लोकसभा चुनाव के छठे चरण में हरियाणा की 10 सीटों पर 12 मई को मतदान होगा। इसके लिए तमाम राजनीतिक दलों ने खूब पसीना बहाया है। मनोहर लाल, भूपेंद्र हुड्डा, चौटाला परिवार की साख प्रमुख रूप से दांव पर लगी है। ऐसे में अपने प्रत्याशी के जानिए, परखिए और फिर वोट कीजिए।
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रतन लाल कटारिया
अंबाला: भाजपा -कांग्रेस में सीधा मुकाबला
रतन लाल कटारिया (भाजपा) मोदी मैजिक को भुना रहे हैं। दो बार के सांसद हैं। नाराज मंत्री अनिल विज भी समर्थन में जुट गए हैं, कार्यकर्ता भी मोदी के नाम पर मैदान में हैं। मतदाताओं से दूरी की वजह से कई जगह इनका विरोध हो रहा है। पिछले वादों पर भी जनता हिसाब मांग रही है।
कुमारी सैलजा (कांग्रेस) दो बार की सांसद हैं। हाईकमान में अच्छी पकड़ रखती हैं। पुराने कामों के बूते वोट मांग रहीं हैं। सभी को एकजुट कर साथ लेकर चल रहीं हैं। मोदी फैक्टर की वजह से दिक्कत आ रही। क्षेत्र का वाल्मीकि वोटर नाराज है। बीता लोकसभा चुनाव न लड़ने की भी मार पड़ रही है।
रामपाल वाल्मीकि (इनेलो) वाल्मीकि समाज से प्रत्याशी हैं। वाल्मीकि वोटर दो लाख से ज्यादा हैं। अन्य अनुसूचित जाति में भी ठीक प्रभाव रखते हैं। लोकसभा चुनाव लड़ने का अनुभव नहीं है। यमुनानगर में डिप्टी मेयर थे, इस दौरान एक विवाद में फंसे थे।
ये भी हैं मैदान में-- पृथ्वी सिंह (आप-जजपा), नरेश सारन (बसपा-लोसुपा)
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संजय भाटिया
करनालः भाजपा-कांग्रेस में सीधी टक्कर
संजय भाटिया (भाजपा) मुख्यमंत्री के गृह जिला से प्रत्याशी हैं। सभी नौ विधानसभा में भाजपा के विधायक हैं। करनाल के साथ-साथ पानीपत में भी इनकी अच्छी पकड़ है। लोकसभा का पहला चुनाव लड़ रहे हैं, इसलिए अनुभव की कमी है। भाजपा से पिछले सांसद साथ नहीं हैं। मतदाताओं में पिछले सांसद के प्रति नाराजगी है।
कुलदीप शर्मा (कांग्रेस) पिता पंडित चिरंजीलाल शर्मा का पुराना गढ़ है। पिता चार बार सांसद रह चुके हैं। सीएम भूपेंद्र सिंह हुड्डा के करीबी हैं और विधायक भी हैं। विरोधी बाहरी प्रत्याशी के मुद्दे को तूल दे रहे हैं, क्योंकि मूल निवासी सोनीपत के गन्नौर से हैं और वहीं से विधायक है। गुटबाजी से भी नुकसान होने की आशंका है।
धर्मबीर पाढ़ा (इनेलो) पार्टी के पुराने और कर्मठ कार्यकर्ता हैं। अभय चौटाला के करीबी और जाट चेहरा हैं। इलाके के जाट वोटरों का प्रभावित होना इनके पक्ष में है। n लोकसभा चुनाव लड़ने का अनुभव नहीं है। पार्टी टूट चुकी है और इनेलो का वोटबैंक जजपा में शिफ्ट हो गया है।
ये भी हैं मैदान में-- कृष्ण अग्रवाल (आप-जजपा), पंकज चौधरी (लोसुपा-बसपा)
विस क्षेत्र : करनाल, पानीपत शहरी, पानीपत ग्रामीण, समालखा, इसराना, असंध, घरौंडा, इंद्री, नीलोखेड़ी।
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भूपेंद्र सिंह हुड्डा
सोनीपत: भाजपा व कांग्रेस में टक्कर
भूपेंद्र सिंह हुड्डा (भाजपा) दो बार के सीएम और चार बार सांसद रह चुके हैं। जनता में अच्छी पकड़ रखते हैं। नौ विधानसभा क्षेत्रों में पांच समर्थक विधायक होने का लाभ इन्हें मिल सकता है। जजपा व इनेलो प्रत्याशी के भी जाट होने से नुकसान की आशंका है। नई सीट से चुनाव लड़ रहे हैं।
