कैप्टन विजयंत थापर की एक दिली ख्वाहिश थी, जो पूरी न हो सकी और वे शहीद हो गए। शायद ही बेटी को वो बात पता हो, पढ़िए कारगिल के वीर योद्धा का आखिरी खत।
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कारगिल का योद्धा शहीद विजयंत थापर
जब तक आप लोगों को यह पत्र मिलेगा, मैं ऊपर आसमान से आपको देख रहा होऊंगा। मुझे कोई पछतावा नहीं है कि जिंदगी अब खत्म हो रही है, बल्कि अगर फिर से मेरा जन्म हुआ तो मैं एक बार फिर सैनिक बनना चाहूंगा और अपनी मातृभृमि के लिए मैदान-ए-जंग में लडू़ंगा। अगर हो सके तो आप लोग इस जगह पर जरूर आकर देखिएगा, यहां आपके बेहतर कल के लिए हमारी सेना के रणबांकरों ने दुश्मन से लोहा लिया था। यह खत कैप्टन विजयंत थापर ने नोल पोस्ट पर अंतिम हमले से पहले पिता के नाम लिखकर उच्च अधिकारी के पास छोड़ा था।
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कारगिल का योद्धा शहीद विजयंत थापर
रुखसाना के निकाह में शामिल होना चाहते थे
कैप्टन विजयंत थापर ने खत में कुपवाड़ा स्थित सैन्य शिविर से सटे स्कूल में पढ़ने वाली बच्ची रुखसाना का भी जिक्र किया था, जिसे कैप्टन थापर बेटी की तरह मानते थे। वह उसे चॉकलेट और सालाना पचास रुपये की पॉकेटमनी भी दिया करते थे। इसलिए थापर ने खत में कहा कि वह अगर नहीं रहे, तब भी रुखसाना को 50 रुपये देते रहें। बेटेकी चाहत पूरी करते हुए पिता वीएन थापर हर साल कारगिल युद्ध की वर्षगांठ पर द्रास सेक्टर की उन पहाड़ियों तक जाते हैं, और रुखसाना से भी मिलते हैं। कैप्टन विजयंत थापर रुखसाना के निकाह में शामिल होना चाहते थे।
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Captain Vijayant Thapar
बता दें कि कै. थापर की रेजिमेंट को तोलोलिंग में घुसे दुश्मनों को उखाड़ फेंकने का काम मिला था। 10000 से 15000 फुट की चोटियों पर जैसे प्रमुख चोटी बर्बाद पोस्ट (पा.4590) जिसे कै. थपर की अगुवाई में जीता जा चुका थ। यह तोलोलिंग की पहली चोटी थी। यहां पर कै. थापर ने अपनी पहली जीत दर्ज की और स्वयं तिरंगा फहराया था। यह कारगिल युद्ध की एक महत्वपूर्ण सफलता थी क्योंकि यहां से ही दूसरी चौकियों पर चढ़ाई करने में आसानी हो गई।
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कारगिल विजय दिवस
अगला मुश्किल आक्रमण था जिसमें दुश्मन द्वारा कब्जाई गई पांच चौकियां जो साथ-साथ थी, उस पर अचानक हमला कर कब्जे में लेना था। वे चौकियां थीं नोल पोस्ट, पिंपल-1, 2 और 3 और लान पोस्ट। कै. थापर की टुकड़ी को सबसे आगे से सीधी चट्टान पर रस्सों की सहायता से अंधेरे में 28 जून की रात को आगे बढ़कर नोल पोस्ट पर कब्जा करना था। इस आक्रमण में मेजर पी. आचार्य व कै. थापर का सहायक सिपाही जगमाल सिंह शहीद हो चुके थे, भारी नुकसान हो चुका था, इसलिए थोड़ा पीछे हट कर एक बड़ी चट्टान के पीछे सुबह होने से पहले पहुंच चुके थे और रात का इंतजार करते रहे।
निर्णायक हमला 29 जून की रात को कै. थापर व उनकी टुकड़ी ने दोबारा किया। आधी रात को नोल पोस्ट के ठीक नीचे एक बड़ी चट्टान के नीचे मोर्चा संभाला। भारी मशीनगनों से फायर ऊपर से लगातार आ रहा था। कै. थापर ने परवाह किए बगैर नायक तिलक सिंह के साथ अचानक आगे बढ़कर धावा बोल दिया। दुश्मन के कुछ सैनिक मारे गए, कुछ भाग खड़े हुए। मदद के लिए दूसरे सैनिक भी वहां पहुंचने लगे थे। अचानक पीछे से गोलियों की बौछार कै. थापर पर आई और वीरगति को प्राप्त हुए। उनके शौर्य और दृढ़ इरादे से किए गए हमले के लिए बाद में उन्हें वीर चक्र से नवाजा गया।