फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

तस्वीरें: गरीबों का पेट भरने वाले 'लंगर बाबा' को पद्मश्री, जमीन बेचकर 39 सालों से खिला रहे हैं खाना

Sun, 26 Jan 2020 01:48 PM IST
ajay kumar नवदीप मिश्रा, अमर उजाला, चंडीगढ़
विज्ञापन
1 of 10
जगदीश आहूजा। - फोटो : अमर उजाला
जमीन बेचकर बिना किसी छुट्टी के रोजाना लोगों का पेट भरने वाले चंडीगढ़ के ‘लंगर बाबा’ को केंद्र सरकार ने पद्मश्री पुरस्कार देने की घोषणा की है। उम्र के 85 वसंत देख चुके जगदीश आहूजा को लोग प्यार से ‘लंगर बाबा’ के नाम से पुकारते हैं। पुरस्कार की घोषणा के बाद जगदीश आहूजा का कहना है कि पद्मश्री की जगह उनका इनकम टैक्स माफ कर दिया जाए, जिससे कि हमेशा जरूरतमंदों को खाना मिलता रहे और कोई भूखे पेट न सोए। आइए जानते हैं जगदीश आहूजा की कहानी...
विज्ञापन

2 of 10
जगदीश आहूजा।
बता दें कि पीजीआई चंडीगढ़ के सामने बीते 39 सालों से जगदीश आहूजा लगातार लंगर लगा रहे हैं। इसके लिए उन्होंने अपनी कई प्रॉपर्टी तक बेच दी। उनका कहना है कि लंगर सेवा करके उन्हें काफी सुकून मिलता है। पद्मश्री की घोषणा के बाद अमर उजाला से विशेष बातचीत में जगदीश आहूजा ने बताया कि पटियाला में उन्होंने गुड़ और फल बेचकर अपना जीवनयापन शुरू किया है। 1956 में लगभग 21 साल की उम्र में चंडीगढ़ आ गए। उस समय चंडीगढ़ को देश का पहला योजनाबद्ध शहर बनाया जा रहा था। यहां आकर उन्होंने एक फल की रेहड़ी किराए पर लेकर केले बेचना शुरू किया।
विज्ञापन

3 of 10
चंडीगढ़ के जगदीश आहूजा।
उन्होंने बताया कि मुझे याद है कि चंडीगढ़ में आने के दौरान शायद 4 रुपये 15 पैसे हाथ में थे। यहां आकर मुझे धीरे-धीरे पता लगा कि मंडी में किसी ठेले वाले को केला पकाना नहीं आता। पटियाला में फल बेचने के कारण मैं इस काम में माहिर हो चुका था। बस फिर मैंने काम शुरू किया और मेरी किस्मत चमक उठी। मैं अच्छे पैसे कमाने लगा। जगदीश आहूजा सेक्टर-23 डी में रहते हैं।

4 of 10
जगदीश आहूजा। - फोटो : फाइल फोटो
मांसाहरी भोजन देखकर होती थी घृणा
लंगर वाले बाबा ने बताया कि जब लोगों को भूखे पेट सड़क पर देखता हूं तो बैचेनी होने लगती थी। अपने बेटे के आठवें जन्मदिन पर मैंने 100 से 150 बच्चों को खाना खिलाना शुरू किया। लगभग 18 साल तक सेक्टर-23 में घर के पास लंगर चलाया। उसके बाद 2001 से पीजीआई के बाहर हर दिन लंगर लगाने लगा। यहां उत्तर भारत के दूरदराज इलाकों से आने वाले सैकड़ों मरीज व उनके परिजन आसानी से भोजन ग्रहण करते हैं। मुझे इस बात का सुकून मिलता है कि मेरी वजह से किसी को भूखा नहीं सोना पड़ता।
विज्ञापन

