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मोहम्मद रफी: ऐसा फनकार न कभी था, न कभी होगा... जानिए उनसे जुड़ी 12 खास बातें

Tue, 01 Aug 2017 09:18 AM IST
टीम डिजिटल/अमर उजाला, चंडीगढ़
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mohammad rafi
आज हम आपको बता रहे हैं एक ऐसे महान फनकार की जिंदगी से जुड़ी खास बातें, जो न कभी हुआ था और न कभी होगा। ये हैं- सुरों के बेताज बादशाह मोहम्मद रफी।
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mohammad rafi
मुस्लिम परिवार में जन्म हुआ था
पंजाब के कोटला सुल्तान सिंह गांव में  24 दिसंबर 1924 को हाजी अली मोहम्मद के परिवार में मोहम्मद रफी का जन्म हुआ था। हाजी अली मोहम्मद के छह बच्चों में से रफी दूसरे नंबर पर थे। उन्हें घर में फीको कहा जाता था। गली में फकीर को गाते सुनकर रफी ने गाना शुरू किया था। 1935 में रफी के पिता लाहौर चले गए और वहां भट्टी गेट के नूर मोहल्ला में हजामत बनाने का काम शुरू किया। 
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mohammad rafi
13 साल की उम्र में पहली बार गाया
रफी साहब ने उस्ताद अब्दुल वहीद खां, पंडित जीवन लाल मट्टू और फिरोज निजामी से शास्त्रीय संगीत सीखा। 13 साल की उम्र में पहली बार स्टेज पर परफॉर्म किया। तब उन्होंने केएल सहगल के गाने गाए थे। 1941 में उन्होंने पंजाबी फिल्म के लिए गाना गाया, फिर आकाशवाणी लाहौर के लिए गाने गाए। रफी के बड़े भाई के दोस्त अब्दुल हमीद ने रफी की प्रतिभा को पहचाना। उन्होंने ही परिवार को मनाया कि वो रफी को बंबई जाने दें। 

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mohammad rafi
13 साल की उम्र में पहली शादी हुई
बात 1942 की है, रफी साहब अब्दुल हमीद के साथ बंबई आ गए। यहां वे और हमीद 10 बाई 10 के कमरे में रुके, जो भिंडी बाजार में था। 13 साल की उम्र में रफी की पहली शादी उनके चाचा की बेटी बशीरन बेगम से हुई थी, लेकिन कुछ साल बाद ही उनका तलाक हो गया था। इस शादी से उनका एक बेटा सईद हुआ था। उनके इस पहले विवाह के बारे में घर में सभी को मालूम था, लेकिन बाहरी लोगों से इसे छिपा कर रखा गया था। 
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mohammad rafi
20 साल की उम्र में दूसरी शादी हुई
1944 में 20 साल की उम्र में रफी की दूसरी शादी सिराजुद्दीन अहमद बारी और तालिमुन्निसा की बेटी बिलकिस के साथ हुई। जिनसे उनके तीन बेटे खालिद, हामिद और शाहिद हुए। तीन बेटियां परवीन अहमद, नसरीन अहमद और यास्मीन अहमद भी हुईं। रफी साहब के तीनों बेटों सईद, खालिद और हामिद की मौत हो चुकी है। आजादी के समय विभाजन के दौरान उन्होने भारत में रहना पसन्द किया। 31 जुलाई 1980 को उनका निधन हो गया।
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rafi - फोटो : self
26 हजार गाने गाए थे रफी ने
मोहम्‍मद रफी ने अपनी अपनी जिंदगी में करीब 26 हजार गीत गाये और लगभग हर भाषा में। वर्ष 1946 में फिल्म 'अनमोल घड़ी' में 'तेरा खिलौना टूटा' से हिन्दी सिनेमा की दुनिया में कदम रखा। उसके बाद पीछे मुड़कर नहीं देखा। रफी बहुत ही शर्मीले स्वभाव के थे। न किसी से ज्यादा बातचीत और न ही किसी से कोई लेना-देना। न शराब का शौक न सिगरेट का। न पार्टियों में जाने का शौक, न ही देर रात घर से बाहर रहने की फितरत। 
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rafi
दयालु प्रवृति के इंसान थे रफी
मोहम्मद रफी काफी दयालु इंसान थे। वह कभी भी संगीतकार से ये नहीं पूछते थे कि उन्हें गाने के लिए कितना पैसा मिलेगा। वह आकर गीत गा दिया करते थे और कभी कभी एक रुपया लेकर गीत गा दिया करते थे। रफी किसी फर्जी नाम से पड़ोस की एक विधवा को पैसे भेजा करते थे। कई साल तक मनी ऑर्डर आया, पर जब मनी ऑर्डर आना बंद हुआ तो महिला पोस्ट ऑफिस गई। वहां पता चला कि मनीऑर्डर भेजने वाले का निधन हो गया और उनका नाम मोहम्मद रफी ​था।

