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इंदिरा गांधी ने जान गंवाकर चुकाई थी 'ऑपरेशन ब्लू स्टार' की कीमत, 6 अहम किरदारों में से एक थीं

Thu, 06 Jun 2019 03:08 PM IST
खुशबू गोयल न्यूज डेस्क/अमर उजाला, चंडीगढ़
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इंदिरा गांधी
पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अपनी जान देकर ऑपरेशन ब्लू स्टार की कीमत चुकाई थी। 6 जून 1984 को हुए इस कांड में उनकी भूमिका अहम रही और वे इसके छह किरदारों में से एक थीं, जानिए कैसे?
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operation blue star
ऑपरेशन ब्लू स्टार के दौरान इंदिरा गांधी देश की प्रधानमंत्री थीं। जनवरी 1980 में पार्टी को मिली जीत के बाद इंदिरा गांधी बतौर पीएम अपनी तीसरी पारी खेल रही थीं। उस वक्त पंजाब में भी कांग्रेस की ही सरकार थी। इंदिरा का जरनैल सिंह भिंडरावाले से सियासी टकराव नहीं था, उनकी समस्या सियासी थी।
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शिरोमणि अकाली दल पंजाब में मजबूत विकल्प के तौर पर उभर रहा था, लेकिन भिंडरावाले के दमदमी टकसाल पर हिंसा फैलाने के कई आरोप लगे। उसके बाद देश का सबसे समृद्ध राज्य सांप्रदायिक हिंसा की आग में झुलसने लगा था। 5 अक्टूबर 1983 को हथियारबंद लोगों ने एक बस को अगवा कर लिया और उसमें सवार सभी हिंदुओं की हत्या कर दी। इंदिरा गांधी इस घटना से आगबबूला हो उठीं।

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घटना के अगले ही दिन इंदिरा गांधी ने पंजाब में इमरजेंसी लगा दी। उन्होंने पंजाब में कांग्रेस के मुख्यमंत्री दरबारा सिंह की सरकार को भंग करके वहां राष्ट्रपति शासन लगा दिया। इसके बाद इंदिरा गांधी ने भिंडरवाले और उसके साथियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने का मूड बना लिया। भिंडरावाले को गिरफ्तार करने की योजना थी, जिसकी भनक लगते ही वह अकाल तख्त में रहने लगा था। जनरल सुबेग भी उसके साथ आ गए थे।
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इंदिरा गांधी ने रॉ के संस्थापक रामेश्वर नाथ काव और अपने सहयोगी आरके धवन से इस संबंध में चर्चा की। इस अलावा कुछ अन्य वरिष्ठ अधिकारियों और नेताओं के साथ चर्चा के दौरान इस पर सहमति बनी कि स्वर्ण मंदिर को भिंडरावाला समर्थकों से खाली कराने के लिए सेना की कार्रवाई की जाए। इस बीच, सरकार ने स्वर्ण मंदिर की घेराबंदी करने की योजना बनाई, क्योंकि भिंडरावाला ने अकाल तख्त पर कब्जा कर लिया था।
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ऑपरेशन ब्लू स्टार - फोटो : बीबीसी
शुरूआत में इंदिरा गांधी ने जानी नुकसान की आशंका से ऑपरेशन के लिए ना-नुकुर की, लेकिन मई 1984 में इंदिरा को यकीन होने लगा था कि पंजाब में आतंक का सफाया करने के लिए अब टकराव ही सीधा रास्ता है. जिसके बाद उन्होंने ऑपरेशन ब्लू स्टार को हरी झंडी दी। इसके लिए आधी रात में ऑपरेशन चलाया जाए। शुरूआती ना नुकुर के बाद इंदिरा भी इस ऑपरेशन के लिए मान गई, जिसका नाम रखा गया 'ऑपरेशन सन डाउन'।
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लगभग डेढ़ दिन तक चले देश के इस पहले असैनिक युद्ध में जमकर खून बहा था और स्वर्ण मंदिर के पवित्र चबूतरे लोगों के खून से लाल हो गए थे। इस युद्ध में भिंडरवाला तो मारा गया। 83 के करीब सैनिक, जिनमें तीन अफसर भी थे और 492 आम नागरिक भी मारे गए। ऑपरेशन खत्म हुआ तो स्वर्ण मंदिर के हर गलियारे में लाशों के ढेर पड़े थे। मंदिर की दीवारें टैंकों के गोलों से बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुकी थी।
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ऑपरेशन ब्लू स्टार से पैदा हुई सांप्रदायिकता और कट्टरपंथ की कीमत इंदिरा गांधी ने जान देकर चुकाई। 31 अक्टूबर 1984 को अपने घर से निकल रहीं प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी पर उनके दो सिख सुरक्षा गार्डों सतवंत और बेअंत सिंह ने गोलियों की बौछार कर दी। उसके बाद देश भर में गुस्साई भीड़ ने 8,000 से ज्यादा सिखों को मौत के घाट उतार दिया। उनमें से तीन हजार सिर्फ दिल्ली में मारे गए।
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