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इस कुएं में दफना दिए गए थे 282 भारतीय सैनिक, अंग्रेजों ने की थी बर्बरता, शोध में चौंकाने वाले खुलासे

Sun, 07 Feb 2021 03:00 PM IST
ajay kumar सुशील कुमार, अमर उजाला, चंडीगढ़
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कालियांवाला खूह (अजनाला) - फोटो : फाइल फोटो
देश में अब तक हुए जघन्य अपराधों में से 1857 की क्रांति में मारे गए भारतीय सैनिकों की घटना को वैज्ञानिकों ने पहले नंबर पर माना है। वैज्ञानिक तरीके से उन्होंने यह साबित किया है कि इस घटना के जरिए मानवाधिकार को तार-तार किया गया। 282 सैनिकों की हत्या कर उनके शव एक कुएं में डाल दिए गए जबकि मानवाधिकारों के तहत इन सैनिकों के शवों का बाकायदा अंतिम संस्कार किया जाना चाहिए था। 

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कालियांवाला खूह (अजनाला)
इतना ही नहीं, मारे गए सभी लोग सैनिक थे और सेना के नियम के तहत सजा देने से पहले इन सभी के खिलाफ कोर्ट मार्शल की कार्रवाई होनी चाहिए थी लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। सभी को सीधे गोली मार दी गई। अब वैज्ञानिकों ने 1857 की क्रांति में मारे गए इन सैनिकों के अवशेष उनके परिवारों तक पहुंचाने का जिम्मा उठाया है। फिलहाल यह रिसर्च जर्नल फॉरेंसिक साइंस रिव्यू की ओर से स्वीकार कर लिया गया है।
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खुदाई के वक्त की तस्वीर (फाइल फोटो। - फोटो : फाइल फोटो
पंजाब विश्वविद्यालय के एंथ्रोपोलॉजी विभाग के डॉ. जेएस सहरावत और दीक्षा सांख्यान ने 1857 की क्रांति में मारे गए 282 सैनिकों के प्रकरण का तुलनात्मक अध्ययन किया। उन्होंने दुनिया के दस जघन्य अपराधों को सामने रखा। यह अपराध सर्बिया, रवांडा, साइप्रस, पेरू, स्पेन, इराक, ग्वाटेमाला आदि देशों के थे। इन देशों में क्रांति व दंगों के जरिए लोगों को मारा भी गया और मरवाया भी गया लेकिन मारे गए लोगों की बाकायदा कब्रें खोदी गईं और उन्हें दफनाया गया।

 