रमेश कौशिक (भाजपा) मौजूदा सांसद एवं गैर जाट चेहरा हैं और मोदी के नाम पर वोट मांग रहे हैं। सोनीपत व जींद में भाजपा विधायक होने का फायदा मिलेगा। सांसद बनने के बाद लोगों के बीच कम सक्रियता रही है। इसको लेकर कई जगह विरोध हो रहा है। समस्याओं का समाधान न होने से भी जनता नाराज है।
दिग्विजय चौटाला (जजपा) ताऊ देवीलाल के नाम का सहारा लेकर चुनाव लड़ रहे हैं। जाट युवा चेहरा है और भावनात्मक तौर पर वोट मांग रहे हैं। जींद उपचुनाव में अच्छे प्रदर्शन से लाभ की उम्मीद है।
विस क्षेत्र : सोनीपत, गोहाना, जींद, राई, बरोदा, खारखौदा, गन्नौर, जुलाना, सफीदों।
ये भी हैं मैदान में---सुरेंद्र छिक्कारा (इनेलो) व राजबाला (बसपा-लोसुपा)
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राव इंद्रजीत सिंह
गुड़गांव: भाजपा व कांग्रेस में सीधी लड़ाई
राव इंद्रजीत सिंह (भाजपा) चार बार सांसद, चार बार विधायक एवं केंद्रीय मंत्री रह चुके हैं। अहीरवाल बेल्ट में पकड़ अच्छी रखते हैं। नौ में से छह विधायक भाजपा व एक निर्दलीय का समर्थन प्राप्त है। मेवात में अधिक पकड़ नहीं हैं। राजनीतिक कद ऊंचा होने के कारण जनता में कम सक्रियता रखते हैं।
कैप्टन अजय यादव (कांग्रेस) छह बार के विधायक व पूर्व मंत्री हैं और बड़े राजनीतिक घराने से ताल्लुक रखते हैं। मेवात में भी अच्छी पकड़ रखते हैं। पार्टी की अंर्तकलह का असर पड़ेगा। वहीं कैप्टन, हुड्डा के धुर विरोधी हैं। संगठन कमजोर होने से कांग्रेस घर-घर नहीं पहुंच पा रही है।
महमूद खान (जजपा-आप) मेवात से होने की वजह से अच्छे समर्थन की उम्मीद है। दिल्ली में आप सरकार व दुष्यंत की साफ छवि का लाभ इन्हें मिल सकता है। इनमें राजनीतिक अनुभव की कमी है। जनता में ज्यादा चर्चित चेहरा न होना भी एक कमी है।
विस क्षेत्र : बावल, रेवाड़ी, पटौदी, बादशाहपुर, गुरुग्राम, सोहाना, नूंह, फिरोजपुर झिरका, पुन्हाना।
ये भी हैं मैदान में---वीरेंद्र राणा (इनेलो) और रईस अहमद (बसपा-लोसुपा)
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नायब सैनी
कुरुक्षेत्र: त्रिकोणीय मुकाबला
नायब सैनी (भाजपा) लोकसभा के तहत नौ विधानसभा सीटों में से छह भाजपा विधायक हैं। खुद भी राज्यमंत्री हैं। सभी जीत सुनिश्चित करने में जुटे हैं। बागी सांसद राजकुमार सैनी के विवादित बयानों से जाट वोटर खासकर भाजपा से छिटका है।
निर्मल सिंह (कांग्रेस) इन्हें पूर्व सांसद नवीन जिंदल, कैलाशो सैनी और विधायक रणदीप सुरजेवाला का पूरा सहयोग मिल रहा है। जाट वोटर पर पकड़ अच्छी रखते हैं। विपक्ष निर्मल सिंह के पुराने मामलों को तूल देते हुए मतदाताओं के बीच जा रहा है। दूसरा, मोदी फैक्टर भारी पड़ सकता है। भितरघात की आशंका भी बनी हुई हैं।
अर्जुन चौटाला (इनेलो) दादा पूर्व प्रधानमंत्री ताऊ देवीलाल के पुराना गढ़ से प्रत्याशी हैं। इनेलो प्रदेशाध्यक्ष अशोक अरोड़ा और पिता अभय चौटाला का साथ मिला है। परिवार की फूट के बाद पार्टी टूट चुकी है। क्षेत्र में इनेलो के वोटबैंक का कुछ हिस्सा अलग हुई जजपा में शिफ्ट हो चुका है। पहली बार चुनाव लड़ रहे हैं।
ये भी हैं मैदान में-- शशि सैनी (बसपा-लोसुपा), जय भगवान शर्मा (जजपा-आप)
