देश में एक गांव ऐसा है, जहां एक भी मंदिर नहीं है। इसके अलावा बहुत सी खास बातें हैं जो इसे औरों से अलग और अनोखा बनाती हैं। रिपोर्टः धर्मवीर निडाना, जींद
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गजब! इस गांव में एक भी मंदिर नहीं है
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इस गांव का नाम है बहबलपुर। ये हरियाणा में जींद जिले से करीब 10 किलोमीटर की दूरी पर है। साढ़े तीन हजार की आबादी और करीब 1300 मतदाता वाले इस गांव में एक भी मंदिर नहीं है। गांव में पिछले 150 साल से सांग नहीं हुआ है और नियमित रूप से यज्ञ किया जाता है।
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हैरानी की बात ये है कि इस गांव में पिछले तीन दशकों से पंचायत चुनाव नहीं हुए हैं। गांव के लोग पिछले आठ पंचायत राज चुनावों में सर्वसम्मति से सरपंच चुनने का काम कर रहे हैं।
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इस गांव में सरपंच पद के लिए 1977 में अंतिम बार चुनाव हुआ था। इसके बाद से जो भी पंचायत बनी, वे सर्वसम्माति से बनी और इसके लिए कोई खासजोड़ तोड़ नहीं करना पड़ता। गांव के बुजुर्ग आपसी चर्चा करके एक नाम तय कर देते हैं। इसी परंपरा से बिना आरक्षण होते हुए भी महिलाओं को सरपंच बनने का मौका मिला है।
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वर्ष 1971 में हुए चुनाव में बलबीर सिंह ने चुनाव जीता। इसके बाद वे 1972 में ब्लॅक समिति के चुनाव हुए और वे चेयरमैन चुने गए। उन्होंने सरपंच और ब्लॉक समिति के चेयरमैन का काम एक साथ संभाला। इसके बाद 1977 में भी उन्होंने चुनाव लड़ा और विजयी रहे।
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इसके बाद से गांव में होने वाले सभी चुनाव सर्वसम्माति से हुए हैं। 1982 में सर्वसम्माति से करतार को सरपंच चुना गया। इसके बाद ओंकार सिंह, रामप्रसाद, अजीत सैनी, नथो देवी, रामनंद व सुनीता देवी सरपंच बने हैं।
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गांव के पूर्व सरपंच बलबीर सिंह के अनुसार सर्वसम्माति सरपंच चुनने से गांव को काफी लाभ होता है। इससे गांव में पार्टीबाजी नहीं रहती और भाईचारा कायम रहता है। इसी का परिणाम है कि गांव में सभी विकास कार्य हुए हैं। दसवीं तक का स्कूल है, पशु अस्पताल है, जलघर व गांव की फिरनी पक्की बनी हुई है।
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गांव के पूर्व सरपंच रामनंद के अनुसार गांव में होने वाले विवादों को गांव में नहीं निपटा लिया जाता है। रामनंद का दावा है कि गांव के लोगों का आपसी विवाद नहीं है। कोई बड़ा केस नहीं है। यहां तक कि पुलिस भी गांव के भाईचारे से खुश है।
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यह गांव सोनीपत जिले की सांझी संस्कृति है। गांव के पूर्व सरपंच और ब्लॉक समिति के चेयरपर्सन रहे 82 वर्षीय बलबीर सिंह के अनुसार यह गांव 1923-24 में बस। मुख्य रूप से गोहाना के पास कटवाल तथा जुआ गांवों से लोग यहां आए। शुरू में मुखला, धनीलाल व लक्ष्मण सैनी के परिवार गांव में आए थे। इसके बाद खानपुर, मलहाना, बयापुर, बुटाना, जौली, कुराना व टिटौली से लोग यहां आकर बसे हैं। अलग-अलग गांवों से आने के बावजूद लोगों में गजब का भाईचारा है।
गांव की मौजूदा सरपंच सुनीता बताती हैं कि सर्वसम्माति से सरपंच चुनने की परंपरा रही है। इसी परपंरा को आगे बढ़ाया जाना चाहिए। इस बार भी ग्रामीणों का प्रयास रहेगा कि सर्वसम्मति से ही सरपंच चुना जाए। इससे गांव को सरकार की ओर से आर्थिक मदद भी मिलेगी।