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बरामद कंकाल। - फोटो : फाइल फोटो
इन देशों की संस्थाओं व कुछ सरकारों ने इन कब्रों को फिर से खोदा और पूरे कंकाल बरामद किए। एंथ्रोपोलॉजिस्ट के जरिए यह पूरा कार्य करवाया गया, जिन पर शोध चल रहे हैं। टीम ने अध्ययन के बाद पाया कि दुनिया भर में जगह-जगह भले ही लोगों को मारा गया हो लेकिन उनका अंतिम संस्कार किया गया लेकिन 1857 की क्रांति में सैनिकों को मारकर अमृतसर के अजनाला स्थित एक कुएं में डाल दिया गया। इन सैनिकों को कूड़े की तरह समझा गया। इनका अंतिम संस्कार तक नहीं किया गया, जो मानवाधिकार की श्रेणी में आता है। यही नहीं देश में इतनी बड़ी संख्या में एक जगह से कंकालों का मिलना भी अपने आप में पहली घटना है। 
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खुदाई में मिला सामान। - फोटो : फाइल फोटो
ये थी पूरी घटना
1857 की क्रांति में अंग्रेजों ने 282 सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया था। मारने से पहले सभी को गोला बनाकर खड़ा किया गया और सिर में गोली मारी गई। इनके नायक आलम बेग का सिर तो तोप से उड़ाया गया और उस सिर को रानी विक्टोरिया को भेंट किया गया। मारे गए सभी सैनिकों के शवों को अमृतसर के अजनाला स्थित एक कुएं में डाल दिया गया। ब्रिटिश कमिश्नर हेनरी कूपर की किताब जब यहां के लोगों को हाथ लगी तो अजनाला का कुआं वर्ष 2014 में खुदवाया गया, जिसमें से इन सैनिकों के कंकाल बरामद हुए।
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- फोटो : फाइल फोटो
अब तक के शोध में क्या पता चला
अब तक के शोध में यह साबित हुआ है कि मारे गए सैनिकों की उम्र 20 से 50 साल के बीच थी और सभी सैनिक स्वस्थ थे। बरामद कंकाल में सैनिकों के दांत फाइबर युक्त मिले हैं। साथ ही यह भी पता चला है कि यह सैनिक देश के विभिन्न इलाकों के रहने वाले थे। यही नहीं मारे गए सैनिक किस जाति से थे, यह भी वैज्ञानिकों ने 2700 दांतों की जांच करके पता लगा लिया है लेकिन यह रिसर्च जर्नल में प्रकाशित होने के लिए गया है। जैसे ही शोध पत्र में यह प्रकाशन होगा तो यह सब बातें सामने आ जाएंगी।
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महिला का मिला कंकाल। - फोटो : फाइल फोटो
ईराक में 1987 से लेकर 1989 तक एक लाख शिया मुस्लिम और 50 हजार कुर्द वर्ग के लोग सामूहिक फांसी के जरिए मारे गए। इनको मारने के लिए केमिकल व बायोलॉजिकल हथियारों का भी सहारा लिया गया था। उसके बाद इन्हें कब्रों में दफनाया गया। बाद में इनफोरेस संस्था की पहल पर यह कब्रें खोदी गईं तो कंकालों के हाथ-पैर बंधे पाए गए थे। मारे गए लोगों की उम्र 15 से 70 साल के बीच थी। 

इन घटनाओं से किया गया तुलनात्मक अध्ययन

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डॉ. जेएस सहरावत। - फोटो : फाइल फोटो
ग्वाटेमाला में 1962 से 1996 तक दो लाख लोगों को मारा गया। यह सभी एक ही नस्ल के थे। इन लोगों को भी कब्रों में दफनाया गया। बाद में कब्रों से कंकालों को जांच के लिए एंथ्रोपोलॉजिस्ट आदि से निकलवाया गया।
 
कंबोडिया में 1975 से 1979 तक डेढ़ लाख से अधिक लोगों को मारा गया। इसमें बौद्ध साधु, मुस्लिम और वियतनामी शामिल थे, जो प्रायोजित तरीके से मारे गए थे। इन लोगों को भी कब्रों में दफनाया गया था। बाद में 300 कब्रें और 19 हजार गड्ढों से इन लोगों के कंकालों को निकाला गया, जिसमें 15 साल तक के बच्चे भी शामिल थे।
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डॉ. जेएस सहरावत। - फोटो : फाइल फोटो
इसी तरह सर्बिया के बोस्निया हर्जियाग्नेविना, रवांडा, साइप्रस, पेरू, स्पेन, रोमानिया और श्रीलंका में मारे गए लोगों की घटनाओं का भी अध्ययन किया गया।
 
दुनिया भर में मारे गए लोगों की घटनाओं से 1957 की क्रांति में मारे गए लोगों के प्रकरण का तुलनात्मक अध्ययन किया गया। वैज्ञानिक तरीके से सिद्ध हुआ है कि देश का अब तक का यह सबसे बड़ा जघन्य अपराध था, जिसे अंग्रेजों ने अंजाम दिया। इस घटना में मानवाधिकारों को तार-तार किया गया था। क्रूरता की हदें पार की थीं।   - डॉ. जेएस सहरावत, एंथ्रोपोलॉजी विभाग, पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़
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