6 जून 1984 को ऑपरेशन ब्लू स्टार में 492 लोगों की जान चली गई थी और सेना के 83 जवान शहीद हुए थे, इस पर इंदिरा गांधी की प्रतिक्रिया चौंकाने वाले थी। दरअसल, इंदिरा गांधी को नहीं पता था कि ऑपरेशन ब्लू स्टार में इतने लोगों की जान चली जाएगी।
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ऑपरेशन को अंजाम देने वाले सेना के अफसरों ने भी उन्हें अंधेरे में रखा था। न ही वो और न ही राजीव गांधी चाहते थे कि सिखों के पवित्र स्थल स्वर्ण मंदिर में खून खराबा हो, लेकिन ऐसा हुआ और देश व इंदिरा गांधी के नाम पर धब्बा लगा। नतीजा उनकी हत्या कर दी गई।
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इंदिरा गांधी
दरअसल, ऑपरेशन से पहले तत्कालीन सेनाध्यक्ष जनरल अरुण कुमार वैद्य ने इंदिरा गांधी से कहा था कि गोल्डन टेंपल में कोई मौत नहीं होगी और न ही कोई घायल होगा। ऑपरेशन के खत्म होते ही 6 जून, 1984 की सुबह इंदिरा गांधी के प्राइवेट सेक्रेटरी आरके धवन के दिल्ली स्थित गोल्फ लिंक घर पर फोन की घंटी बजी।
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- फोटो : social media
तत्कालीन रक्षा राज्यमंत्री के.पी. सिंह देव चाहते थे कि धवन तुरंत इंदिरा गांधी तक एक संदेश पहुंचा दें। ऑपरेशन कामयाब रहा, लेकिन बड़ी संख्या में सैनिक और आम लोग मारे गए हैं। खबर मिलते ही इंदिरा गांधी की पहली प्रतिक्रिया दुख भरी थी। उन्होंने धवन से कहा, हे भगवान, इन लोगों ने तो मुझे बताया था कि कोई हताहत नहीं होगा। इससे तो अच्छा होता, मैं ऑपरेशन सनडाउन को मंजूरी दे दी तो इतनी जिंदगियां तबाह न होती।
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ऑपरेशन सनडाउन के तहत हेलिकॉप्टर के जरिए कमांडोज को आधी रात को गोल्डन टेंपल के पास स्थित गुरुनानक निवास गेस्ट हाउस में उतारा जाना था। उस वक्त जरनैल सिंह भिंडरावाले यहीं रहता था। इस ऑपरेशन के तहत भिंडरावाले के अपहरण की योजना थी। भारतीय खुफिया एजेंसी रिसर्च एंड एनालिसेस विंग (रॉ) की सशस्त्र टुकड़ी द्वारा इस कार्रवाई को अंजाम दिया जाना था।
जरनैल सिंह भिंडरावाले सिखों की धार्मिक संस्था दमदली टकसाल का लीडर था। उसकी कट्टर विचारधारा ने लोगों पर गहरा असर डालना शुरू कर दिया था। इसीलिए उसे संस्था की कमान सौंपी गई थी। भिंडरावाले ने गोल्डन टेंपल परिसर में बने अकाल तख्त में अपना मुख्यालय बना लिया था। 1983 से वह हथियारबंद साथियों के साथ यहीं रहने लगा। उसके खिलाफ ही ऑपरेशन ब्लू स्टार चलाया गया था, जिसमें वह मारा गया।