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मजदूरों के पलायन का दर्द: जाने दो साहब! कोरोना ने तोड़ दिए सपने, परदेस में मरना नहीं चाहते

Sun, 29 Mar 2020 03:31 PM IST
ajay kumar दीपक शाही, अमर उजाला, जीरकपुर (पंजाब)
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पलायन करते मजदूर - फोटो : अमर उजाला
कोरोना के कहर से पूरा विश्व थम गया है। देश के शहरों व गांवों की सड़कें और गलियां सुनी पड़ी हैं। इसी बीच ट्राइसिटी की फैक्ट्रियों में काम करने वाले मजदूर और भूखे प्यासे दिहाड़ीदार सैकड़ों किलोमीटर चलने के लिए बेबस हैं। उनके पास घर में बैठकर कोरोना वायरस से जंग जीतने के लिए कोई विकल्प नहीं है। उनकी जेब में न तो पैसे हैं और न ही खाने के लिए घर में राशन। हां एक बात जरूर है कि कोरोना, संक्रमण और मौत के काउंटडाउन के बीच अपने भविष्य को लेकर वे फिक्रमंद जरूर हैं। पंजाब और हरियाणा के बार्डर से सैकड़ों मजदूर अपने गांव-शहरों की तरफ निकल गए हैं। किसी को 100 तो किसी को 2000 किलोमीटर चलना है, रोजी रोटी का संकट सिर पर है। नंगे पैर, भूखे प्यासे समूहों में ये लोग निकल पड़े हैं। इस आस में पूरे दिन-रात इसलिए चले जा रहे हैं कि किसी तरह वे अपने घर पहुंच जाएं। 
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- फोटो : अमर उजाला
भूख से मरना नहीं चाहते हैं
अमर उजाला की टीम द्वारा चंडीगढ़ से अंबाला के बीच हाईवे पर की पड़ताल में सामने आया कि ये लोग कोरोना वायरस के बारे में जानते हैं। इस संबंध में कुछ ने कहा कि हमें बस इतना पता है कि यह एक गंभीर जानलेवा बीमारी है। यह किसी को भी हो सकती है। अगर मरना ही है तो भूखे मरने के बजाय अपनी धरती पर अपने परिवार के बीच मरना अच्छा है। कम से कम हमारी लाश को कंधा देना वाला तो कोई होगा। मरते वक्त आखिरी बार अपने परिजनों का चेहरा तो देख पाएंगे। जिस तरह की यह बीमारी है कि इसे देखकर ऐसा नहीं लग रहा कि मई और जून के पहले कोई फैक्ट्री चलेगी। यहां रहकर भूख से नहीं मरना चाहते हैं। 
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- फोटो : अमर उजाला
रोकिए मत साहब.. अभी 2500 किमी पैदल जाना है  
साहब बहुत भूख लगी है.. दिहाड़ीदार हैं, छह दिनों से काम बंद होने के चलते जेब में अब एक फूटी कौड़ी भी नहीं बची। चंडीगढ़ से बिहार के बेतिया जिले के लिए पैदल निकले हैं। शायद चार पांच दिनों में अपने परिवार के पास घर पहुंच जाएं। अभी चंडीगढ़ से डेराबस्सी तक पहुंचे हैं इसके बाद 2500 किलोमीटर पैदल और चलना है। 

हिम्मत तो अभी से जवाब देने लगी है, पर क्या करें हमारे पास दूसरा कोई रास्ता भी तो नहीं है। आधे लोग निकल गए और बचे 10-15 लोगों के समूह में निकले हैं ताकि कोई मुसबीत आए तो कम से कम साथ देने वाला तो कोई हो। ये कहना था कि बिहार के बेतिया निवासी मुलायम यादव, झोटिल कुमार, लालजीत साहनी और उसके साथ घर के लिए निकले उनके दोस्तों का। 