विधानसभा क्षेत्र--- रादौर, थानेसर, कैथल, पिहोवा, पूंडरी, लाडवा, कलायत, गुहला, शाहबाद।
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कृष्णपाल गुर्जर
फरीदाबाद: सीधी लड़ाई में सवर्ण बनेंगे निर्णायक
कृष्णपाल गुर्जर (भाजपा) वर्तमान सांसद, पूर्व विधायक व केंद्रीय मंत्री हैं। शहरी व देहात क्षेत्र में भाजपा मजबूत है। नौ विधानसभा में से छह में भाजपा विधायक हैं। भाजपा में अंतर्कलह से नुकसान हो सकता है। जनता में कम सक्रियता है इनकी। कांग्रेस उम्मीदवार के गुर्जर होने से वोटों के बंटवारे की आशंका अधिक है। जाटों में कम पकड़ है।
अवतार भड़ाना (कांग्रेस) तीन बार फरीदाबाद से व एक बार मेरठ से सांसद रह चुके हैं। गुर्जर बिरादरी में दबदबा रखते हैं। अंतिम दिनों चुनाव पक्ष में करने की कला में माहिर हैं। कांग्रेस में गुटबाजी महंगी पड़ सकती है। विधायक ललित नागर का टिकट कटने से नुकसान के आसार है। चौरासी पाल में इनका विरोध हो रहा है।
नवीन जयहिंद (जजपा-आप) आम आदमी पार्टी के प्रदेशाध्यक्ष हैं। सबसे ज्यादा पढ़े-लिखे प्रत्याशी हैं। जजपा-आप गठबंधन से जाट वोट मिलने की उम्मीद है। जजपा-आप नेताओं को पूरी तरह एक मंच पर लाने में विफल रहे हैं। बाहरी होने का का ठप्पा लगा है। गुर्जर समाज में ज्यादा पकड़ भी नहीं है।
विस क्षेत्र : हथीन, फरीदाबाद एनआईटी, पृथला, फरीदाबाद, पलवल, होडल, बड़खल, बल्लभगढ़, तिगांव।
ये भी हैं मैदान में--- महेंद्र चौहान (इनेलो) व मनधीर सिंह मान (लोसुपा-बसपा)
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दुष्यंत चौटाला
- फोटो : Amar Ujala
हिसार: त्रिकोणीय मुकाबला
दुष्यंत चौटाला (जजपा) ताऊ देवी लाल की चौथी पीढ़ी के लाल हैं। मौजूदा सांसद हैं और अच्छा राजनीतिक अनुभव रखते हैं। पिता अजय चौटाला का कैडर से हैं। पार्टी और परिवार में टूट से नुकसान हो सकता है। इनेलो-भाजपा से भी जाट उम्मीदवार होने पर जाट मतदाताओं का धुव्रीकरण नहीं हो पाएगा।
बृजेंद्र सिंह (भाजपा) पिता बीरेंद्र सिंह दिग्गज जाट नेता और केंद्रीय मंत्री हैं। मां प्रेमलता उचाना कलां से विधायक हैं। मोदी लहर का भी सहारा मिल सकता है। राजनीतिक तौर पर अनुभवी नहीं हैं। आईएएस की नौकरी छोड़कर सीधे चुनाव मैदान में कूदे हैं।
भव्य बिश्नोई (कांग्रेस) दादा व पूर्व मुख्यमंत्री भजनलाल और पिता कुलदीप बिश्नोई का बड़ा नाम हैं। बीते एक साल से लगातार जनता के बीच हैं। राजनीतिक तौर पर अनुभवी नहीं हैं। कांग्रेस का बिखराव नुकसान कर सकता है। पिता कुलदीप से जनता की नाराजगी महंगी पड़ सकती है।
विस क्षेत्र : हांसी, नलवा, बरवाला, हिसार, आदमपुर, नारनौंद, उकलाना, बवानीखेड़ा व उचाना कलां।
ये भी हैं मैदान में-- सुरेश कौथ (इनेलो), सुरेंद्र शर्मा (बसपा-लोसुपा)
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दीपेंद्र हुड्डा
रोहतक: भाजपा-कांग्रेस में सीधी टक्कर
दीपेंद्र हुड्डा (कांग्रेस) क्षेत्र दादा रणबीर हुड्डा और पिता भूपेंद्र सिंह हुड्डा का गढ़ है। खुद दीपेंद्र 15 साल से सांसद हैं और युवा चेहरा हैं। जजपा और इनेलो ने भी यहां से जाट प्रत्याशी उतारे हैं। जाट वोटर कांग्रेस के साथ-साथ जजपा और इनेलो प्रत्याशियों में बंटेगा।