5 of 10
जगदीश आहूजा। - फोटो : फाइल फोटो
विभाजन के दौरान कई बार भूखा सोना पड़ा
जगदीश आहूजा बताते हैं कि आज वह भले ही एक सफल व्यवसायी हैं लेकिन उनका यह सफर इतना आसान नहीं रहा। 1947 में अपनी मातृभूमि पेशावर से बचपन में विस्थापित होकर पंजाब के मानसा शहर आ गए थे। उस समय उनकी उम्र करीब 12 वर्ष थी। वे बताते हैं कि इतनी कम उम्र से ही उनका जीवन संघर्ष शुरू हो गया था। उनका परिवार विस्थापन के दौरान गुजर गया था। ऐसे में जिंदा रहने के लिए रेलवे स्टेशन पर उन्हें नमकीन दाल बेचनी पड़ी ताकि उन पैसों से खाना खाया जा सके और गुजारा हो सके। कई बार तो बिक्री न होने पर भूखे पेट ही सोना पड़ता था। वह दिन याद आता है तो लगता है कि किसी को अपने सामने भूखा नहीं रहने देंगे।
विज्ञापन

6 of 10
जगदीश आहूजा। - फोटो : अमर उजाला
दादी से मिली लंगर लगाने की प्रेरणा
चंडीगढ़ में हालात सुधरे तो वर्ष 1981 में चंडीगढ़ और आसपास के क्षेत्रों में उन्होंने लंगर लगाना शुरू किया। आहूजा को लोगों को भोजन करवाने की प्रेरणा उनकी दादी माई गुलाबी से मिली, जो गरीबों के लिए अपने शहर पेशावर (अब पाकिस्तान में) में लंगर लगाया करती थीं। वर्तमान में इस काम में उनकी पत्नी निर्मल भी पूरा सहयोग कर रहीं हैं।
विज्ञापन

7 of 10
जगदीश आहूजा - फोटो : अमर उजाला
लंगर में देते हैं सात्विक भोजन
लंगर बाबा लंबर में लोगों को सात्विक भोजन देते हैं। हलवा और फल के अलावा दाल, चावल, सब्जी व रोटी भी लंबर में वितरित करते हैं। बच्चों के प्रति आहूजा का काफी लगाव है। उनकी पत्नी निर्मल बच्चों में गुब्बारे, टॉफी, बिस्किट और अन्य उपहार भी बांटती हैं। उन्होंने बताया कि मुझे मांसाहारी भोजन देखकर काफी घृणा होती है। 

8 of 10
जगदीश आहूजा - फोटो : फाइल फोटो
भगवान ने मुझे इस कार्य के लिए सक्षम बनाया
आहूजा ने बताया कि बहुत से लोगों ने मुझे पैसे और अन्य चीजों की पेशकश की लेकिन मैं किसी से कुछ नहीं लेता। मैं इसे अपने संसाधनों से सेवा कार्य करना चाहता हूं। मुझे लगता है कि भगवान ने मुझे इस काम को करने के लिए सक्षम बनाया है और इतनी हिम्मत दी है कि इसे लगातार चला सकूं।

9 of 10
- फोटो : फाइल फोटो
कैंसर भी नहीं डिगा सका इस मार्ग से
जगदीश आहूजा अब तक अपनी सात से ज्यादा प्रॉपर्टी बेच चुके हैं। उन्हें कैंसर है। लंगर के अलावा वह वृद्धाश्रम में भी लगातार सहयोग करते हैं। उम्र का तकाजा हो या बीमारी, उन्हें सेवा कार्य के मार्ग से कोई डिगा नहीं सका है। कोई उनके पैर छूने का प्रयास करता है तो स्पष्ट मना कर देते हैं। 
विज्ञापन

10 of 10
जगदीश आहूजा - फोटो : फाइल फोटो
वर्तमान में देते हैं ढाई लाख रुपए प्रॉपर्टी टैक्स
जगदीश आहूजा ने बताया कि पहले वह दस लाख रुपये का इनकम टैक्स देते थे। सेवाभाव के आगे कभी रुपयों को तवज्जो नहीं दी। धीरे-धीरे कई प्रॉपर्टी बिक गईं, लेकिन लंगर हमेशा की तरह चलता रहा। वर्तमान में आहूजा ढाई लाख रुपये का इनकम टैक्स भरते हैं। उनका मानना है कि यह इनकम टैक्स माफ हो जाएगा, तो इससे लंगर का खर्चा आसानी से निकल जाएगा।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें