तस्वीरों में, उन पिता की शहादत को सलाम जिनकी शहादत ने अपने बेटों को सैनिक बना दिया।
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तस्वीरें: पिता की शहादत ने बना दिया सैनिक
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सेना में भर्ती होने वाले युवकों में से 60 ऐसे हैं जिन्होंने अपने पिता को सिर्फ तस्वीरों में देखा है। जब उनके पिता शहीए हुए वे गर्भ में थे।
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आतंकवाद के समय शहीद हुए जवानों के बच्चों को बीस साल बाद नौकरी मिली तो उनकी आंखें नम थीं। इनमें से कई जवान तो ऐसे थे जो दो वक्त की रोटी के जुगाड़ के लिए धक्के खा रहे थे।
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अचानक फोर्स में भर्ती होने का मौका मिला तो जिंदगी बदल गई। जवानों के मुंह से एक ही बात निकली कि खाकी की लाज रखनी है। साडे पिता ने कुर्बानी दित्ती सी, अज नौकरी मिली है ता उन्हां दी शहादत सदका।
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जालंधर देहाती के एसएसपी नरिंदर भार्गव ने तो एक ऐसे युवक को खोज लिया जो गुजारे के लिए ऑटो चलाता था। उसके पिता 1991 में आतंकवादियों की गोलियों का शिकार हो गए थे।
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प्रवीण कौर तरनतारन की रहने वाली हैं। इनकी नानी अमरजीत कौर ने अपनी दोहती प्रवीण कौर को वर्दी पहनाने की इच्छा जाहिर की और आला अधिकारियों ने उसको कबूल कर लिया।
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झब्बाल के रहने वाले देसा सिंह के पिता को आतंकवादियों ने गोलियों से छलनी कर दिया था। देसा सिंह ने पिता की पेंशन पर ही दसवीं पास की और अब अचानक वर्दी पहनी तो आंखों से आंसुओं की धारा बह उठी।
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पलविंदर कौर के पिता बलदेव सिंह को 15 मार्च 1989 को आतंकवादियों ने शहीद कर दिया था। वह होमगार्ड के जवान थे। पिता की शहादत का 25 साल बाद मूल्य उनको मिला।
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जगदेव सिंह पट्टी तीन साल के थे जब उनके पिता मेजर सिंह शहीद हो गए थे। जगदेव सिंह के आगे रोजी रोटी का मसला था। अचानक उनको पंजाब पुलिस में नौकरी मिल जाएगी यह सोचा भी नहीं था।
डीजीपी सैनी बताते हैं कि आतंकवाद के दौर में जो बच्चे छोटे थे, अब वह जवान हो चुके हैं ऐसे में उनको फोर्स में स्थान दिलाना शहीदों को एक सलाम है और उनका फर्ज भी है।