्ष के थे। उनका निधन रात 12:12 बजे हुआ और उस वक्त उनके बेटे अनुज सैनी उनके साथ मौजूद थे।
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पीजीआई से मिली जानकारी के अनुसार उन्हें शाम 4 बजे पीजीआई लाया गया और हालात बिगड़ने पर रात 9 बजे आईसीयू में शिफ्ट किया। उनकी किडनी फेल हो गई थी। वे डायबिटीज, हाइपरटेंशन से भी पीड़ित थे। हाल ही में उन्हें कैंसर होने का पता चला था।
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नेकचंद का जन्म शेकरगढ़ जिला गुरदासपुर (अब पाकिस्तान) में 15 दिसंबर 1924 को हुआ था। 1947 में उनका परिवार चंडीगढ़ आकर बस गया। 1951 में नेकचंद पीडब्ल्यूडी डिपार्टमेंट में रोड इंस्पेक्टर थे। 1975 में उन्होंने टूटे फूटे सामान से रॉक गार्डन तैयार किया। भारत सरकार ने नेकचंद को उनके इस कार्य के लिए 1984 में पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया था।
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गत 15 दिसंबर को नेकचंद ने अपना 90वां जन्मदिन मनाया था। इस मौके पर पूरा परिवार मौजूद रहा। रॉक गार्डन में भव्य पार्टी दी गई, इसमें शहर के जाने-माने लोग और उनके चाहने वाले मौजूद रहे। आज वे पल बस यादगार बनकर रह गए।
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परिवार के साथ जन्मदिन मनाते नेकचंद का एक यादगार पल।
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परिवार के साथ जन्मदिन मनाते नेकचंद का एक यादगार पल।
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परिवार के साथ जन्मदिन मनाते नेकचंद का एक यादगार पल।
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परिवार के साथ जन्मदिन मनाते नेकचंद का एक यादगार पल।