हौसले से बड़ा कोई दोस्त या गुरु नहीं। कुछ कर गुजरने का हौंसला हो तो विकलांगता भी मंजिल की राह में आड़े नहीं आती। ऐसा ही गजब का हौंसला रखते हैं एशिया के नंबर 2 और भारत के नंबर 1 साइकिलस्ट अभिषेक।
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जज्बे को सलामः विकलांगता को मात दी और छू लिया आसमां
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अभिषेक चंडीगढ़ के रहने वाले हैं और 8 साल से साइक्लिंग कर रहे हैं। उनका कोई भी कोच नही है, बल्कि उन्होंने इंटरनेट से साइकिलिंग की जानकारी जुटाई और फोलो करते हुए साइकिलिंग की प्रैक्टिस शुरू की।
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जज्बे को सलामः विकलांगता को मात दी और छू लिया आसमां
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24 वर्षीय अभिषेक कंप्यूटर साइंस के छात्र हैं। बचपन से ही उनके दाहिने पैर में प्रॉब्लम है। वे इस पैर पर भार नहीं डाल सकते और बिना स्टिक के नहीं चल सकते। एक दिन साइकिल चलानी शुरू की और उसने उनके पैर की कमी को पूरा कर दिया। अभिषेक को यह इतना भाया कि उसने लगातार अभ्यास शुरू कर दिया।
जज्बे को सलामः विकलांगता को मात दी और छू लिया आसमां
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एक कदम आगे बढ़ते हुए उन्होंने स्टेट लेवल साइक्लिंग चैंपियनशिप में हिस्सा लेना शुरू कर दिया। पहले कुछ मुश्किलें आईं लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। इसी हौसले ने उन्हें बना दिया एशिया का नंबर-2 साइक्लिस्ट।
जज्बे को सलामः विकलांगता को मात दी और छू लिया आसमां
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अभिषेक बताते हैं कि अंतरराष्ट्रीय स्तर में हिस्सा लेने के लिए प्रोफेशनल साइकिल की जरूरत होती है। इसकी कीमत करीब सात लाख रुपये है। वे इसे खरीदने में असमर्थ हैं। उनके पास देश में बनी 7500 रुपये की साइकिल है और वे उसी से अभ्यास करते हैं। एशियन चैंपियनशिप में उन्होंनेअपने दोस्त की प्रोफेशनल साइकिल लेकर हिस्सा लिया था। अभिषेक के पिता पुलिस में थे। उनके देहांत के बाद मां को उनकी जगह नौकरी मिली और उन्हीं की कमाई से घर चलता है।