डोप टेस्ट और इससे जुड़ी हर तरह की जानकारी हर खिलाड़ी को पता होनी चाहिए। बल्कि देश के हर शख्स को इसके बारे में जानना चाहिए, 8 क्लिक करके यहां पढ़ें।
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dope test
नेशनल एंटी डोपिंग एजेंसी (नाडा) ने चंडीगढ़ में सेक्टर-42 स्पोर्ट्स कांप्लेक्स में यूटी खेल विभाग के सहयोग से एक सेमिनार करवाया। इसमें डोप से जुड़ी तमाम जानकारियां दी गई। नाडा की टीम ने खिलाड़ियों को डोप टेस्ट का तरीका बताया और कुछ खिलाड़ियों के टेस्ट भी किए गए। सेमिनार में 190 खिलाड़ी, 35 कोच और अधिकारी शामिल हुए। इसमें दिल्ली से नाडा के दो अधिकारी और चंडीगढ़ पीजीआई के दो डॉक्टर भी मौजूद रहे। वहीं, यूटी खेल विभाग के ज्वाइंटडॉयरेक्टर स्पोर्ट्स डॉ. महेंद्र सिंह और डिस्ट्रिक्ट स्पोर्ट्स अधिकारी रविंदर सिंह लाड़ी के अलावा स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (साई) की नार्थ रीजन की डॉयरेक्टर ललिता भी मौजूद रहीं।
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भर्ती प्रक्रिया
- फोटो : अमर उजाला
क्या है डोप
ताकत बढ़ाने वाला वह पदार्थ जिसे खाने से किसी भी खिलाड़ी का स्टेमिना एकदम से बढ़ जाए। इस शॉर्टकट के जरिए वह खेल के मैदान में अपने विरोधी खिलाड़ियों को पीछे छोड़ सकता है।
कैसे होती है डोपिंग
कोई भी खिलाड़ी लिक्विड फॉर्म में इंजेक्शन के जरिए या प्रतिबंधित पाउडर खाकर या उसे पानी में घोलकर ले सकता है। इसे खाने-पीने की चीज में मिला कर भी लिया जा सकता है।
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पुलिस भर्ती
क्या होता है डोप टेस्ट
ताकत बढ़ाने वाली दवाओं के इस्तेमाल को पकड़ने के लिए डोप टेस्ट किया जाता है। किसी भी खिलाड़ी का किसी भी वक्त डोप टेस्ट लिया जा सकता है। किसी इवेंट से पहले या ट्रेनिंग कैंप के दौरान डोप टेस्ट में खिलाड़ियों का यूरिन लिया जाता है। यह टेस्ट नाडा (नेशनल एंटी डोपिंग एजेंसी) या फिर वाडा (वर्ल्ड एंटी डोपिंग एजेंसी) की तरफ से कराए जाते हैं। इसमें खिलाड़ियों के यूरिन को वाडा या नाडा की खास लैब में टेस्ट किया जाता है। नाडा की लैब दिल्ली और वाडा की लैब दुनिया में कई जगहों पर हैं। इंटरनेशनल गेम्स में ड्रग्स के बढ़ते चलन को रोकने के लिए वाडा की स्थापना 10 नवंबर, 1999 को स्विट्जरलैंड में की गई थी। इसी के बाद हर देश में नाडा की स्थापना की जाने लगी।
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police recruitment
कब बने नियम
इंटरनेशनल एथलेटिक्स फेडरेशन ऐसी पहली संस्था थी, जिसने 1928 में डोपिंग पर नियम बनाए। 1966 में इंटरनेशनल ओलंपिक काउंसिल ने डोपिंग को लेकर मेडिकल काउंसिल बनाई। इसका काम डोप टेस्ट करना था। 1968 के ओलंपिक खेलों में डोप टेस्ट पहली बार हुए। इंटरनेशनल ओलंपिक एसोसिएशन के नियमों के अनुसार डोपिंग के लिए सिर्फ खिलाड़ी ही जिम्मेदार होता है।
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indian army recruitment
- फोटो : amarujala
सजा का प्रावधान
पकड़े जाने पर इसके दोषियों को 2 साल या 4 साल सजा से लेकर आजीवन पाबंदी तक सजा का प्रावधान है। ‘ए’ टेस्ट में पॉजिटिव आने पर खिलाड़ी को बैन किया जा सकता है। खिलाड़ी चाहे तो ‘बी’ टेस्ट के लिए एंटी डोपिंग पैनल में अपील कर सकता है। इसके बाद फिर नमूने की जांच होती है। यदि ‘बी’ टेस्ट भी पॉजिटिव आए तो खिलाड़ी पर पाबंदी लग सकती है।
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Army recruitment
- फोटो : अमर उजाला
डोपिंग में 5 तरह की दवाएं आती हैं-
ब्लड डोपिंग: इसमें खिलाड़ी कम उम्र के लोगों का ब्लड खुद को चढ़ाते हैं। इसे ब्लड डोपिंग कहा जाता है। कम उम्र के लोगों के ब्लड में रेड ब्लड सेल्स ज्यादा होते हैं, जो खूब ऑक्सीजन खींच कर जबरदस्त ताकत देते हैं।
स्टेरॉयड: यह हमारे शरीर में पहले से ही मौजूद होता है, जैसे टेस्टेस्टेरॉन। जब एथलीट स्टेरॉयड के इंजेक्शन लेते हैं तो यह शरीर में मासपेशियां बढ़ा देता है, इसलिए पुरुष खिलाड़ी इसका इस्तेमाल करते हैं।
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पेप्टाइड हॉरमोन: स्टेरॉयड की ही तरह हॉरमोन भी शरीर में मौजूद होते हैं। इंसुलिन नाम का हॉरमोन डायबिटीज के मरीजों के लिए जीवन रक्षक हॉरमोन है, लेकिन हेल्दी इंसान को अगर इंसुलिन दिया जाए तो इससे शरीर से फैट घटने लगती है और मसल्स बनती हैं।
नार्कोटिक्स: नार्कोटिक या मॉरफीन जैसी दर्दनाशक दवाइयां डोपिंग में सबसे ज्यादा इस्तेमाल की जाती हैं। कंपीटीशन के दौरान दर्द का अहसास होने पर अक्सर खिलाड़ी इन दवाइयों के इस्तेमाल करने की कोशिश करते हैं।
डाइयूरेटिक्स: डाइयूरेटिक्स को लेने से शरीर पानी बाहर निकाल देता है। इसे कुश्ती या बॉक्सिंग जैसे मुकाबलों में अपना वजन घटा कर कम वजन वाले वर्ग में एंट्री लेने के लिए इस्तेमाल किया जाता है।
खिलाड़ी शार्टकट नहीं मेहनत कर आगे बढ़ें। खेल के दौरान किसी तरह की दवा का इस्तेमाल न करें। डोपिंग से बचें। इसे किसी भी तरह से बेहतर नहीं कहा जा सकता है। -डॉ. बिकास मैदी, पीजीआई चंडीगढ़