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भारत में दो ऐसी दरगाह, जिसमें पाकिस्तानियों की अटूट आस्था, सरहद से टेकते हैं माथा

Thu, 13 Dec 2018 01:40 AM IST
अनिल कुमार, अमर उजाला, ममदोट (फिरोजपुर)
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भारत में स्थित दरगाह
भारत-पाक सीमा पर जीरो लाइन पर बनी पीर बाबा जल्लेशाह व पीर बाबा बुर्जी वाला की दरगाह पर दोनों देशों के लोगों की गहरी आस्था जुड़ी है। कुछेक सालों में दोनों देशों के बीच पैदा हुए तनाव के बाद इन दरगाहों पर पाकिस्तानी बाशिंदों को माथा टेकने के लिए आने की अनुमति नहीं है, फिर भी आस्था इस कदर है कि पाक बाशिंदें अपनी हद से सजदा करते हैं। बीएसएफ के जवान सुबह-शाम दरगाह पर दीप जलाकर पूजा-अर्चना करते हैं।
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भारत स्थित दरगाह
सरहद गांव सेठा वाला दोना रहमत पर बनी बीएसएफ की पोस्ट मस्ता गट्टी के पास फेंसिंग के गेट नंबर-205 पर है। दरगाह की पूजा-अर्चना बाहर से ही हो जाती है। गेट से दरगाह लगभग एक किलोमीटर दूर है। यहां पर सिर्फ धार्मिक आस्था को देखते हुए लोगों को आने-जाने की अनुमति दी जाती है। यहां तैनात बीएसएफ के एक जवान ने बताया कि पीर बाबा जल्लेशाह की दरगाह पर प्रतिदिन दीप जलाकर पूजा-अर्चना की जाती है। 
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भारत स्थित दरगाह
दरगाह के उस पार पाकिस्तानी गांव झल्लोके दुआ लगता है। पाकिस्तानी नागरिकों को दरगाह पर आने की अनुमति नहीं है। आस्था इतनी है कि वह अपनी हद पर ही खड़े होकर सजदा करते हैं। यहां अक्तूबर की बारह तारीख को मेला लगता है। मेले में भी पाकिस्तानियों को माथा टेकने के लिए दरगाह पर आने की अनुमति नहीं है। पाक नागरिक उस दिन भी अपनी सीमा पर खड़े होकर माथा टेकते हैं।

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अमृतसर में वाघा बॉर्डर
इसी गांव के ग्रामीण दर्शन सिंह व गुरमेज सिंह का कहना कि उन्हें आशा है कि जिस तरह करतारपुर साहब कॉरिडोर बनने पर सहमति हुई है, शायद इस दरगाह पर भी पाक नागरिकों को माथा टेकने की अनुमति मिल जाए। बहुत से ऐसे लोग दरगाह पर माथा टेकने आते हैं ताकि वह पाक में रह रहे अपने रिश्तेदारों को देख सके। 
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अटारी-वाघा बॉर्डर
ममदोट में कई ऐसे लोग रहते हैं, जिनके रिश्तेदार पाक में हैं। हर साल लगने वाले मेले के दौरान एक-दूसरे को दूर से देखते हैं। इसी तरह, फाजिल्का के सरहदी गांव गुलाबा भैणी के पास भारत-पाक जीरो लाइन पर पीर बाबा बुर्जी वाला की दरगाह है, यहां पर भी दोनों देशों के बाशिंदों की आस्था जुड़ी है। जब से दोनों देशों के बीच तनाव की स्थिति पैदा हुई है तब से लेकर अब तक पाकिस्तानी अपनी हद में खड़े होकर दरगाहों पर माथा टेकते हैं। 
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