दो बच्चों को गोद में लिए डेराबस्सी से पटियाला को पैदल निकला दंपती
हाथों में झोला लिए डेराबस्सी के अपने क्वार्टर से बच्चों को गोद में उठाकर दंपती निकल पड़ा है। उन्हें मुबारिकपुर से पटियाला तक अपने गांव पैदल जाना है। नेशनल हाइवे पर 64 किलोमीटर का सफर है। साथ में दो छोटे बच्चे हैं। देर रात तक घर पहुंच जाएंगे। ये कहना है, डेराबस्सी के मुबारिकपुर के केमिकल कंपनी में काम करने वाले गुरप्रीत सिंह का। 

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- फोटो : अमर उजाला
उन्होंने बताया कि फैक्ट्री बंद है। घर में जो राशन पड़ा था, वो खत्म हो गया है। अब क्या करें। मजबूरी में पैदल घर जाना पड़ रहा है। इसलिए अपनी पत्नी ललीता और दो बच्चे गुरदायल सिंह और बेटी गुरलीन व छोटे भाई हरविंदर सिंह के साथ अपने गांव पैदल जा रहा हूं। कोरोना वायरस के चलते 14 अप्रैल तक सब कुछ बंद है। ऐसे में अपने घर पर रहेंगे तो कम से कम दो वक्त की रोटी तो मिलेगी। यहां दो-चार दिन और रुक जाते तो खाने के लाले पड़ जाते। खुद तो भूखे एक दो दिन रह भी लेते पर दो छोटे बच्चे हैं, उन्हें कौन खिलाता।  

कंपनी में राशन खत्म, 659 किलोमीटर पैदल चलकर यूपी के सीतापुर के लिए निकले
कंपनी में राशन और जेब के पैसे खत्म होने के बाद यूपी के सीतापुर निवासी संत राम, सर्वेश, प्रदीप व संदीप पैदल ही अपने घर के लिए निकले पड़े हैं। डेराबस्सी और अंबाला के बीच मिले संत राम और उसके दोस्तों ने बताया कि वे आइसक्रीम कंपनी में काम करते हैं। एक माह पहले यहां काम के लिए आए थे, महज 10 दिनों ही काम कर पाए कि काम बंद हो गया। जेब में पैसे तो हैं नहीं, जो राशन खरीदकर लाए थे वो भी खत्म हो गया है। अब यहां से जाने के अलावा दूसरा कोई विकल्प नहीं है। कंपनी के मालिक भी यहां नहीं हैं कि उनसे पैसे मांग लें। इसलिए मजबूरी में घर जाना पड़ रहा है। 
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- फोटो : अमर उजाला
अभी लुधियाना से अंबाला भी नहीं पहुंचे, साइकिल से कैसे पहुंचेंगे गोरखपुर  
सुनील और रेनु का साइकिल बीच रास्ते में पंक्चर हो गया है। उन्हें साइकिल से उत्तर प्रदेश के सीएम आदित्यनाथ योगी के शहर गोरखपुर तक जाना है। उनके साथ तेजनाथ निषाद, बीरू निषाद, विकास सिंह सहित अन्य दोस्त भी थे। इनका कहना है कि लुधियाना में दिहाड़ी का काम करते हैं। राशन खत्म हो गया है। कुछ पैसे बचे थे सोचा रास्ते में काम आ जाएंगे। क्योंकि काम सारा बंद पड़ा है, कब तक काम मिलेगा इसका कुछ पता नहीं है। एक-दो दिन और लुधियाना में रह जाते तो भूखे मरने की नौबत आ जाती। इसलिए घर के लिए निकल लिए। कम से कम दो-तीन दिनों में साइकिल से अपने गांव पीपीगंत तो पहुंच ही जाएंगे।  

चंडीगढ़ से पैदल राजस्थान तक का सफर  
पता नहीं काम कब तक मिलेगा। चंडीगढ़ में रहे तो कोरोना वायरस से पहले हम लोग भूख से मर जाएंगे। पुलिस घर से बाहर निकलने नहीं देती है। घर में राशन नहीं है और पैसे भी खत्म होने वाले हैं। इसलिए सोचा पैदल ही राजस्थान और अहमदाबाद अपने गांव की ओर चला जाए। ये कहना है दिनेश, नीरज और उनके दोस्तों का।  
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