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42 साल देश की सेवा, पूर्व सेनाध्यक्ष दलबीर सुहाग की बहादुरी के किस्से

Mon, 02 Jan 2017 09:48 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, झज्जर(हरियाणा)
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जनरल दलबीर सुहाग
42 साल देश की सेवा की और दुश्मनों को नाकों चने चबाए। आप भी जानिए, पूर्व सेनाध्यक्ष दलबीर सुहाग की बहादुरी के किस्से और उनके बारे में सब कुछ।
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जनरल दलबीर सुहाग
ये कहानी है भारत मां के एक ऐसे वीर सपूत की, जो उन सभी युवाओं के लिए एक मिसाल है जो सेना में भर्ती होकर देशसेवा करने का जज्बा रखते हैं। कड़ी मेहनत, ढृढ़ निश्चय, समर्पण और कुछ कर गुजरने की लगन ने हरियाणा के एक छोटे से गांव में जन्मे दलबीर सुहाग को सेना में सर्वोच्‍च जनरल के पद पर पहुंचाया। जनरल एसएचएफजे मानेकशॉ (बाद में फील्‍ड मार्शल के रैंक से सम्‍मानित किए गए) और जनरल जीजी बेवूर के बाद वे तीसरे सेना प्रमुख थे, जो गोरखा ब्रिगेड में शामिल थे।
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जनरल दलबीर सुहाग
जनरल दलबीर सिंह का जन्‍म 28 दिसम्‍बर, 1954 को हरियाणा में झज्‍जर जिले के बिशन गांव में हुआ था। हालांकि क्षेत्र के अन्‍य गांव की तरह ही खेती प्रधान गांव होने के बावजूद इस जाट बहुल गांव में से अधिक संख्‍या में युवक सेना में शामिल होते हैं क्‍योंकि वीरता के गुण वे अपने पूर्वजों से पाते हैं। भारतीय सेना का प्रमुख और जनरल बनने वाले जनरल सुहाग के शुरूआती दिन काफी सादगीपूर्ण थे। दलबीर की शुरूआती शिक्षा गांव के ईंटों वाले दो कमरों के प्राथमिक विद्यालय में हुई।

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जनरल दलबीर सुहाग
दलबीर सिंह के सैन्य जीवन की शुरुआत राजस्‍थान के सैनिक विद्यालय, चित्‍तौड़गढ़ (एसएससी) से हुई। जनरल दलबीर के ताऊ जी इस विद्यालय में घुड़सवारी सिखाते थे और उन्‍होंने दलबीर को सैनिक विद्यालय में पढ़ाने का सुझाव दिया। इस तरह 15 जनवरी, 1965 को कैडेट दलबीर सिंह के सैन्‍य जीवन की शुरूआत हुई। जून 1974 में लेफ्टिनेंट दलबीर सिंह का सेना में अफसर बनने का सपना पूरा हुआ। जनरल दलबीर सिंह को जून 1974 को 4/5 जीआर (एफएफ) में कमीशन दिया गया था।
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यह एक ऐसी उपलब्धि थी, जिस पर उनके पिताजी, दादाजी, चाचाओं, ताऊओं तथा अन्य सभी परिजनों को गर्व था। 19 अप्रैल, 2011 से उन्‍हें 5 जीआर (एफएफ) रेजीमेन्‍ट का कर्नल और एक जनवरी, 2014 से गोरखा ब्रिगेड का अध्‍यक्ष नियुक्त किया गया है। हालांकि भारतीय सेना की पुरानी परंपराओं के अनुसार, सेना प्रमुख को कई अन्‍य सैन्‍य और रेजीमेन्‍ट के ‘सम्‍मानित कर्नल' बनाया जाता है। जनरल दलबीर सिंह का गोरखा रेजीमेन्‍ट को चुनने के बारे में कहना है कि वह मेरा एक सोचा-समझा फैसला था क्‍योंकि मैं केवल पैदल सेना (इनफैन्‍ट्री) में ही शामिल होना चाहता था।
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जनरल दलबीर सुहाग
जनरल दलबीर सिंह खेल-कूद में भी बहुत अच्‍छे थे और बहुत ही बढ़िया बास्‍केटबॉल खेलते थे। नौंवी क्लास में ही उनकी हाइट इतनी हो गई थी, जितनी आज है। ताऊजी के साथ स्कूल में सीखी घुड़सवारी का फायदा उन्हें अपने सैन्य जीवन में मिला। अपने स्कूल में होने वाली आउटडोर तथा खेल संबंधी दूसरी गतिविधियों में भाग लेते रहने के कारण वे एनडीए के जल्दी ही बहुत अच्छे एथलीट तथा उत्कृष्ट खिलाड़ी बन गये। घुड़सवारी में कुशलता के कारण वे एनडीए के पोलो और घुड़सवारी क्लब के अध्यक्ष भी बने।