अरविंद शर्मा (भाजपा) तीन बार सांसद रह चुके हैं। केंद्र व राज्य में पांच साल भाजपा सरकार के कामों को गिना रहे हैं। जाट-गैर जाट कार्ड के बाद मतदाताओं के धुव्रीकरण की संभावना बनी हुई है। कई बार दल बदल चुके हैं। विरोधी इसे मुद्दा बना रहे हैं। जाट वोटरों में ढीली पकड़ है।
प्रदीप देसवाल (जजपा-आप) छात्र राजनीति में अच्छी सक्रियता और युवा चेहरा हैं। दुष्यंत चौटाला के करीबी और जाट प्रत्याशी होने से जाट वोटरों पर प्रभाव रखते हैं। पहली बार लोकसभा चुनाव लड़ रहे हैं, तो अनुभव की कमी है। इनेलो विघटन के बाद बनी जजपा की टिकट पर प्रत्याशी हैं।
विस क्षेत्र: गढ़ी-सांपला-किलोई, महम, रोहतक, कलानौर, बहादुरगढ, कोसली, झज्जर, बेरी, बादली।
ये भी हैं मैदान में-- किश्न पांचाल (बसपा-लोसुपा), धर्मबीर फौजी (इनेलो)
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चरणजीत सिंह रोड़ी
सिरसा: त्रिकोणीय मुकाबला
चरणजीत सिंह रोड़ी (इनेलो) मौजूदा सांसद एवं एससी सिख उम्मीदवार हैं। सिख पंजाबी बहुल क्षेत्र होने के कारण इनेलो का मजबूत पार्टी कैडर है। इनेलो में टूट का नुकसान उठाना पड़ सकता है। पार्टी वोट बैंक का बंटाधार है। जजपा के एससी सिख उम्मीदवार उतारने से बंट रहे वोट।
सुनीता दुग्गल (भाजपा) बेदाग छवि व मोदी लहर का सहारा। भाजपा के साथ शिअद का समझौता होना। महिला होने का भी लाभ। क्षेत्र के डेरा प्रेमियों की भाजपा से नाराजगी। नौ विधानसभा क्षेत्रों में भाजपा का मात्र एक विधायक होने से भी नुकसान।
अशोक तंवर(कांग्रेस) पूर्व सांसद होने के साथ पांच साल से कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष। डेरे का वोट मिलने की आशा। मोदी लहर के बावजूद दूसरे नंबर पर रहे। कांग्रेस की गुटबाजी के चलते भितरघात का डर। संसदीय क्षेत्र में आने वाले विधानसभा क्षेत्रों में एक भी कांग्रेस विधायक नहीं।
विस क्षेत्र : डबवाली, नरवाना, रतिया, कालांवाली, रानियां, ऐलनाबाद, टोहाना, फतेहाबाद, सिरसा।
ये भी हैं मैदान में-- निर्मल सिंह मल्हाड़ी (जजपा-आप) व जनक अटवाल (बसपा-लोसुपा)
भिवानी: भाजपा व कांग्रेस में मुकाबला
धर्मबीर सिंह (भाजपा) मौजूदा सांसद और विधायक रहे। इलाके में मोदी फैक्टर को पूरी तरह भुनाया जा रहा। जाट वोटरों में अच्छी पकड़। कुछ समय पहले लोकसभा चुनाव न लड़ने की इच्छा जाहिर कर चुके थे। इसी बात को विरोधी कर रहे इनकी घेराबंदी।
श्रुति चौधरी (कांग्रेस) बंसीलाल के गढ़ से लड़ रही चुनाव। यहीं से सांसद रहीं। मां विधायक हैं और पूर्व मंत्री भी रह चुकी हंै। मां किरण चौधरी की अच्छी पकड़। पिछला चुनाव हारने के बाद लोगों के बीच सक्रियता कम। विरोधी मोदी के नाम पर घेराबंदी में जुटे।
स्वाति यादव (जजपा-आप) युवा चेहरा, अमेरिका से नौकरी छोड़कर राजनीति में उतरी। पिता विधायक रहे हैं, गैर जाट मतदाताओं का मिल रहा समर्थन। राजनीतिक अनुभव की कमी, पहला लोकसभा चुनाव। पार्टी टूट चुकी है, इनेलो का परंपरागत वोट नहीं मिलेगा।
ये भी हैं मैदान में-- बलवान यादव (इनेलो), रमेश राव पायलट (बसपा-लोसुपा)
विधानसभा--- भिवानी, दादरी, बाढड़ा, तोशाम, लोहारू, अटेली, महेंद्रगढ़, नारनौल और नांगल चौधरी।