भारतीय सेना को एक ऐसा 'शिकारी' मिलने जा रहा है, जो दूर छिपकर बैठे शिकार को मारकर ही दम लेगा। इसमें इतनी ताकत है कि दुश्मन मिट्टी में मिल जाएगा, जानिए खासियतें।
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सांकेतिक तस्वीर
भारतीय सेनाओं को अपने रणनीतिक क्षेत्रों में आगे बढ़ने के लिए अब अमेरिका द्वारा नियंत्रित जीपीएस का सहारा नहीं लेना पड़ेगा। बल्कि भारत में ही ‘देसी जीपीएस’ तैयार किए जा रहे हैं, जिनकी मदद से और सटीक समय पर व सही दिशा के साथ सेना के जवान अपने टारगेट का निशाना बन सकेंगे। इस देसी जीपीएस को हम इंडियन रीजनल नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम (आईआरएनएसएस) के नाम से जान सकते हैं। इंडियन स्पेस रिसर्च आर्गेनाइजेशन (इसरो) इस नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम पर काम कर रहा है।
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जबकि इस सिस्टम को तैयार करने के लिए सीएसआईआर के टाइम एंड फ्रीक्वेंसी मेट्रोलॉजी के अंतर्गत काम करने वाला एसीएसआईआर संस्थान परमाणु घड़ियों के जरिए सटीक समय उपलब्ध करवा रहा है। ये सिस्टम परमाणु घड़ियों की मदद से बिल्कुल सही समय उपलब्ध होने के बाद बेहद कम अनिश्चितता के साथ काम करेगा। इस नेविगेशन सिस्टम में सबसे अहम कड़ी समय की बिल्कुल सटीक निश्चितता रहेगी, ताकि अधिकृत यूजर्स को स्टैंडर्ड पोजिशनिंग सर्विस (एसपीएस) उपलब्ध हो सके।
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संस्थान की सीनियर साइंटिस्ट डॉ. पूनम अरोड़ा ने बताया कि इसरो के इस प्रोजेक्ट के लिए उनका संस्थान परमाणु घड़ियों के माध्यम से समय उपलब्ध करवा रहा है। ये काम उनके संस्थान के डायरेक्टर डॉ. डीके असवाल की निगरानी में ही किया जा रहा है। डॉ. पूनम ने बताया कि इस सिस्टम से भारत की तीनों सेनाओं को अपने विभिन्न अभियानों के लिए और युद्ध के समय आगे बढ़ने के लिए सटीक समय व दिशा उपलब्ध होगी। दूसरा, मिसाइल लॉन्च करने व अन्य अंतरिक्ष अभियानों के लिए भी सटीक समय और नेविगेशन मिलेगा।
इसके अलावा आईआरएनएसएस स्थलीय, हवाई और समुद्री नेविगेशन, आपदा प्रबंधन, वाहन ट्रैकिंग और बेड़े प्रबंधन, मोबाइल फोन के साथ एकीकरण, सटीक समय, मैपिंग और डाटा कैप्चरिंग, यात्रियों के लिए स्थलीय नेविगेशन में सहायता व ड्राइवरों के लिए दृश्य और आवाज की नेविगेशन करने में भी मदद मिलेगी।