इन तस्वीरों में जो लड़कियां दिख रही हैं, वे कहने को तो नेशनल प्लेयर्स हैं, लेकिन उन्हें घास काटकर गुजारा करना पड़ रहा है। तस्वीरों में पूरा मामला।
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कहने को नेशनल प्लेयर्स... पर काटनी पड़ रही घास
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ये प्लेयर्स कैथल के मानस गांव की हैं। ये फुटबाल की नेशनल प्लेयर्स हैं। इनके परिवारों की आर्थिक स्थिति बेहद खराब है। सरकार या अन्य किसी संस्था से उन्हें कोई मदद नहीं मिल रही है। इसी कारण वे दिहाड़ी करने पर मजबूर हैं।
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कहने को नेशनल प्लेयर्स... पर काटनी पड़ रही घास
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पूनम ने 2014 में रांची में आयोजित पायका नेशनल में गोल्ड और स्टेट प्रतियोगिता में सिल्वर आदि प्राप्त किया है और साथ ही साथ मुंबई व अम्बाला में आयोजित स्कूल नेशनल स्पर्धा में दूसरा स्थान प्राप्त किया है। पूनम के माता-पिता भट्ठे पर काम करते हैं।
कहने को नेशनल प्लेयर्स... पर काटनी पड़ रही घास
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सुदेश को प्रदेश सरकार सहयोग नहीं देती। सूखी रोटी खाकर प्रैक्टिस करती हूं। पिता कर्मबीर भट्ठे कहते हैं, जब सुदेश बाहर खेलने जाती है तो ब्याज पर पैसे मांगकर देने पड़ते हैं।
रीतू और शीतल दोनों सगी बहनें हैं। एक 9वीं की तो दूसरी 7वीं की छात्रा है। पिता राजपत टायर पंक्चर की दुकान चलाते हैं। गेहूं के सीजन में दोनों बेटियों, अपनी पत्नी शांति देवी भाई के साथ गेहूं काटता है।