 
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जनरल दलबीर सिंह अपनी बहादुरी के लिए काफी लोकप्रिय हैं। उनकी बहादुरी के कई किस्से सुनने के ​मिलते हैं। जैसे ‘ऑपरेशन पवन' के समय जब उनकी बटालियन श्रीलंका गई तो वह आईएमए में मेजर के रुप में अनुदेशक थे। यूनिट के वहां पहुंचने के केवल दो दिनों के बाद, जाफना के एक बड़े ऑपरेशन में कमांडिंग ऑफिसर लेफ्टिनेंट कर्नल इंद्र बल सिंह बावा सहित कई अन्य अधिकारी तथा सैनिक मारे गये। कर्नल बावा के माता-पिता को उनके हो जाने का दुखद समाचार देने का काम सौंपा गया था और उन्होंने यह पूरा भी किया, वो भी बड़ी हिम्मत के सा​थ।

 

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इसके बाद उन्होंने सेना मुख्यालय से खुद को बटालियन में वापिस भेजने का निवेदन किया, जिसे मान भी लिया गया। अगले 24 घंटे के अन्दर ही वे बटालियन में आ गए ओर कंपनी कमांडर का काम संभाल लिया। इसके बाद वे अपनी यूनिट के साथ तब तक डटे रहे, जब तक उन्हें हटाया नहीं गया। इस दौरान उन्होंने यूनिट के जवानों का मनोबल ऊंचा करने के लिए जी तोड़ मेहनत की। काम थोड़ा मुश्किल था, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं छोड़ी। इसके बाद वे सफलता की ऊंचाइयां चढ़ते गए और उनका पद भी बड़ा होता चला गया।

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जनरल दलबीर सुहाग
करियर संबंधी विभिन्न सेवा कोर्स करने के अलावा उन्होंने अपनी शैक्षिक योग्यताओं में कुछ मास्टर डिग्रियां भी जोड़ी, जिनमें उस्मानिया यूनिवर्सिटी से ‘प्रबंध अध्ययन' और चेन्नई यूनिवर्सिटी से प्राप्त ‘स्ट्रेटेजिक स्टडीज' डिग्रियां शामिल हैं। उन्होंने कारगिल-द्रास सेक्टर में उच्च अक्षांश क्षेत्र में नियंत्रण रेखा पर तैनात करने के लिए माउंटेन डिवीजन का बड़ी कुशलता से नेतृत्व किया। इस विशिष्ट कार्य के लिए इन्हें अति विशिष्ट सेवा मेडल (एवीएसएम) दिया गया।

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जनरल दलबीर सुहाग
जनरल दलबीर को 16 जून 2012 से 31 दिसंबर 2013 तक पूर्वी सेना कमांडर नियुक्त किया गया और एक जनवरी 2014 को उन्हें उप सेना प्रमुख (वीसीओएएस) बनाया गया। उप-सेना प्रमुख के रूप में उनका कार्यकाल 7 महीने का रहा। जनरल दलबीर की शादी सात फरवरी, 1984 को दिल्ली में  हुई। 1982 के एशियाई खेलों के दौरान जब वे छुट्टी पर आए थे, तब उन्होंने दोस्त ने सुझाव दिया। उनकी पत्नी का नाम नमिता सुहाग है और उनके तीन बच्चे हैं, दो बेटियां और एक बेटा
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बता दें कि प्रोफेशन लाइफ में दलबीर सुहाग जितना अनुशासन में रहते हैं, निजी लाइफ वे उतने ही खुले दिन के इंसान हैं। उनके घर में हर किसी को अपनी लाइफ अपने तरीके से जीने का हक है। वे जिंदगी को खुलकर जीने में विश्वास रखते हैं। उनके पास एक पालतू कुत्ता जूनो है, जो उन्हें उनकी बेटी की ओर से उन्‍हें मिला एक गिफ्ट है। जूनो पूरे घर में तब तक खेल-कूद करता रहता है, जब तक वह अपने ‘मास्टर' को घर आते नहीं देखता।
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