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rafi
लता मंगेशकर से 6 साल बात नहीं की
रफी साहब और लता मंगेशकर के बीच सालों तक बातचीत बंद रही। दोनों ने कई साल साथ गाना नहीं गाया। वजह थी प्लेबैक सिंगर को रॉयल्टी मिलने की। लता मंगेशकर इसके हक में थीं और चाहती थीं कि रफी उनका साथ दें, पर रफी खिलाफ थे। फिर माया फिल्म के गाने तस्वीर तेरी दिल में...के अंतरे को लेकर दोनों में बहस हो गई। लता ने घोषणा कर दी कि वो रफी के साथ नहीं गाएंगी। बाद में संगीतकार जयकिशन ने सुलह कराई, फिर एसडी बर्मन म्यूजिकल नाइट में उन्होंने एक साथ स्टेज पर गाया।

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गायकी के सरताज
पंडित नेहरू ने रजत पदक से सम्मानित किया था
1948 में महात्मा गांधी की हत्या के बाद हुस्नलाल-भगतराम, राजेंद्र कृष्ण और मोहम्मद रफी ने रात ही रात में एक गाना तैयार किया - सुनो सुनो ऐ दुनिया वालों बापू की ये अमर कहानी....। एक दिन उन्हें पंडित जवाहरलाल नेहरू ने अपने घर बुलाया। वहां एक कार्यक्रम रखा गया था, जिसमें पंडित जी ने रफी से यही गाना सुनाने की फरमाइश की। पंडित जी को वह गाना इतना पसंद आया कि उन्होंने स्वतंत्रता दिवस पर रफी को रजत पदक से सम्मानित किया।

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रफी
निधन से दो दिन पहले आखिरी गाना गाया था
मोहम्मद रफी का आखिरी गीत फिल्म 'आस पास' के लिए था, जो उन्होंने लक्ष्मीकांत प्यारेलाल के लिए अपने निधन से ठीक दो दिन पहले रिकॉर्ड किया था। गीत के बोल थे 'शाम फिर क्यों उदास है दोस्त'...। मोहम्मद रफी ने किशोर कुमार की फिल्मों के लिए भी गीत गाये हैं, जिनमें फिल्म 'बड़े सरकार', 'रागिनी' और कई फिल्‍में शामिल थीं। रफी ने किशोर कुमार के लिए करीब 11 गाने गाए।

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मोहम्मद रफी
बाबुल की दुआएं गीत के मिला नेशनल अवार्ड
फिल्म 'नील कमल' के गाने 'बाबुल की दुआएं लेती जा' के लिए रफी साहब को नेशनल अवार्ड मिला था। इस गीत को गाते समय कई बार उनकी आंखें नम हुई। वजह खास ये थी कि इस गीत को रिकॉर्ड करने से एक दिन पहले उनकी बेटी की सगाई हुई थी और कुछ दिन में शादी थी। इसलिए वो काफी भावुक थे, फिर भी उन्होंने ये गीत गाया और इस गीत के लिए उन्‍हें 'नेशनल अवॉर्ड' मिला।

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मोहम्मद रफी - फोटो : self
रमजान के महीने में मौत हुई थी
मोहम्मद रफी का निधन रमजान के महीने में हुआ ​था। जिस दिन उनकी अंतिम विदाई थी, उस दिन मुंबई में जोरों की बारिश हो रही थी। फिर भी अंतिम यात्रा में कम से कम 10000 लोग सड़कों पर थे और उस दिन मशहूर एक्टर मनोज कुमार ने कहा, 'सुरों की मां सरस्वती भी अपने आंसू बहा रही हैं आज'। रफी साहब को पतंग उड़ाने का शौक था। रिकॉर्डिंग करने के बाद वे पतंग उड़ाया करते थे। 
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6 फिल्मफेयर और 1 नेशनल अवार्ड 
6 फिल्मफेयर और 1 नेशनल अवार्ड रफी के नाम हैं। उन्हें भारत सरकार कि तरफ से 'पद्मश्री' अवार्ड से भी सम्मानित किया गया था। रफी साहब ने असमी, कोंकणी, पंजाबी, उड़िया, मराठी, बंगाली, भोजपुरी के साथ-साथ पारसी, डच, स्पेनिश और इंग्लिश में भी गीत गाए थे। चौदहवीं का चांद हो या आफताब हो... गीत के लिए रफी साहब को पहली बार फिल्म फेयर एवॉर्ड से नवाजा गया। 
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